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राजनीति: कचरे के ढेर में दबता एवरेस्ट

हालात इतने बदतर होते जा रहे हैं कि एवरेस्ट पर अब टनों कचरा जमा हो चुका है। शेरपाओं को हर एक किलो कचरा लाने के लिए करीब डेढ़ सौ रुपए (लगभग दो डॉलर) दिए जाते हैं। कुछ वर्षों में करीब सोलह टन कूड़ा पहाड़ों से हटाया जा चुका है, लेकिन अभी भी हजारों टन कचरा एवरेस्ट पर पड़ा है। कचरे में कुछ चीजें तो ऐसी हैं, जिन्हें पर्वत से नीचे लाने में सफलता नहीं मिल रही। इनमें पर्वतारोहियों के शव भी हैं।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

योगेश कुमार गोयल

माउंट एवरेस्ट को फतह करना पर्वतारोहियों के लिए रहस्य और रोमांच से भरपूर होता है। विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ना आज भी दुनिया का सबसे बड़ा कारनामा माना जाता है, लेकिन हकीकत यही है कि इस मकसद में चंद पर्वतारोहियों को ही सफलता नसीब होती है। प्रतिवर्ष हजारों लोग माउंट एवरेस्ट को छूने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनमें से गिने-चुने लोग ही चोटी तक पहुंचने में कामयाब हो पाते हैं और कुछ एवरेस्ट फतह करने की चाहत में अपनी जान भी गंवा देते हैं। दीगर सच यही है कि यह एक ऐसा सफर है, जहां मौत हर कदम पर बांहें फैलाए खड़ी रहती है और इस सफर के लिए फौलाद जैसे कलेजे की जरूरत होती है। बस मामूली-सी चूक हुई और जिंदगी खत्म। यही कारण है कि इसे धरती के ऊपर पाताल की संज्ञा भी दी जाती रही है। पृथ्वी की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट तक पहुंचने के लिए पर्वतारोहियों को अनेक बाधाओं को पार करना पड़ता है। चढ़ाई के दौरान कई बार ऐसे मुश्किल हालात पैदा हो जाते हैं कि जांबाज नेपाली शेरपाओं के भी बर्फीले पर्वतों पर पसीने छूट जाते हैं। लेकिन एवरेस्ट के इस लंबे रास्ते पर चारों ओर फैलते कूड़े के ढेर गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं।

ज्यों-ज्यों व्यावसायिक पर्वतारोहण के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है, दुनिया की यह सबसे ऊंची चोटी कूड़े के अंबार तले दबने लगी है। इंसानी दखल के चलते धरती से दूर एवरेस्ट पर भी पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया जा रहा है। दरअसल, पवर्तारोहियों की संख्या अब हर साल बढ़ रही है, जो अपने साथ आॅक्सीजन के सिलेंडर, खाने-पीने का सामान, टेंट और बहुत सारी चीजें ले जाते हैं इनमें से बहुत से पर्वतारोही अपने सामान का भार कम करने के लिए कूड़ा-कचरा रास्ते में ही फेंकते चलते हैं। कचरे के साथ-साथ मानव मल भी ऊंचाई पर बने शिविरों में फंसा हुआ है। विशेषज्ञ अब चेतावनी देते हुए कहने भी लगे हैं कि मानव मल और कचरा हद से बाहर जा चुका है।

हाल ही में एक रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब नौ किलोमीटर लंबे इस दुर्गम मार्ग पर पर्वतारोही अपने साथ लेकर गए खाली गैस सिलेंडर, तंबू, बेकार हो चुके उपकरण और यहां तक कि मल जैसे अपशिष्ट भी छोड़ आते हैं और अधिकांश पर्वतारोही एवरेस्ट के पर्यावरण का समुचित खयाल नहीं रख रहे। हालात इतने बदतर होते जा रहे हैं कि एवरेस्ट पर अब टनों कचरा जमा हो चुका है। शेरपाओं को हर एक किलो कचरा लाने के लिए करीब डेढ़ सौ रुपए (लगभग दो डॉलर) दिए जाते हैं। कुछ वर्षों में करीब सोलह टन कूड़ा पहाड़ों से हटाया जा चुका है, लेकिन अभी भी हजारों टन कचरा एवरेस्ट पर पड़ा है। कचरे में कुछ चीजें तो ऐसी हैं, जिन्हें पर्वत से नीचे लाने में सफलता नहीं मिल रही। इनमें पर्वतारोहियों के शव भी हैं।

एवरेस्ट के दुर्गम रास्तों पर कड़ाके की ठंड की वजह से जगह-जगह बर्फ में दबे पड़े शव पत्थर की तरह ठोस हो जाते हैं, जिन्हें नीचे लाना नामुमकिन हो जाता है। फिर भी इतनी मुश्किलों के बावजूद नेपाली पर्वतारोहियों का दल समय-समय पर एवरेस्ट की सफाई में जुटता है और सफाई अभियान में याकों की मदद से हर साल कई टन कचरा नीचे लाया जाता है। माउंट एवरेस्ट से इसी साल अप्रैल से लेकर अभी तक करीब सवा दो टन मानव अपशिष्ट, एक टन पर्वतारोहण संबंधी कचरा और पांच टन से ज्यादा घरेलू कचरा हटाया जा चुका है।

टेंट में तो पर्वतारोहियों के पास शौचालय मौजूद होते हैं, जिसे निचले इलाकों में ले जाकर फेंक दिया जाता है। लेकिन एवरेस्ट पर चढ़ाई के दौरान पर्वतारोही शौच के लिए प्राय: बर्फ में ही गड्ढा खोदते हैं और मानव मल को वहीं बर्फ में दबा छोड़ देते हैं। इस प्रकार हर मौसम में करीब 26500 पाउंड मानव मल एवरेस्ट की चोटियों पर जमा हो रहा है। इसी के चलते एवरेस्ट को अब विश्व का सबसे ऊंचा कचराघर भी कहा जाने लगा है। एवरेस्ट पर चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला जापान की जुंको तापेई पिछले कई सालों से एवरेस्ट पर पड़ रहे दबाव, वहां जमा हो रहे मलबे और उससे हो रहे नुकसान का अध्ययन कर रही हैं। उनका कहना है कि एवरेस्ट पर दस लाख लीटर तो सिर्फ पेशाब ही जमा हो गया है, जबकि पॉलिथीन, प्लास्टिक, खाली बोतलें, शव और हेलीकॉप्टर के कचरे की तो कोई सीमा ही नहीं है। इसलिए पवर्तारोहण से जुड़ी संस्थाओं को एवरेस्ट को बचाने के लिए अब अभियान दलों को हरी झंडी देना बंद कर देना चाहिए और पर्वतारोहण के लिए नए शिखरों की तलाश की जानी चाहिए।

दुनिया के जाने-माने पर्वतारोही भी अब चेतावनी भरे स्वर में सलाह देने लगे हैं कि यदि पर्वतारोहण अभियानों की बढ़ती संख्या पर रोक नहीं लगाई गई तो माउंट एवरेस्ट का पारिस्थितिकीय संतुलन विनाशकारी ढंग से बिगड़ सकता है। कुछ पर्वतारोहियों का कहना है कि कुछ दशक पहले जहां एवरेस्ट अभियान पर एक-दो दल ही जाते हैं, वहीं अब एक ही सीजन में दर्जनों टीमें एवरेस्ट पर जाती हैं। कुछ विशेषज्ञ यह सलाह भी दे रहे हैं कि जब तक एवरेस्ट को पूरी तरह मलबा रहित नहीं कर दिया जाता, तब तक कुछ समय के लिए पर्वतारोहण पर रोक लगा देनी चाहिए। नेपाल में सागरमाथा प्रदूषण समिति के अध्यक्ष का भी कहना है कि माना, पर्वतारोहण से सरकारों को आमदनी होती है, लेकिन इस प्रकार हिमालय के पर्यावरण को नष्ट करने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

स्थिति की गंभीरता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि यूरोप के पर्यावरण विभाग के अनुसार पूरे एवरेस्ट पर पर्वतारोहियों के चलते हजारों टन कूड़ा इस समय मौजूद है और 2008 से लगातार चल रहे एवरेस्ट सफाई अभियान के बावजूद इसमें साल दर साल बढ़ोतरी हो रही है, जो बेहद चिंताजनक है। हालांकि एवरेस्ट पर फैलती गंदगी पर नियंत्रण के उद्देश्य से नेपाल सरकार ने वर्ष 2014 से एवरेस्ट पर चढ़ाई से पहले पर्वतारोहियों से चार हजार डॉलर जमा कराने शुरू किए हैं और नियम यह है कि एवरेस्ट से वापस लौटते समय हर पर्वतारोही को कम से कम आठ किलो कचरा अपने साथ लेकर लौटना होगा, वरना उनके जमा चार हजार डॉलर वापस नहीं किए जाएंगे। सागरमाथा प्रदूषण नियंत्रण समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 में नेपाल के पर्वतारोही करीब पच्चीस टन कचरा और पंद्रह टन मानव अपशिष्ट लेकर नीचे लौटे, जिनका कुल वजन तीन डबल डेकर बसों के बराबर बताया जाता है। आठ किलो कचरा वापस लेकर न लौटने पर चार हजार डॉलर की जमानत राशि जब्त होने के नियम के बावजूद स्थिति यह है कि सिर्फ आधे पर्वतारोही कचरा वापस लेकर लौटते हैं।

वैश्विक तापमान में दिनोंदिन हो रही बढ़ोतरी भी इस समस्या को विकराल बनाने में अहम भूमिका निभा रही है। दरअसल, एवरेस्ट के रास्ते पर हिमनदों के पिघलने से बरसों से बर्फ के नीचे दबा कचरा भी अब बाहर आने लगा है और कचरे का ढेर बढ़ता जा रहा है। हालांकि एवरेस्ट पर कचरे को कम करने के सतत प्रयास कुछ वर्षों से निरंतर किए जा रहे हैं, लेकिन एवरेस्ट को कचरामुक्त करने के उद्देश्य में आशातीत सफलता नहीं मिल सकी है। चिंता की बात यह भी है कि एवरेस्ट पर मलबे की सफाई की दिशा में कई स्वयंसेवी संस्थाएं तो सराहनीय कार्य कर रही हैं, मगर इसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस कार्यक्रम अभी तक नहीं चलाया गया है। बहरहाल, एवरेस्ट पर बढ़ता कचरा गंभीर पर्यावरणीय खतरे की चेतावनी है।

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