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राजनीति: आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां

भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र नहीं है। केंद्र और राज्यों के टकराव और क्षेत्रीय राजनीति इसमें बाधक बनी हुई है। पुलिस की भारी कमी है और आतंकवाद से मुकाबले के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं है। आइबी और रॉ के बीच कई मौकों पर तालमेल की कमी सामने आई है। आतंकियों का कोई केंद्रीय डाटाबेस भी नही है। सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा भगवान भरोसे है और एचडी (हाई डेफिनेशन) कैमरों की संख्या नगण्य है।

Author November 26, 2018 4:51 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

ब्रह्मदीप अलूने

इस महीने की शुरुआत में आई एक खुफिया रिपोर्ट में कश्मीर घाटी में जाकिर मूसा और हिजबुल मुजाहिदीन के साथ मिल कर हमला करने की योजना से संबंधित संकेत दिया गया था। इसके लगभग बीस दिन पहले जलंधर से कुछ छात्र हथियारों के साथ पकड़े गए थे, जिनके संबंध आइएस की भारतीय शाखा आतंकी संगठन अंसार गजवत-उल-हिंद से होने की बात सामने आई थी। अंसार गजवत-उल-हिंद का मुखिया जाकिर मूसा है और उसकी शिक्षा पंजाब में हुई है। खुफियां एजंसियों के संज्ञान में इन खतरों के होने के बाद भी जाकिर मूसा पंजाब में प्रवेश करने में कामयाब हो गया और इसकी पुष्टि पंजाब पुलिस ने भी की। अमृतसर में पुलिस ने आतंकी जाकिर मूसा के पोस्टर शहर भर में लगाए। पुलिस की चौकसी और सुरक्षा व्यवस्था के चाक-चौबंद होने के दावों के बाद भी 19 नवंबर को अमृतसर से दस किलोमीटर दूर एक गांव में स्थित निरंकारी भवन पर हुए संदिग्ध चरमपंथी हमले में तीन लोग मारे गए और कई घायल हो गए। हमला किसने और क्यों किया, इसका अभी तक खुलासा नहीं हो पाया है। तमाम आशंकाओं के बीच मूसा गायब है।

दरअसल 26 नवंबर, 2008 को मुंबई हमले के बाद खुफिया तंत्र के कायापलट की बात कही गई थी। 2008 में संसद द्वारा राष्ट्रीय जांच एजंसी अधिनियम भी बनाया गया था। इस अधिनियम के अनुसार एनआइए का अधिकार क्षेत्र समवर्ती है। इससे केंद्र देश के किसी भी भाग में आतंकवादी हमले, देश की एकता और अखंडता के खतरे, बम विस्फोटों, हवाई जहाज या समुद्री जहाज के अपहरण और परमाणु प्रतिष्ठानों पर हमलों से संबंधित मामलों की जांच कर सकता है। इसके अतिरिक्त जाली मुद्रा, मानव तस्करी, ड्रग्स या मादक पदार्थ, संगठित अपराध, परमाणु ऊर्जा अधिनियम का उल्लंघन, सामूहिक विनाशक हथियार से संबंधित अपराध भी इसके अधिकार क्षेत्र में आते हैं।

इस समय देश की सुरक्षा की जिम्मेदारी उठाने वाली प्रमुख एजंसियों में खुफिया ब्यूरो, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (रॉ), नेशनल टेक्नीकल रिसर्च आर्गेनाइजेशन (एनटीआरओ), डिफेंस इंटेलीजेंस एजेंसी (डीआइए), सैन्य खुफिया इकाई, राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआइ) और केंद्रीय आर्थिक खुफिया ब्यूरो (सीईआइबी) शामिल हैं। इन एजंसियों पर सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। इन एजंसियों द्वारा दी जा रही गोपनीय सूचनाओं की बात की जाए तो इसमें गोपनीयता जैसा कुछ नजर नहीं आता, जबकि एजंसियों में आपसी तालमेल की जगह अंतर्द्वंद्व की आशंका ज्यादा दिखाई पड़ती है। मुंबई हमले के बाद साल 2009 में बनाई गई राष्ट्रीय जांच एजंसी राज्यों के आतंक निरोधी दस्तों (एटीएस) और आइबी के साथ कई मामलों में आमने-सामने होती है। गौरतलब है कि महाराष्ट्र एटीएस ने 13 फरवरी, 2010 को हुए जर्मन बेकरी ब्लास्ट की जांच एनआइए को सौपने से इंकार कर दिया था। एजंसियों में समन्वय का अभाव इतना ज्यादा है कि वे सूत्र तक उजागर नहीं करतीं और निर्णायक सूचनाओं को अपने पास ही दबाकर रखती है ताकि उसका श्रेय खुद ले सकें। वर्तमान में आतंकवाद निरोधक आपरेशनों के लिए विभिन्न राज्यों की पुलिस के साथ आइबी समन्वय की भूमिका निभाती है। परंतु एक ही समय में कई जगह आपरेशन एक साथ करना हो तो इसके लिए कोई एकीकृत कमान नहीं है। आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिस की होती है, लेकिन राज्य पुलिस सुधारों को लागू करने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं।

देश में आतंकवाद से निपटने के लिए एनसीटीसी या राष्ट्रीय आतंकवाद निरोधक केंद्र को तत्कालीन सरकार ने मार्च 2012 में मंजूरी दी थी। उस समय इसे सभी राज्यों की मंजूरी मिलना आवश्यक बताया गया था। लेकिन बिहार, तमिलनाडु, ओड़िशा, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के विरोध के बाद इसे रोक लिया गया। इसे आइबी के मातहत काम करना था और इसके सहायक अंगों में एनआइए, नैटग्रिड, एनएसजी और एएमसी का होना था। इस समय भारत में आतंकवाद से निपटने के लिए एकल केंद्र नहीं है। केंद्र और राज्यों के टकराव और क्षेत्रीय राजनीति इसमें बाधक बनी हुई है। पुलिस की भारी कमी है और आतंकवाद से मुकाबले के लिए वह बिलकुल तैयार नहीं है। आइबी और रॉ के बीच कई मौकों पर तालमेल की कमी सामने आई है। आतंकियों का कोई केंद्रीय डाटाबेस भी नही है। सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा भगवान भरोसे है और एचडी (हाई डेफिनेशन) कैमरों की संख्या नगण्य है। धार्मिक स्थलों की अधिसंख्यता बड़ी चुनौती है। कट्टरपंथी तत्वों को दूर रखने और उनसे सख्ती से निपटने की कोई नीति अभी तक कारगर नहीं हो पाई है। आतंकवाद निरोधक कड़े कानूनों की कमी साफ दिखती है। आतंकियों के वित्तीय संसाधन अभी भी जीवित हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और घुसपैठ की समस्या बड़ी चुनौती है। इन सबसे बढ़ कर भारत में सामरिक संस्कृति का अभाव जानलेवा हो जाता है।

अमेरिका में 9/11 के आतंकी हमले के बाद आतंकवाद निरोधी केंद्र (एनसीटीसी) सभी एजंसियों में समन्वय का काम करता है। साल 2001 में हुए दुनिया के सबसे बड़े आतंकी हमले से सबक लेते हुए अमेरिका ने देश की पूरी सुरक्षा व्यवस्था का पुनरावलोकन करते हुए सुरक्षा एजंसियों के कामकाज को व्यवस्थित और जिम्मेदारियों को सुनिश्चित किया। 2002 में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अमेरिका की सुरक्षा के लिए एकल केंद्रीकृत- डिपार्टमेंट आॅफ होमलैंड सिक्योरिटी तैयार किया। इस समय आतंकवाद के खिलाफ भारत की तैयारियों के स्तर का विश्लेषण किया जाए तो आतंकवाद विरोधी एजंसियों का काम सूचना एकत्रित करना, अभियान चलाना, जांच करना और अभियोजन शामिल है। मुंबई हमले के बाद हमारा सूचना तंत्र अभी भी नाकाम नजर आता है। हमले की आशंका और सूचना के बाद भी यह पता लगाना मुश्किल होता है कि हमला किस जगह होगा और इसी कारण आतंकी अपने इरादों में कामयाब हो जाते हैं। भारत में आतंकी हमलों के सूत्रधार हिजबुल मुजाहिदीन सरगना सैयद सलाउद्दीन, जैश-ए-मोहम्मद का मुखिया मसूद अजहर, दाऊद इब्राहीम और मुंबई हमले के लिए आतंकियों के प्रशिक्षण का जिम्मा संभालने वाले जकीउर रहमान लखवी पड़ोसी देश में खुलेआम घूम रहे हैं, लेकिन उन्हें गिरफ्तार करने या मार गिराने में भारत अभी तक कामयाब नहीं हो पाया है।

भारत में पिछले कुछ सालों में साइबर हमले तेजी से बढ़े हैं। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति 2013 से अस्तित्व में है, जिसका काम देश में इंटरनेट और डिजिटल प्रणालियों को सुरक्षित बनाना है। लेकिन हकीकत यह है कि सुरक्षा नीति के प्रमुख उद्देश्य को स्थापित करने के लिए महत्त्वपूर्ण बुनियादी ढांचा अभी तक नहीं बन पाया है। बैंक, शेयर बाजार, हवाई यातायात और रक्षा प्रतिष्ठानों में हैकर कई बार सेंध लगा चुके हैं। यह गंभीर चुनौती है।

मुंबई हमले के लिए आतंकियों ने समुद्री रास्ता चुना था। इस हमले के एक दशक बीत जाने के बाद भी तटीय सुरक्षा एकीकृत नहीं है, जिससे एक-एक बोट का हिसाब रखना मुश्किल है। तटीय सुरक्षा के इंतजाम नाकाफी होने के कारण बड़े शहरों समेत कच्छ से लेकर बलसाड़ तक बने भारत के विशाल औद्योगिक संयंत्रों पर आतंकी हमलों का खतरा बना हुआ है। जाहिर है, भारतीय सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए आंतरिक और बाह्य मोर्चों पर अभी बहुत काम करने की जरूरत है।

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