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पानी के लिए दलितों का संघर्ष

दलितों को पानी लेने के लिए कई प्रकार की लड़ाई लड़नी पड़ती है। कई जगहों पर हैंडपंप से पानी लेने के लिए समय तय हैं। तय समय का सख्ती से पालन किया जाता है। अगर तय समय पर पानी नहीं ले सके तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। इसे लेकर कई बार झगड़े होते हैं, गांव की पंचायत में निपटारा नहीं होने की दशा में ऐसे झगड़े पुलिस और कोर्ट तक पहुंच जाते हैं।

Author December 27, 2018 4:15 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (फाइल)

प्रदीप श्रीवास्तव

हमारे देश की सभ्यता के सामाजिक पहलू में जाति प्रथा का कलंक घुला हुआ है। दुनिया की दूसरी बहुत-सी सभ्यताओं से बिल्कुल अलग भारत की सामाजिक संरचना में हजारों सालों तक एक वर्ग को गुलाम बनाने की संस्कृति शायद ही मिले। जाति व्यवस्था में अस्पृश्यता के नाम पर दलितों को निचले पायदान पर रखते हुए बुनियादी सुविधाओं से भी महरूम रखा गया है। दलितों के साथ पानी को लेकर होने वाला भेदभाव सबसे कम चर्चित विषयों में रहा है। जहां पानी की पर्याप्त उपलब्धता है, वहां से दलितों ने किसी तरह से तालाब, नहर, नदी, कुएं आदि से पानी पा लिया, लेकिन बुंदेलखंड जैसे सूखे इलाकों में आज भी दलितों को पानी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। बुंदेलखंड के पिछड़े व सामंती इलाकों में दलितों को पानी के लिए सवर्णों की दया पर जिंदा रहना पड़ता है, जो विरोध करते हैं वे थाने-मुकदमे के चक्कर में फंस जाते हैं।

शब्दकोशों में दलित शब्द का अर्थ- मसला हुआ, मर्दित, दबाया, रौंदा या कुचला हुआ, पीड़ित, शोषित, दबा हुआ, खिन्न, उदास, टुकड़ा, खंडित, तोड़ना, पीसा हुआ आदि लिखा है। डाक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी दलित आंदोलन के दौरान यह शब्द हिंदू समाज व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर स्थित हजारों वर्षों से अस्पृश्य या अछूत समझी जाने वाली तमाम जातियों के लिए सामूहिक रूप से प्रयोग किया है। हिंदू धर्म शास्त्रों द्वारा हिंदू समाज व्यवस्था में सबसे निचले (चौथे) पायदान पर स्थित शूद्र ही दलित है। संवैधानिक भाषा में इन्हें अनुसूचित जाति कहा गया है। ऐतिहासिक रूप से करीब दस हजार साल पहले कबीलाई समाज व्यवस्था के बाद सामंती व्यवस्था के प्रांरभ में समाज में कर्म के आधार पर बांट कर कुछ जातियों को अपनी बुद्धि, बल और क्षमता के आधार पर समाज में बढ़ने, फैलने-फूलने के सभी दरवाजे बंद कर दिए। बाद में धर्मों ने शूद्रों पर अपवित्र और अस्पृश्य होने का कलंक और मढ़ दिया।

हालांकि, पिछले छह-सात दशकों में दलित शब्द का अर्थ काफी बदल गया है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या में लगभग 16.6 फीसद यानी 20.14 करोड़ आबादी दलितों की है। दलितों में महिला और पुरुष का लिंग अनुपात 936 प्रति हजार है, जो सवर्ण हिंदुओं (931) और सिखों (893) के लिंग अनुपात से काफी बेहतर है। दलितों में साक्षारता दर (54.70 फीसद) है, जो सवर्ण हिंदुओं (65.1), मुसलमानों (59.1) और सिखों (69.4) की तुलना में काफी कम है। काम में भागीदारी के मामले में दलित सबसे आगे हैं। इसका फीसद 48.4 है, जो सवर्ण हिंदुओं (40.4), मुसलमानों (31.3), ईसाई (39.3) और सिखों (31.7) की तुलना में काफी अधिक है।

वैसे तो भारत में दलितों ने गुलामी के साथ ही आंदोलन शुरू कर दिया था। लेकिन आधुनिक भारत में व्यवस्थित तरीके से दलित आंदोलन की शुरुआत ज्योतिबा राव फुले और सावित्री बाई फुले के समय से मानी जाती है। वे जाति से माली थे और उन्हें पानी लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। दलितों को समाज शिक्षा की वकालत करते हुए उन्होंने दलित आंदोलनों का सूत्रपात किया। लेकिन इसे समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम बाबा साहेब आंबेडकर ने किया। 25 दिसंबर, 1927 को महाड़ (महाराष्ट्र) में अपने एक सत्याग्रह के दौरान डा. आंबेडकर ने मनुस्मृति जला डाली। उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर दलितों को पानी लेने का भी ऐलान किया, क्योंकि सभी कुदरती साधन और व्यवस्थाएं सभी इंसानों के लिए हैं। यूरोप में भी पुनर्जागरण और ज्ञानोदय आंदोलनों के बाद ही मानवीय मूल्यों का महिमामंडन हुआ और यही मानवीय मूल्य यूरोप की क्रांति के आदर्श बने। इन आदर्शों की जरिए ही यूरोप में एक ऐसे समाज की रचना की गई, जिसमें मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी गई। इसका सीधा असर भारत पर पड़ना लाजिमी था और पड़ा भी। भारतीय संविधान की प्रस्तावना से लेकर सभी अनुच्छेद इन्हीं मानवीय अधिकारों की रक्षा करते नजर आते हैं।

आधुनिक भारत में भी दलितों पर अत्याचार रुका नहीं है। 1990 के दशक में उदारीकरण के बाद तो दलितों की स्थिति और खराब हुई है। इधर, एक दशक में ग्रामीण इलाकों में दलितों व गैर-दलितों के बीच सत्ता के असंतुलन ने कोढ़ में खाज पैदा कर दी। दलितों पर जुल्मों की तादाद तेजी से बढ़ी है। राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक देश में साल 2014 में दलितों के खिलाफ 47,064 अपराध हुए, यानी औसतन हर घंटे दलितों के खिलाफ पांच से ज्यादा (5.3) के साथ अपराध हुए। कुएं से पानी नहीं भरने देने जैसी मामूली घटनाओं को लेकर 2004 से 2013 के दरम्यान दस सालों में 6490 दलितों की हत्याएं हुईं।
अब बात करते हैं बुंदेलखंड की। इसका कोई आधिकारिक नक्शा तो नहीं है, लेकिन भौगोलिक स्थिति, भाषा और संस्कृति की समानता को देखते हुए यह मध्य प्रदेश के सात और उत्तर प्रदेश के छह जिलों से मिल कर बनता है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार बुंदेलखंड की आबादी करीब एक करोड़ अस्सी लाख है। इनमें एक करोड़ पुरुष और अस्सी लाख महिलाएं शामिल हैं। बुंदेलखंड की करीब अस्सी फीसद आबादी गांवों में निवास करती है। इनमें भी पच्चीस से तीस फीसद आबादी दलितों की है, यह आबादी गांवों के बाहरी हिस्से में उपेक्षित रह कर गुजर बसर करने को मजबूर है। बुंदेलखंड न सिर्फ औद्योगिक व सांस्कृतिक रूप से पिछड़ा है, बल्कि यहां के समाज में सामंती मूल्य भी गहराई तक जड़ें जमाए हुए हैं। जाति व्यवस्था चरम पर है। दलितों से भेदभाव के मामले में भी बुंदेलखंड की स्थिति काफी खराब है। सूखे के कारण पानी को लेकर होने वाले झगड़ों में भी दलितों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जाता है। दलितों के साथ भेदभाव की हालत यह है कि गांवों में मनरेगा में काम के दौरान भी दलितों को उपेक्षा सहनी पड़ती है।

ऐसे माहौल में दलितों को पानी तक के लिए ज्यादा ही संघर्ष करना पड़ता है। पुराने समय में हर साल पड़ने वाले सूखे को देखते हुए बुंदेलखंड में सैकड़ों की संख्या में तालाब और कुएं बनाए गए। गांवों के आसपास एक-दो तालाब और गांव के अंदर दो-चार कुएं जरूर मिल जाएंगे। यहां तक की कई गांवों में आबादी के बीच में ही तालाब हैं, जिससे सभी को आसानी से पानी मिलता रहे, लेकिन तब भी दलितों को पानी के लिए तरसना पड़ता था और अब भी तरसना पड़ता है। पहले तालाबों और कुएं पर सवर्णों ने कब्जा कर रखा था, अब सरकारी हैंडपंपों पर उनका अधिकार है। गांव के हैंडपंप तो वह छू नहीं सकते हैं, लेकिन स्कूल के हैंडपंप जरूर उनके लिए वरदान साबित हुए हैं। दलितों को पानी लेने के लिए कई प्रकार की लड़ाई लड़नी पड़ती है। कई जगहों पर हैंडपंप से पानी लेने के लिए समय तय हैं। तय समय का सख्ती से पालन किया जाता है। अगर तय समय पर पानी नहीं ले सके तो घंटों इंतजार करना पड़ता है। इसे लेकर कई बार झगड़े होते हैं, गांव की पंचायत में निपटारा नहीं होने की दशा में ऐसे झगड़े पुलिस और कोर्ट तक पहुंच जाते हैं।

कई जातियों के घर अक्सर गांव के बाहर होते हैं, इसलिए इस वर्ग की महिलाओं या पुरुषों को गांव के अंदर के हैंडपंपों से पानी लेने की इजाजत नहीं है। हैंडपंप खराब होने की दशा में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। दलितों को हैंडपंप सुधारने के लिए किसी अपने जैसे ही दलित मिस्त्री को ढूंढ़ना पड़ता है। गांवों में तो ऐसे मिस्त्री मिलते नहीं है, उन्हें महंगे दामों पर आसपास के शहर उन्हें लाना पड़ता है। दलितों का एक हैंडपंप सुधरने में कई-कई दिन लग जाते हैं। तब तक इन्हें गांव के सरकारी स्कूलों से पानी भरना पड़ता है।

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