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नेट निरपेक्षता का सवाल

अजेय कुमार इंटरनेट का जन्म सत्तर के दशक के शुरू में सबसे पहले अमेरिकी सरकार द्वारा बनाए गए एक रक्षा मंत्रालय संबंधी नेटवर्क से हुआ था। इस शिशु इंटरनेट को अमेरिकी सरकार ने 1971 में एटी ऐंड टी कंपनी को बेचना चाहा, पर इस टेलीकॉम कंपनी ने इसमें कोई व्यावसायिक मूल्य नहीं देखा और अमेरिकी […]

Author June 8, 2015 3:49 PM

अजेय कुमार

इंटरनेट का जन्म सत्तर के दशक के शुरू में सबसे पहले अमेरिकी सरकार द्वारा बनाए गए एक रक्षा मंत्रालय संबंधी नेटवर्क से हुआ था। इस शिशु इंटरनेट को अमेरिकी सरकार ने 1971 में एटी ऐंड टी कंपनी को बेचना चाहा, पर इस टेलीकॉम कंपनी ने इसमें कोई व्यावसायिक मूल्य नहीं देखा और अमेरिकी सरकार के सुझाव को ठुकरा दिया।

धीरे-धीरे इस कंप्यूटर नेटवर्क ने अमेरिका में और बाद में दुनिया के अन्य देशों में शैक्षिक और अनुसंधान संस्थाओं को आपस में जोड़ने का काम किया। फिर इस इंटरनेट का इस्तेमाल शोधकर्ताओं के बीच संप्रेषण के साधन के रूप में हुआ, बाद में इसे सूचना-स्रोत के रूप में जाना जाने लगा। संप्रेषण के एक माध्यम के रूप में इंटरनेट की सफलता ने बड़े पूंजीपतियों का ध्यान इसकी ओर खींचा और 1995 तक यह एक संपूर्ण व्यावसायिक नेटवर्क बन गया, जिसमें बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इसमें पूंजी के विस्तार और मुनाफे की संभावनाओं को तलाशना शुरू किया। व्यावसायिक होते हुए भी इंटरनेट ने इक्कीसवीं सदी के शुरू तक अपना मूल चरित्र बरकरार रखा यानी कोई भी व्यक्ति इंटरनेट से जुड़ सकता है, कोई भी सूचना भेज सकता है या प्राप्त कर सकता है।

इसमें दो राय नहीं कि इंटरनेट ने लोगों के जीवन को बहुत प्रभावित किया है- ज्ञान के स्रोत के रूप में, संचार माध्यम के रूप में तथा मीडिया के अनेक रूपों के संवाहक के तौर पर। सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा विकास के लिए इंटरनेट के लाभ अनगिनत हैं। इससे दुनिया भर में इंटरनेट को एक ‘सार्वजनिक सुविधा’ घोषित करने की मांग ने जोर पकड़ा है। ऐसे में सरकार की और भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राइ) की प्राथमिकता भारत में इंटरनेट को अधिक से अधिक फैलाने की होनी चाहिए, न कि इस क्षेत्र को नियामक कदमों के जरिए सीमित करने और उपभोक्ताओं के लिए इसे महंगा करने की।

पर यह भी एक सच्चाई है कि इंटरनेट दूरसंचार नेटवर्कों का इस्तेमाल करता है और ये नेटवर्क विभिन्न देशों के कानूनों के अंतर्गत ही काम करते हैं। इससे इन देशों की सरकारों के पास वे तमाम कानूनी अधिकार आ जाते हैं जिनसे इनके लिए इंटरनेट को नियंत्रित करना संभव हो जाता है। भारत में भी इंटरनेट पर उपलब्ध किसी सर्विस या अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) को भारतीय कानूनों के तहत ही काम करना पड़ता है। जैसे आइटी एक्ट, भारतीय दंड संहिता कानून आदि। दूसरे, इन टेलीकॉम नेटवर्क कंपनियों ने भी ‘टोल टैक्स ऑपरेटरों’ की तरह काम करना शुरू कर दिया है। आप अपनी गाड़ी किसी विशेष रास्ते पर ले जाना चाहते हैं तो आप टोल-टैक्स देते हैं। उसी तरह इन दूरसंचार कंपनियों ने इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों से और उपभोक्ताओं से टैक्स वसूलना शुरू कर दिया। इंटरनेट से उपभोक्ता टेक्स्ट, वॉयस या वीडियो भेजना चाहता है। नेट-निरपेक्षता का तकाजा है कि टेलीकॉम सेवा प्रदाताओं को इन तमाम सूचनाओं के बीच कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए, ये सूचनाएं कौन भेज रहा है, इनका मालिक कौन है, इनकी विषय-वस्तु कैसी है, आदि।

कोलंबिया लॉ-स्कूल में कानून के प्रोफेसर टिम. वू. ने नेट-निरपेक्षता को आज से बारह वर्ष पूर्व 2003 में ही परिभाषित कर दिया था, जिसके अनुसार इंटरनेट सेवा प्रदाताओं और दूरसंचार कंपनियों को इंटरनेट पर आने वाली सभी सूचनाओं के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और इंटरनेट का उपयोग करने वालों को सभी सूचनाएं बिना किसी भेदभाव के पहुंचानी चाहिए। इसके अनुसार हर तरह की सर्फिंग के लिए गति बराबर होनी चाहिए। किसी अनुप्रयोग (एप्लीकेशन) या वेब-साइट पर जाने के लिए आपकी गति को सेवा प्रदाता तेज या धीमा नहीं कर सकता।

नेट-निरपेक्षता का तकाजा है कि सभी साइट्स पर समान रूप से पहुंचना संभव हो। आप किसी भी इंटरनेट सेवा प्रदाता या किसी भी दूरसंचार कंपनी के उपभोक्ता हों, साइट्स पर पहुंचने की गति बराबर हो। किसी इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी को कोई भी साइट ब्लॉक करने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। कई देशों ने इस संबंध में कानून भी बना दिए हैं। इंटरनेट का डिजाइन ही पूरी तरह निरपेक्ष होता है। गरीब हो या अमीर,, गरीब राष्ट्र का हो या अमीर राष्ट्र का, हर उपभोक्ता इंटरनेट के लिए बराबर है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को मुफ्त में सूचना भेज सकता है, एक ब्लॉगर दूसरे को मुफ्त में अपनी विषय-वस्तु से परिचय करवा सकता है। यह नेट-निरपेक्षता इंटरनेट की रगों में इसके जन्म से है।

नेट-निरपेक्षता को नेट-उपभोक्ता कितनी गंभीरता से लेते हैं, इसका अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि लगभग बारह लाख लोगों ने ट्राइ को इस संबंध में इ-मेल भेजे हैं। इंटरनेट का उपयोग करने वाला यह विशाल हिस्सा नेट-निरपेक्षता की हिफाजत करने की मांग कर रहा है और उनमें से कई लोगों का यह भी आरोप है कि टेलीकॉम कंपनियां जैसे एअरटेल और रिलायंस कुछ इंटरनेट इजारेदार कंपनियों से मिल कर नेट-निरपेक्षता पर हमला करने की कोशिश कर रही हैं।

नेट-निरपेक्षता पर बहस के पीछे असल मुद्दा यह है कि आप इंटरनेट को किस दृष्टि से देखते हैं- बिजली, पानी की तरह एक बुनियादी सार्वजनिक सेवा के रूप में या एक केबल टीवी की तरह एक ‘पेड सर्विस’ के रूप में।
उद्योग लॉबी के अपने संगठन सेल्युलर आॅपरेटर्स एसोसिएशन आॅफ इंडिया का कहना है कि इंटरनेट द्वारा स्काइप, वाइबर और वाट्सअप जैसी वॉयस सेवाओं के लिए अलग से लाइसेंस लेने की व्यवस्था होनी चाहिए, बिल्कुल उसी तरह जैसे टेलीकॉम कंपनियां बात करने या एसएमएस करने पर पैसा वसूलती हैं।

ट्राइ ने 27 मार्च, 2015 को एक परामर्श-पत्र जारी किया है। इस पेपर का शीर्षक है ‘ओवर द टॉप सर्विसेज के लिए नियामक फ्रेमवर्क’ जिसमें इंटरनेट पर दी जा रही सेवाओं और विषयवस्तु के लिए एक लाइसेंस-राज कायम करने की वकालत की गई है, मकसद उसे नियंत्रित करने का है। इस लाइसेंस-व्यवस्था का प्रस्तावित लक्ष्य पारंपरिक टेलीकॉम कंपनियों (जो कि वॉयस और एसएमएस सुविधाएं देती हैं) को आॅनलाइन सेवाओं द्वारा दी जा रही प्रतियोगिता से बचाना है।

आज लगभग सौ करोड़ वेबसाइट्स इंटरनेट पर उपलब्ध हैं जिनमें से साढ़े आठ लाख साइट्स बहुत सक्रिय हैं। आज इंटरनेट कंपनियों में इन साइट्स पर प्रभुत्व जमाने की होड़ लग चुकी है। इस होड़ में कुछ ही बड़ी इंटरनेट कंपनियां टिक पाई हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक इन सक्रिय वेबसाइट्स में पचहत्तर फीसद सिर्फ दस इंटरनेट कंपनियों के नियंत्रण में हैं जिनमें से अधिकतर अमेरिका में हैं।

दूसरे, आज से कुछ वर्ष पूर्व टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों का करोबार कम था, पर अब स्थितियां बदल गई हैं। आज वैश्विक इंटरनेट कंपनियां जैसे गूगल, फेसबुक, एमेजॉन, टेनसेंट, बाइडू आदि ने (2014 में) 903 करोड़ डॉलर का कारोबार किया, जबकि उसी वर्ष पांच बड़ी टेलीकॉम कंपनियोंं (चाइना मोबाइल, वेरीजॉन, ए टी ऐंड टी, वोडाफोन, सॉफ्टबैंक) ने 822 करोड़ डॉलर का। इसलिए अब पहले वाली स्थिति नहीं रही। जब वे इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों को अपनी शर्तें मनवाने के लिए बाध्य कर लेती थीं। पर इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने हार मान ली है। हर देश में अलग-अलग तरीके अपनाते हुए वे नेट-निरपेक्षता के विरुद्ध कदम उठाने के लिए सक्रिय हैं।

अमेरिका में फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (एफसीसी) ने 4 फरवरी 2015 को, राष्ट्रपति ओबामा के सकारात्मक रुख को देखते हुए नेट-निरपेक्षता के लिए सख्त कानूनों की घोषणा की है। टेलीकॉम कंपनियों ने इसके खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया है और अमेरिकी कांग्रेस को अपने पक्ष में करने के लिए अभियान तेज कर दिया है। यहां एक तथ्य यह भी गौर करने लायक है कि टेलीकॉम कंपनियों का मुनाफा कम नहीं हुआ है।

अमेरिका में ब्रॉडबैंड बिजनेस की मुनाफा दर लगभग नब्बे प्रतिशत है। भारत में 2014 में टेलीकॉम कंपनियों के सकल उत्पाद में सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई। उदाहरण के लिए एअरटेल का जनवरी से मार्च 2015 (चौथी तिमाही) के लिए शुद्ध लाभ 1255 करोड़ रुपए है, जबकि पिछले साल इसी अवधि में उसने 962 करोड़ रुपए अर्जित किए थे। यह इकतीस प्रतिशत की बढ़ोतरी है। आइडिया का लाभ साठ प्रतिशत बढ़ा है। इसके बावजूद टेलीकॉम कंपनियों को लगता है कि इंटरनेट कंपनियां खूब पैसा कमा रही हैं और इसमें से कुछ हिस्सा उन्हें मिलना चाहिए।

हालांकि टेलीकॉम कंपनियों के काम को देखें तो पता चलता है कि उन्होंने ढांचागत व्यवस्थाओं में कोई सुधार नहीं किया है। फिर भी एसएमएस सर्विस के लिए उनकी दरें काफी ऊंची हैं। अब हो यह रहा है कि वाट्सअप भी एक तरह की एमएमएस सर्विस है जो इंटरनेट का इस्तेमाल करती है। अब कुछ सप्ताह से इस पर बात करना भी संभव हो गया है। ट्राइ का सुझाव है कि चाहे वह स्काइप हो, जो इंटरनेट के माध्यम से एक वीडियो-सेवा है और चाहे वाट्सअप, दोनों पर लाइसेंस फीस लगानी चाहिए। अगर हम इस तरह विभिन्न एप्लीकेशनों के बीच नियामक संस्था द्वारा भेदभाव करने लगेंगे तो नेट-निरपेक्षता के सिद्धांत का क्या होगा?

अंतत: ट्राइ इंटरनेट कंपनियों और टेलीकॉम कंपनियों के बीच इस तरह का समझौता कराना चाहती है जो उन्हें संतुष्ट रखे, बेशक इसमें उपभोक्ता को अपनी जेब हल्की करनी पड़े। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिए कि गूगल और फ्लिपकार्ट का एअरटेल से समझौता हो जाए और नेट-निरपेक्षता नाम की चीज न हो तो क्या होगा। आप एक पुस्तक खरीदना चाहते हैं। आप याहू खोल कर जानना चाहते हैं कि स्नैपडील नामक वेबसाइट पर इस पुस्तक का क्या मूल्य है। आप यह जान नहीं पाएंगे क्योंकि एयरटेल आपको याहू के रास्ते स्नैपडील तक नहीं पहुंचने देगा। यहां यह हो सकता है कि अगर आप याहू के जरिए ही पुस्तक का मूल्य स्नैपडील पर जानना चाहते हैं तो आपको अलग से पैसा देना पड़े। इसका अर्थ यह हुआ कि अगर नेट-निरपेक्षता हटा दी जाए तो इंटरनेट प्रदाता कंपनी किसी भी वेबसाइट से करार कर सकती है। इंटरनेट उपभोक्ता उस वेबसाइट पर तो जल्दी पहुंच जाएंगे, अन्य वेबसाइटों के लिए अलग से पैसा देना होगा। इस तरह इंटरनेट प्रदाता कंपनी के दोनों हाथों में लड््डू होंगे- एक ग्राहक की ओर से और दूसरा वेबसाइट से।

यह स्थिति भी अक्सर होती है कि भारत में एक विषय पर घरेलू स्तर पर तैयार सामग्री की मात्रा बहुत कम हो, पर विदेशी इंटरनेट कंपनियों के पास इसकी प्रचुर मात्रा उपलब्ध हो। अगर नेट-निरपेक्षता नहीं होगी तो ऐसा हो सकता है कि एक सामग्री के विदेशी उत्पादक को तो इंटरनेट पर तेज गति लेन प्राप्त हो और भारत जैसे विकासशील देशों की कंपनियों को कम गति वाली लेन में डाल दिया जाए। इस तरह नेट-निरपेक्षता के बिना अमीरों के लिए अलग इंटरनेट होगा और गरीबों के लिए अलग। यह अकारण नहीं कि राहुल गांधी ने ही नहीं, माकपा ने भी नेट-निरपेक्षता के उल्लंघनों का विरोध करने का आह्वान किया है।

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