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राजनीति: बेरोजगारी का दंश

नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से तो देश में बेरोजगारी में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई है। इससे युवाओं में हताशा बढ़ी है। अलवर की घटना इसी हताशा का एक उदाहरण मात्र है। भारत में हर साल लाखों लोग रोजगार पाने की कतार में जुड़ रहे हैं। लेकिन रोजगार का औसत लगातार घटता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएल ओ) की रिपोर्ट भी अनुकूल नहीं है।

Author December 5, 2018 5:15 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: pixabay)

देवेंद्र जोशी

‘नौकरी लगेगी नहीं तो जीने से क्या फायदा’ यह कहते हुए चार नौजवान चलती हुई ट्रेन के सामने कूद गए। इनमें से तीन की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया। राजस्थान के अलवर जिले की इस घटना ने एक बार फिर देश में बेरोजगारी की भयावहता की ओर ध्यान आकृष्ट किया है। यह कोई पहला अवसर नहीं है जब बेरोजगारी को लेकर शिक्षित युवाओं को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। पिछले साल आइटी कंपनियों में छंटनी के दौरान एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने पुणे में चार मंजिला इमारत से कूद कर आत्महत्या कर ली थी। आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले के रहने वाले इस 25 वर्षीय नौजवान गोपीकृष्णन ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि आइटी कंपनियों में नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है। इसका मतलब साफ है कि जो शिक्षित युवाओं की फौज आ रही है, उन्हें नौकरी नहीं मिल रही है और जो पहले से नौकरी में हैं उनके सिर पर छंटनी की तलवार लटक रही है। ऐसे में देश के शिक्षित बेरोजगार युवा घुट-घुट कर दुविधा और असमंज की जिंदगी जी रहे हैं।

बांबे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और सेंटर फॉर मानिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) की ओर से मार्च, 2018 में जारी एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में बेरोजगारी का औसत बढ़ कर 6.23 फीसद हो गया है। गांवों में यह 5.95 और शहरों में 6.76 फीसद दर्ज हुआ है। नोटबंदी और जीएसटी लागू होने के बाद से तो देश में बेरोजगारी में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई है। इससे युवाओं में हताशा बढ़ी है। अलवर की घटना इसी हताशा का एक उदाहरण मात्र है। भारत में हर साल लाखों लोग रोजगार पाने की कतार में जुड़ रहे हैं। लेकिन रोजगार का औसत लगातार घटता जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएल ओ) की रिपोर्ट भी अनुकूल नहीं है। उसके मुताबिक भारत में बेरोजगारों की संख्या इस वर्ष के अंत तक बढ़ कर एक करोड़ छियासी लाख का अनुमान है, जबकि 2017 में यह आंकड़ा एक करोड़ तिरासी लाख का था।

आइएलओ ने विश्व रोजगार और सामाजिक आउटलुक रुझान-2018 नामक रिपोर्ट में भारत की बेरोजगार पर चिंता जताते हुए कहा है कि 2018 तक भारत में बेरोजगारों की संख्या मे तीस लाख की बढ़ोतरी होगी। ये तमाम आंकड़े देश में बेरोजगारी की विकरालता की कहानी बयान कर रहे हैं। केंद्रीय श्रम और रोजगार राज्यमंत्री ने संसद में रोजगार के आंकड़ों को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में कहा था कि भारत सरकार ने 2016 से देश में रोजगार के वास्तविक आंकड़ों को जानने के लिए कोई देशव्यापी सर्वे नहीं कराया है। सच्चाई से मुंह मोड़ने के लिए भले ही सर्वे करने या आंकड़े जारी करने से सरकार बचने का जतन करती रहे, लेकिन बेरोजगारी की भयावहता का जो मंजर है, वह रोजगार क्षेत्र में छाई मंदी और नौकरियों में छंटनी के रूप में साफ देखा जा सकता है।

सीएमआइई ने 2017 के शुरुआती चार महीनों को लेकर एक सर्वे कराया था। इसमें चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। मालूम पड़ा कि जनवरी से अप्रैल, 2017 के बीच करीब पंद्रह लाख लोगों ने नौकरी गंवाई और बेरोजगारी का स्तर बढ़ा। संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन ने भी 2018 में भारत में बेरोजगारी का स्तर बढ़ने की आशंका जताई है। उसकी रिपोर्ट के अनुसार 2015 में सिर्फ एक लाख 35 हजार लोगों को ही नौकरी मिली। हर दिन साढ़े पांच सौ नौकरियां खत्म हो रही हैं। आइएलओ के आंकड़ों के मुताबिक भारत दुनिया का सबसे ज्यादा बेरोजगार देश बन गया है। यहां 11 फीसद आबादी अर्थात करीब बारह करोड़ लोग बेरोजगार हैं। श्रम ब्यूरो की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले चार सालों में रोजगार बढ़ाने के नाम पर विदेशी निवेश की सीमा तो बढ़ा दी गई, लेकिन उस रफ्तार से रोजगार का सृजन नहीं हुआ। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्किल इंडिया और स्टार्टअप जैसी योजनाएं जोर-शोर से शुरू की गर्इं, इनके प्रचार-प्रसार पर करोड़ों रुपए खर्च भी किए गए, लेकिन बेरोजगारी दूर करने में ये योजनाएं कारगर साबित नहीं हो सकीं।

युवाओं का देश कहलाने वाले भारत में युवा रोजगार की हकीकत यह है कि उत्तर प्रदेश सचिवालय में चपरासी के मात्र तीन सौ अड़सठ पदों के लिए तेईस लाख लोगों ने आवेदन किया था, और आश्चर्य की बात यह कि इनमें बड़ी संख्या में उच्च शिक्षित युवा भी शामिल थे। देश में नौकरी की तलाश में शिक्षित युवाओं की फौज खड़ी है। हमारी शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी खामी यह है कि वह डिग्रीधारी निरक्षरों की संख्या बढ़ाने का काम कर रही है। यदि वाकई शिक्षा गुणवत्तापूर्ण और रोजगार-मूलक होती तो चपरासी के पद के लिए इतने आवेदन नहीं आते। आज के युवा डिग्रीधारी निरक्षर की श्रेणी में इसलिए आ गए हैं कि उनमें अपनी ज्ञान परंपरा से कट जाने के कारण पारंपरिक रोजगार से जुड़ने का साहस खत्म हो गया है। इसीलिए हर कोई नौकरी की तरफ भाग रहा है। यही वजह है कि आज चालीस फीसद से अधिक खेती-किसानी से जुड़े लोग वैकल्पिक रोजगार मिलने की स्थिति में खेती छोड़ने को तैयार हो जाते हैं।

बेरोजगारी को देश की मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के स्तर से अलग करके नहीं देखा जा सकता। देश के सत्तावन फीसद छात्रों के पास रोजगार प्राप्त करने की क्षमता प्रदान करने वाला कौशल ही नहीं है। नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का भी मानना है कि भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य पर किसी भी सरकार ने समुचित ध्यान नहीं दिया। आर्थिक विकास का आधार मानवीय क्षमता का विकास है। यदि मानवीय क्षमता में वृद्धि नहीं होगी और कौशल विकास युक्त श्रम शक्ति उपलब्ध नहीं होगी तो आर्थिक विकास स्थायी रूप नहीं ले सकता। रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना और लोगों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना किसी भी सरकार का प्रमुख दायित्व है। सबसे बड़ी जरूरत यह है कि शिक्षा और रोजगार को आपस में जोड़ा जाए। छात्रों के भीतर नए-नए कौशल की क्षमता पैदा की जाए। इसके लिए शिक्षा नीति में बदलाव जरूरी है।

अपनी जिंदगी के सुनहरे 20-22 वर्ष और लाखों रुपए शिक्षा में गंवाने के बाद देश के युवा जब हाथ में डिग्री लिए नौकरी के बाजार में पहुंचते हैं तो उन्हें पता चलता है कि उनकी डिग्री किसी काम की नहीं है। ऐसे में मन मसोस कर रोजी रोटी के जुगाड़ में जो काम मिलता है, उसे ही वे अपनी किस्मत मान लेते हैं। इसी का नतीजा है कि इंजीनियर, एमबीए, एमसीए जैसे डिग्रीधारी भी आज बेरोजगार हैं, या फिर किसी दूसरे ऐसे काम में लगे हैं जिनका उनकी हासिल शिक्षा और डिग्री से कोई सरोकार नहीं है। अकादमिक शिक्षा की तरह ही बाजार मांग के मुताबिक उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा भी उतनी ही जरूरी है। हाल में आए एक आंकड़े के मुताबिक देश के पिनच्यानवे फीसद इंजीनियर डवलपमेंट के क्षेत्र में काम करने योग्य नहीं है।

सच तो यह है कि आज तक कोई ऐसा पैमाना नहीं बन पाया है जो यह बता सके कि किस विषय को पढ़ कर कोई विद्यार्थी रोजगार की कसौटी पर खरा उतर सकता है। बच्चों की रुचि की बात सब करते हैं, लेकिन जब विषय या संकाय चयन का मौका आता है तो अपनी उसी सीमित विकल्पों वाली मनमर्जी की परिपाटी को उस पर थोप दिया जाता है। यही वजह है कि जहां आइआइटी से निकले इंजीनियर नाकारा साबित हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कौशल विकास के अभाव में देश के लोगों को बिजली मिस्त्री, प्लंबर, मैकेनिक, खाती, दर्जी आदि का काम करने वाले योग्य प्रशिक्षित लोगों के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। तकनीकी शिक्षा पर ज्यादा जोर दिए जाने का ही नतीजा है कि आज भाषा और समाज विज्ञान के शिक्षकों की कमी महसूस की जाने लगी है।

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