राजनीति: आतंक से निपटने की चुनौती

वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के प्रति अब जो घेराबंदी हुई या हो रही है, उसमें संयुक्त राष्ट्र का अहम देश होने के चलते चीन भी आधिकारिक और राजनयिक स्तर पर आतंकवाद उन्मूलन की दिशा में कार्य करने को विवश हुआ है। लेकिन अब तक चीन की आतंकरोधी योजनाएं और नीतियां विश्व बिरादरी के साथ भागीदारी करते हुए नहीं बनीं और न ही इस दिशा में उसने कुछ ठोस कदम उठाए।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की फाइल फोटो।

पिछले साल हुए ब्रिक्स सम्मेलन में चीन ने भारत के जोर देने पर वैश्विक आतंकवाद के उन्मूलन के लिए ब्रिक्स मंच से आधिकारिक समर्थन भले ही दे दिया था, लेकिन वह इस संदर्भ में भारत की चिंताओं को निष्ठा और नैतिकता के साथ आत्मसात करने की स्थिति में नहीं था। भारत ही नहीं, विश्व स्तर पर अब तक जितनी भी आतंकी घटनाएं हुर्इं या हो रही हैं, उनके बारे में पीड़ित देशों को चीन का ठोस समर्थन कभी नहीं मिला। न ही चीन ने किसी पीड़ित देश की आतंकवाद से निपटने में मदद की। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शामिल होने के बाद भी वैश्विक आतंकवाद के संबंध में चीन का रुख कभी भी संतुलित नहीं रहा। सार्वभौमिक सुख-शांति को लेकर एक शक्तिशाली देश के रूप में चीन जो कुछ सोच-विचार कर सकता था और निश्चित कार्यनीति बना उस पर कार्य कर सकता था, उस दिशा में भी उसने कुछ नहीं किया।

आज इसका दुष्परिणाम चीन भी भुगत रहा है। जिस पाकिस्तान सरकार और उसकी फौज को भरोसे में लेकर चीन, पाकिस्तान में अपनी व्यापारिक योजनाओं को विस्तार दे रहा है और वहां ढांचागत निर्माण करवा रहा है और पाक को मिलने वाली सालाना अमेरिकी मदद बंद होने के बाद उसे अरबों डॉलर की सहायता दे रहा है, आज वही पाक सरकार और उसकी सेना चीनी दूतावास पर हुए आतंकी हमले को रोक नहीं पाई। पिछले दिनों कराची स्थित चीनी दूतावास पर हुए आतंकी हमले में दो पुलिसकर्मियों सहित चार लोग मारे गए। चीन को चुनौती देने वाली यह आतंकी घटना साधारण नहीं थी।

वैश्विक आतंकवाद के जनक पाकिस्तान में चीन ने चीन-पाक आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) बनाने की जो व्यापारिक नीति अंगीकृत की, उसमें उसने भारत, अफगानिस्तान और विश्व की आतंक संबंधी चिंताओं पर तनिक भी विचार नहीं किया। आतंक का कारखाना पाकिस्तान यदि चीन के लिए व्यापारिक कार्यनीति और धन निवेश का क्षेत्र बना तो इसमें चीन की यह इच्छा कहीं नहीं है कि वह पाकिस्तान और मध्य एशिया के विकास के लिए यह सब कुछ कर रहा है। वह एशिया में अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी भारत को पाक के भीतर व्याप्त राजनीतिक, सैनिक, सामाजिक बिखराव और इनके समानांतर चलने वाले आतंकी तंत्र के बूते अस्थिर करने की मंशा पर काम करता आ रहा है। इसके लिए उसने एक पंथ दो काज की नीति पर कार्य किया। सीपीईसी में निवेश करने और पाकिस्तान को आर्थिक मदद देकर उसने पाकिस्तान से होते हुए पूरे मध्य एशिया में अपने व्यापार को समृद्ध करने और पाकिस्तानी सैनिकों व आतंकवादियों के गठजोड़ को भारत के विरुद्ध अपरोक्ष युद्ध में लगाए रखने की नीति पर भी काम किया।

वैश्विक स्तर पर आतंकवाद के प्रति अब जो घेराबंदी हुई या हो रही है, उसमें संयुक्त राष्ट्र का अहम देश होने के चलते चीन भी आधिकारिक और राजनयिक स्तर पर आतंकवाद उन्मूलन की दिशा में कार्य करने को विवश हुआ है। लेकिन अब तक चीन की आतंकरोधी योजनाएं और नीतियां विश्व बिरादरी के साथ भागीदारी करते हुए नहीं बनीं और न ही इस दिशा में उसने कुछ ठोस कदम उठाए। लेकिन अब कराची में उसके दूतावास पर हुए फिदायीनी हमले ने अवश्य ही चीन को भी आतंक के प्रति सतर्क किया होगा। इस घटना के बाद उसे अब यह अवश्य लगना चाहिए कि चाहे वह पाक में कितना ही निवेश क्यों न करे या उसे कितनी ही आर्थिक मदद ही क्यों न दे, परंतु वहां के आतंकी समूहों और उनके आतंकवादियों का विश्वास जीत कर उन्हें अपने हिसाब से हांकना या उन पर नियंत्रण करना उसके बूते की बात भी नहीं।

अमेरिका इस कड़वे अनुभव का सबसे बड़ा भुगतभोगी रह चुका है। विगत दो-तीन दशकों से वह पाकिस्तान को आर्थिक सहायता प्रदान करता रहा। यहां तक कि रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद भी उसकी आर्थिक मदद जारी रही। सालाना 1.3 अरब डॉलर की सहायता लेने के बाद भी पाकिस्तान अपने यहां के आतंकी समूहों पर नियंत्रण कर उन्हें खत्म नहीं कर पाया। पिछले वर्ष सितंबर में अमेरिका ने उसकी आर्थिक मदद पहली बार बंद की। इस साल भी अब तक दो बार उसकी आर्थिक मदद रोकी जा चुकी है। लेकिन इसके बाद भी न तो पाकिस्तान में राजनीतिक अराजकता खत्म हो रही है और न ही आतंकी गतिविधियों पर कोई रोक ही लग पा रही है।

कुछ समय पहले ही रूस की राजधानी मास्को में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और अन्य नेताओं ने अफगानिस्तान स्थित तालिबान समूह के सदस्यों से वार्ता की थी। इस वार्ता में भारत के अलावा अफगानिस्तान, ईरान, चीन, पाकिस्तान सहित कई दूसरे देश शामिल थे। लेकिन इस वार्ता के महत्व को धता बताते हुए तालिबानी आतंकियों ने अफगानिस्तान के उन सुरक्षित स्थानों को भी बम विस्फोटों से दहला दिया, जहां दूसरे देशों के राजदूतावास और महत्त्वपूर्ण संस्थान हैं। आत्मघाती हमलों में जो तबाही, मानवीय जीवन की हानि और अव्यवस्था नब्बे के दशक में पाकिस्तान झेलता था, आज उससे अफगानिस्तान पीड़ित है। शायद ही कोई दिन हो, जब अफगानिस्तान आतंकी हमले न झेल रहा हो। पाकिस्तान और अफगानिस्तान स्थित आतंकी समूहों के हमलों के संदर्भ में प्रस्तावित संयुक्त कार्यक्रम, धीरे-धीरे चीन जैसे देशों के कूटनीतिक हितों के आड़े आने लगा है। कराची स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास पर आतंकी हमला इसी का परिणाम था। इन परिस्थितियों में लगता है कि तालिबान से वार्ता करने की नीति योजनाबद्ध नहीं थी, या शायद तालिबान के प्रतिनिधि बन कर जो लोग वार्ता कर रहे थे, उनकी तालिबान के मुख्य आतंकी समूहों से कोई कूटनीतिक या राजनीतिक साझेदारी ही नहीं है। यदि तालिबान की ओर से नियुक्त वार्ताकार वास्तव में तालिबान का प्रतिनिधित्व कर रहे होते तो वार्ता के बाद न केवल अफगानिस्तान, बल्कि पाकिस्तान में चीन को चुनौती देने वाले आतंकी हमले नहीं हुए होते।

अगर चीन और रूस जैसे देश पाक-अफगानिस्तान में स्थित खनिज के दोहन और उसके व्यापार के लिए इन देशों के सामाजिक-राजनीतिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुके आतंकी समूहों व इनकी आतंकी गतिविधियों की अनदेखी करेंगे और तालिबान से वार्ता के नाम पर केवल वार्ता तक सीमित रहेंगे तो दक्षिण एशिया में आतंक पर नियंत्रण करना कठिन हो जाएगा। वास्तव में अफगानिस्तान, पाकिस्तान और दूसरे मध्य एशियाई देशों में फैले आतंकी समूहों का समूल नाश करने के लिए वैश्विक महाशक्तियों को आपसी मतभेद भूल कर और आतंक पीड़ित देशों से किसी लाभ की आशा किए बिना ही आतंकवाद पर नियंत्रण के कदम निरंतर उठाने होंगे।

अमेरिका, आस्ट्रेलिया से लेकर भारत तक सभी जगह आतंकियों की गतिविधियां पहले से तेज हो चुकी हैं। रूस, चीन और अमेरिका को आतंक से निपटने के लिए अलग-अलग मंचों से अपने निजी हितों के अनुसार नीतियां बनाने की आवश्यकता नहीं है। आतंकवाद के उन्मूलन हेतु इन सभी देशों को भारत के साथ एक मंच पर आना चाहिए। तब ही विश्व को आतंकवाद से निजात दिलाने की दिशा में कुछ कामयाबी हासिल होने की उम्मीद बंध पाएगी।

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