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राजनीति: उपेक्षा के शिकार बच्चे

आज बाल-विवाह, बच्चों की बलि, बाल-वेश्यावृत्ति, बाल श्रम, बाल तस्करी, बाल-दुर्व्यवहार जैसे मुद्दे राजनीतिकों की चिंता से गायब हंै। यहां प्रश्न उठता है कि जब विभिन्न घोषणापत्रों से ही ये मुद्दे गायब हैं तो सरकार बन जाने के बाद इन मुद्दों की प्राथमिकता क्या रह जाएगी? समाज में बच्चों से जुड़ी कई समस्याएं हैं। बच्चे अपना रोना किसके पास रोएं? उनके लिए कानून बेशक हैं, लेकिन कानून की शरण में जा सकने को वे या तो तैयार नहीं हैं या वे इसे जानते तक नहीं हैं।

Author Published on: November 27, 2018 4:50 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

चुनावों से पूर्व देश के राष्ट्रीय दलों सहित सभी राज्य स्तरीय और छोटे दल अपने-अपने चुनावी घोषणापत्र जारी करते हैं। लगभग सभी दलों के घोषणापत्रों में वादों का पिटारा होता है। स्मार्टफोन, लैपटॉप-डाटा से लेकर देशी घी, साड़ियां और ऐसा ही अन्य सामान बांटने तक के वादे होते हैं। इन वादों के बीच एक गंभीर सवाल भी है जो हमारे राजनेताओं और नीति नियंताओं की हकीकत को भी बयां करता है। वह सवाल कुछ और नहीं, बल्कि बच्चों से जुड़ा हुआ है। पिछले कुछ सालों में बच्चों से जुड़ी कई अप्रिय घटनाएं सामने आई हैं। चाहे बस हादसे हों या फिर बच्चों के साथ होने वाले तमाम तरह के अपराध, दुर्भाग्य है कि किसी भी पार्टी ने अपने घोषणापत्र में इस गंभीर सामाजिक समस्या का जिक्र करना तक उचित नहीं समझा। बच्चों को किसी भी देश का भविष्य माना जाता है। लेकिन आज बच्चों की समस्याएं गंभीर होती जा रही हैं जिन पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा। बच्चों की समस्याओं को लेकर माता-पिता, समाज और हमारे नीति-नियंताओं के पास भी कोई जागरूकता नहीं है और न ही कारगर नीतियां हैं। व्यस्त जीवन में माता-पिता के पास वक्त की कमी है। समाज के पास दृष्टि नहीं है और नीति-नियंताओं के पास उनके लिए कुछ भी नहीं है, क्योंकि बच्चे घोषित रूप से नाबालिग हैं। वे मतदाता नहीं हैं, जो जीत-हार तय करते हों। आखिर बच्चों से हमारी या हमारे समाज की कौन-सी दशा और दिशा तय हो सकती है? यह प्रश्न ही इसका जवाब है।

भारत जैसे विकासशील देश के लिए बच्चे किसी भी रूप में उपयोगी नहीं समझे जाते। आज यदि बच्चों से जुड़ी पहली समस्या कुपोषण पर विचार करें तो यूनिसेफ द्वारा जारी आंकड़ों में यह कहा गया है कि दुनिया के प्रत्येक तीन बच्चों में से एक कुपोषित बच्चा भारतीय है। यह आश्चर्यजनक रूप से गौर करने लायक तथ्य है कि भारत और पाकिस्तान में औसत रूप से कुपोषित बच्चों की दर अफ्रीका की तुलना में काफी अधिक है। भारत में छह साल तक के 66 प्रतिशत तक बच्चे कुपोषित हैं। क्या हमारा ध्यान इस तरफ है? आज देश में लगभग एक तिहाई बच्चे जन्म के समय औसत वजन से काफी कम वजन के पैदा हो रहे हैं। यह स्थिति तब और गंभीर कही जाएगी, जब किसी राजनीतिक दल की इसमें कोई भी रुचि नहीं है। बच्चों के कुपोषण का मामला किसी भी नेता ने चुनावी सभा में नहीं उठाया है।

बच्चों की अन्य समस्याओं को जानना बेहद जरूरी है। बच्चे किसी तरह स्कूल की दहलीज पर पहुंच भी जाते हंैं तो वहां जाते ही उन्हें कई समस्याएं घेरने लगती हैं। अश्लील हरकतें और यौन उत्पीड़न की घटनाएं आए दिन सुनने को मिल रही हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि बच्चे असामान्य रूप से डरे हुए हैं। इसी तरह बच्चों को लाने-ले जाने वाले स्कूली वाहनों को लीजिए। ये मौत के वाहन से कम साबित नहीं हो रहे हैं। पच्चीस-तीस साल पुरानी बसों या टैक्सियों में बच्चे भेड़-बकरियों की तरह ढोए जा रहे हैं। अभिभावक मजबूरी की वजह से इन बस और विद्यालय संचालकों के सामने मूकदर्शक की तरह हैं। व्यवस्था की मूक हामी ने स्थिति को और भी भयावह कर दिया है। बच्चे कुछ समझ पाएं, इससे पहले ही वे कई हादसों के शिकार हो जाते हैं। इसलिए सवाल उठता है कि हम बच्चों को देश का भविष्य तो मानते हैं, लेकिन उन्हें कैसी आधारभूत सुविधाएं दे रहे हैं? आज बाल-विवाह, बच्चों की बलि, बाल-वेश्यावृत्ति, बाल श्रम, बाल तस्करी, बाल-दुर्व्यवहार जैसे मुद्दे राजनीतिकों की चिंता से गायब हंै। यहां प्रश्न उठता है कि जब विभिन्न घोषणापत्रों से ही ये मुद्दे गायब हैं तो सरकार बन जाने के बाद इन मुद्दों की प्राथमिकता क्या रह जाएगी? समाज में बच्चों से जुड़ी कई समस्याएं हैं। बच्चे अपना रोना किसके पास रोएं? उनके लिए कानून बेशक हैं, लेकिन कानून की शरण में जा सकने को वे या तो तैयार नहीं हैं या वे इसे जानते तक नहीं हैं।

देश के लगभग आठ करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो अब तक स्कूल नहीं गए हैं। क्या राजनीतिक घोषणापत्रों में इस पर नजर है? हम अपने भविष्य को आश्चर्यजनक रूप से नजरअंदाज कर रहे हैं। किसी मतदाता में शक्ति नहीं रह गई है कि घोषणापत्रों से बच्चों की अपेक्षा को लेकर सवाल करे। जब अभिभावकों को ही बच्चों की किसी समस्या से मतलब नहीं है तो घोषणापत्रों को क्यों मतलब हो? वैसे तो स्कूली बच्चों के लिए केंद्र सरकार मिड-डे मील योजना और कई राज्य सरकारें साइकिल-पोशाक जैसी योजनाएं चला रही हैं, लेकिन इन योजनाओं का कोई भी सकारात्मक परिणाम अभी तक देखने को नहीं मिला है। मिड-डे मील योजना तो कई स्थानों पर बच्चों के लिए जानलेवा साबित हुई है। आखिर बच्चे इस योजना का रोना किसके पास रोएं? किस घोषणापत्र के पास उनके लिए शब्दों का सहारा है? बच्चे अपनी स्थिति पर खुद रोते हैं, खुद चुप भी हो जाते हैं।

आज बच्चों को हमने होड़ लगाने की जो बीमारी दे दी है, बच्चे उससे निकलने की दवाई तलाश रहे हैं। उन्हें तो यह भी पता नहीं है कि उनकी बीमारी लाइलाज हो चुकी है। आज का बाजार भी इन बच्चों की भावनाओं के साथ मात्र व्यापार ही कर रहा है। बच्चे अपने आंसू की कीमत पर खुशी खरीदने का भोला-भाला प्रयास करते हैं। कुल मिला कर बात करें तो बच्चों के लिए हमने भोजन तो खूब तैयार कर रखा है, लेकिन उनकी भूख का इंतजाम हमने किया ही नहीं है।

प्रत्येक चुनाव में बच्चे आंतरिक तौर पर खामोश होते हैं। ये खामोशी उनके भीतर की सिसकियों से जन्म ले रही है। उनकी समस्याओं पर कोई भी विचार करने के लिए हम तैयार नहीं है। हम बेशक बच्चों से खूब प्यार करते हैं, उन्हें भगवान का रूप मानते हैं, लेकिन किसी होटल में काम करते बच्चे को देख कर हमारा हृदय विचलित क्यों नहीं हो जाता है? छह साल तक के आयु वर्ग के बच्चों के लिंगानुपात में असामान्य कमी हमें अंदर तक उद्वेलित क्यों नहीं करती है? जर्जर होती गाड़ियों में बच्चों को स्कूल भेजने में कोई हिचक क्यों नहीं होती है? बच्चों को यौनिक वस्तु बनाने से परहेज क्यों नहीं है? बच्चों को नानी-दादी वाली कहानियां सुनाने का वक्त हमारे पास क्यों नहीं है? बच्चों को फास्ट फूड खिलाने से कोई परहेज क्यों नहीं होता है? ये सब ऐसे गंभीर सवाल हैं जिन पर विचार की जरूरत है। बाल सुरक्षा से जुड़े कानून हालांकि शब्दों में खूब ठोस रूप में दर्ज हैं, लेकिन वे सतही दृष्टि से बेहद कमजोर हैं। बाल न्याय अधिनियम, 2000 ने बच्चों के हित के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन उनका कोई सकारात्मक परिणाम अब तक देखने को नहीं मिला है।

आज राजनीतिक दलों की इच्छाशक्ति इन बच्चों के लिए नहीं रह गई है, वरना बच्चों के कुपोषण के नाम पर, बाल श्रम, बाल वेश्यावृत्ति जैसी कुरीतियों पर भी वोट मांगे जाते। क्या सभी दल इस पर एक मत हो सकेंगे कि अब बच्चों के हक के लिए भी चुनावों में चर्चा हो। बच्चों को सुविधाएं देने के नाम पर भी वोट मांगने की शुरुआत हो। अभिभावक इस बात को लेकर जागरूक हों कि किस घोषणापत्र में उनके बच्चों के लिए सुविधाओं की बात कही गई है। बच्चों को समाज का मुख्य अंग मानने वाले घोषणापत्र जब बनेंगे, तो निश्चित तौर पर उनका स्वागत तो होगा, लेकिन अभी भी वक्त है कि हम इस तरफ इन राजनीतिक दलों का ध्यान खींचें। अब जरूरत है पार्टी घोषणापत्रों में बच्चों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को भी शामिल करने का दबाव पैदा हो, ताकि हम अपने भविष्य के मुस्कुराने का सशक्त संकल्प प्रस्तुत कर सकें।

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