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भ्रष्टाचार की गहराती जड़ें

भारत जैसे देश के संदर्भ में भ्रष्टाचार को मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखना इसलिए भी दिवास्वप्न बना हुआ है कि यहां मानवाधिकार जैसा विषय अभी भी एक रस्म अदायगी ही है। देश में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने और लोगों को इनके प्रति जागरूक बनाने के कभी भी प्रयास नहीं किए गए। देश में राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोगों का गठन तो कर दिया गया है, लेकिन इन आयोगों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे यह कहा जा सके कि वास्तव में मानवाधिकार संरक्षण के लिए कुछ किया जा रहा है।

Author January 11, 2019 3:30 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

संजय ठाकुर

देश में जैसे-जैसे भ्रष्टाचार की जड़ें गहराती जा रही हैं, मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी विस्तार होता जा रहा है। भ्रष्टाचार का मामला मानवाधिकारों के उल्लंघन का भी विषय है। भ्रष्टाचार एक व्यक्ति को देश के संविधान द्वारा सुनिश्चित जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा जैसे अधिकारों से तो वंचित करता ही है, साथ ही यह संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित वैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा का भी उल्लंघन है। इस तरह से देखें तो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में नाकाम देश संयुक्त राष्ट्र की नजर में भी दोषी हो जाते हैं। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के अनुसार मानवाधिकारों से तात्पर्य देश के संविधान द्वारा सुनिश्चित या 16 दिसंबर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित वैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदा में सम्मिलित और भारत के न्यायालयों द्वारा लागू जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा से संबंधित अधिकारों से है। कानून की परिभाषा के अनुसार भ्रष्टाचार, जो एक व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा पर कुठाराघात है, सीधे तौर पर मानवाधिकारों पर हमला है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात को पक्के तौर पर स्थापित किया है कि भ्रष्टाचार मानवाधिकारों का उल्लंघन करता है।

सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार भ्रष्टाचार एक दंडनीय अपराध तो है ही, यह मानवाधिकारों को भी कमजोर करता है। इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी चिंता जताई है कि ऐसे मामलों में न्यायालय दोषियों को कभी-कभार ही दंडित कर पाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय का यह भी कहना है कि व्यवस्थागत भ्रष्टाचार अपने-आप में मानवाधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि यह व्यवस्थागत आर्थिक अपराधों को जन्म देता है। भ्रष्टाचार निश्चित रूप से लोगों से जीवन, स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा जैसे अधिकारों को छीनता है। भ्रष्टाचार जहां जीवन के अधिकार के सामने एक अवरोध की तरह खड़ा होता है, वहीं यह एक व्यक्ति से उसकी स्वतंत्रता भी छीन लेता है। जीवन के लिए यह एक भारी अवरोध ही है कि एक व्यक्ति के विकास के मार्ग को ही बाधित कर दिया जाए। वरना कोई कारण नहीं कि एक योग्य और सक्षम व्यक्ति विकास के मार्ग पर आगे न बढ़ पाए। उसी प्रकार जब भ्रष्टाचार किसी व्यक्ति के सामने कई प्रकार की शर्तों के रूप में खड़ा रहेगा तो मनुष्य सही जीवन जीने और विकास के लिए कहां स्वतंत्र रह पाएगा!

समानता भी तब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है जब दो व्यक्तियों के लिए योग्यता और सक्षमता के अतिरिक्त लाभ-प्राप्ति के अलग-अलग मापदंड निर्धारित किए जाते हैं। फिर वह चाहे किसी पद पर नियुक्ति का सवाल हो या पदोन्नति का मामला। यही मसला भेदभाव की खाइयां पैदा करता है। भ्रष्टाचार के दलदल में धंसने को मजबूर किए जा रहे व्यक्ति की प्रतिष्ठा हमेशा ही सवालों के घेरे में रहेगी। इस तरह से देखें तो देश के संविधान में वर्णित जीवन स्वतंत्रता, समानता और प्रतिष्ठा जैसे अधिकारों को भ्रष्टाचार कितनी आसानी से निगल जाता है!

किसी भी देश या समाज में दुर्व्यवस्था के पीछे वहां व्याप्त भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा हाथ होता है। भ्रष्टाचार के ऐसे प्रसार के चलते एक व्यक्ति के वैधानिक, राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार हमेशा ही खतरे में रहते हैं। किसी भी देश या समाज में यह एक व्यक्ति का अधिकार है कि उसे भ्रष्टाचार-मुक्त ऐसी शासन व न्यायिक व्यवस्था मिले जहां वह अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन कर सके। एक ऐसी शासन व न्यायिक व्यवस्था जिसमें भ्रष्टाचार का बोलबाला होगा, में कोई भी व्यक्ति न तो उपलब्ध अधिकारों का उपयोग ही कर सकता है और न देश या समाज के विकास में योगदान दे सकता है। इस तरह देश और व्यक्ति दोनों ही विकास की दौड़ में पिछड़ जाते हैं। ऐसी दुर्व्यवस्था भ्रष्टाचार के ही इर्द-गिर्द घूमती है। भ्रष्ट शासन व न्यायिक प्रणाली व्यक्ति को पूरी तरह से हताश कर देती है जिससे वह अपनी क्षमताओं का भरपूर उपयोग करने में असमर्थ रहता है। किसी भी देश में व्यक्ति को पूर्ण विकास के लिए अवसर भ्रष्टाचार-मुक्त समाज में ही दिए जा सकते हैं।

भारत जैसे देश के संदर्भ में भ्रष्टाचार को मानवाधिकार उल्लंघन के रूप में देखना इसलिए भी दिवास्वप्न बना हुआ है कि यहां मानवाधिकार जैसा विषय अभी भी एक रस्म अदायगी ही है। देश में केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा मानवाधिकारों को सुनिश्चित करने और लोगों को इनके प्रति जागरूक बनाने के कभी भी प्रयास नहीं किए गए। देश में राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोगों का गठन तो कर दिया गया है, लेकिन इन आयोगों में ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे यह कहा जा सके कि वास्तव में मानवाधिकार संरक्षण के लिए कुछ किया जा रहा है। देश के ऐसे भी गिने-चुने ही राज्य हैं जहां मानवाधिकार आयोगों की स्थापना की जरूरत महसूस की गई है। राज्य स्तर के इन मानवाधिकार आयोगों का यह हाल है कि जिन लोगों को मानवाधिकार संरक्षण का जिम्मा सौंपा जाता है उन्हें न तो मानवाधिकारों की कोई समझ ही होती है, न ही मानवाधिकारों से उनका दूर-दूर का कोई नाता ही होता है। राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार आयोग की स्थिति इससे बहुत बेहतर है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का काम भी समाचार माध्यमों में प्रचारित व प्रसारित मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों और ऐसी शिकायतों जिन्हें आयोग तक पहुंचाया गया होता है, का संज्ञान लेने तक ही सीमित रह गया है। आमतौर पर आयोग ऐसे ही मामलों का संज्ञान लेता है जिन्हें समाचार माध्यमों में प्रमुखता से उठाया जाता है। बहुत-से मामले आयोग की कार्रवाई के दायरे में आ ही नहीं पाते। आयोग जिन मामलों का संज्ञान लेता भी है, उनके संबंध में भी आयोग का काम जांच एजेंसियों को जांच के आदेश देने भर का रह गया है।

देश के संविधान और न्यायिक प्रणाली के वर्तमान स्वरूप को देखते हुए भी मानवाधिकारों के संरक्षण से संबंधित निकायों को कभी मजबूत करने की तरफ ध्यान नहीं दिया गया। हमेशा यही समझा जाता रहा है कि मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित मामलों से, उन्हें देश के संविधान और न्यायिक प्रणाली में स्थापित प्रावधानों के दायरे में लाकर निपटा जा सकता है तो ऐसे में अलग से मानवाधिकार आयोग की क्या आवश्यकता! यह धारणा बिल्कुल गलत है। यह बात साफ तौर पर कही जा सकती है कि देश के संविधान और न्यायिक प्रणाली में मानवाधिकार संरक्षण की व्याख्या के बावजूद मानवाधिकार संरक्षण को अलग से मानवाधिकार आयोग जैसे किसी निकाय के अभाव में प्रभावी ढंग से सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। वास्तव में यहां आवश्यकता मानवाधिकारों की समझ पैदा करने वाले किसी निकाय की है, न कि सिर्फ मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित सजा के प्रावधानों की।

भ्रष्टाचार के खात्मे में मजबूत न्यायिक व्यवस्था और मानवाधिकार आयोग जैसे निकाय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इस संबंध में कानून की किसी नई परिभाषा की भी जरूरत नहीं है। यहां जरूरत है तो बस, कानून के मौजूदा प्रावधानों को कड़ाई के साथ लागू करने की। भ्रष्टाचार का दायरा बहुत बड़ा है। धन का हेरफेर ही भ्रष्टाचार नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार के दायरे में वे लोग भी आते हैं जो कार्यालय में अपना काम नहीं करते या सही तरीके से नहीं करते। ऐसे लोग देश और समाज का भारी नुकसान करने के साथ-साथ लोगों को मानवाधिकारों से भी वंचित करते हैं। इस तरह से देखें तो भ्रष्टाचार कदम-कदम पर मानवाधिकारों के अस्तित्व के लिए खतरा बना हुआ है।

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