नेताजी की गुमनामी और सियासत - Jansatta
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नेताजी की गुमनामी और सियासत

कोलकाता में पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी चौंसठ फाइलें सार्वजनिक कीं तो इधर फैजाबाद में गुमनामी बाबा के समर्थक उनके तीस साल..

Author नई दिल्ली | September 24, 2015 1:52 AM

कोलकाता में पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी चौंसठ फाइलें सार्वजनिक कीं तो इधर फैजाबाद में गुमनामी बाबा के समर्थक उनके तीस साल पुराने जिन्न को एक बार फिर बोतल से बाहर निकाल लाए। यह सिद्ध करने का प्रयत्न लगे कि बाबा के रूप में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ही यहां लंबे समय से अज्ञातवास पर थे, जिनका 1985 में सोलह सितंबर को निधन हो गया। गुमनामी बाबा 1972-73 में कभी अयोध्या के समीप स्थित दर्शननगर नामक बाजार के ‘शंकर निवास’ में आए, जहां कहते हैं कि उन्हें पड़ोसी जिले की बांसी रियासत के पूर्व नरेश का ‘सशस्त्र’ संरक्षण प्राप्त था।

रहस्यमय गतिविधियों के कारण, इस संरक्षण के बावजूद उनकी ‘शंकर निवास’ के पड़ोसियों से नहीं बनी और उन्हें अयोध्या की हनुमानगढ़ी के पास स्थित रामकिशोर नाम के पंडे के छोटे से घर में शरण लेनी पड़ी। उनके पास बीस-बाईस बड़े बक्से थे, जो उस छोटे घर में सुभीते से समाते नहीं थे। इस असुविधा के मद्देनजर 15 जनवरी, 1975 को उनके सेवकों ने उनके लिए ब्रह्मकुंड गुरद्वारे के पास सरदार गुरुबख्श सिंह सोढ़ी का अपेक्षया बड़ा मकान किराए पर लिया। वहां किराए के भुगतान को लेकर विवाद हुआ तो सोढ़ी ने उन्हें दो बार फैजाबाद के सिविल जज की अदालत में घसीटा। उनकी ‘संदिग्ध गतिविधियों’ को लेकर उनकी पहचान के लिए पुलिस को भी अर्जियां दीं। पुलिस अधीक्षक ने एक सीआइडी इंस्पेक्टर को बाबा की पहचान की जिम्मेदारी भी सौंपी, लेकिन पहचान हो पाती, इसके पहले अयोध्या के तत्कालीन कोतवाल जालिम सिंह अज्ञात कारणों से बाबा की तरफ से उलटे सोढ़ी को ही धमकाने और उत्पीड़ित करने लगे।

1985 में 16 सितंबर को रात साढ़े नौ से दस बजे के बीच अंतिम सांस लेने से दो तीन साल पहले पहले बाबा लखनउवा मंदिर छोड़ कर अयोध्या के जुड़वां शहर फैजाबाद के सिविल लाइंस क्षेत्र के रामभवन में रहने लगे थे। उनकी मृत्यु के तुरंत बाद से ही उनके सेवक उनकी संपत्ति और विरासत पर कब्जे को लेकर आपस में झगड़ने लगे थे। इस चक्कर में उनके निवास पर तीन-तीन सेवकों ने अपने ताले बंद किए थे।

दरअसल, एक खास समूह ने बाबा के निवास से नेताजी से जुड़ी या उनकी बताई जाने वाली अनेक वस्तुएं मिलने के बहाने जनभावनाओं का दोहन करके उन्हें नेताजी प्रचारित करने की कोशिशें इस सबके कोई डेढ़ महीने बाद खासे योजनाबद्ध ढंग से शुरू की थीं। इन कोशिशों में रामभवन के वे मालिक सबसे आगे थे, जो फैजाबाद के बहुचर्चित भूतपूर्व सिटी मजिस्ट्रेट गुरुदत्त सिंह के वंशज भी हैं। प्रसंगवश, गुरुदत्त सिंह ने, जिनकी सेवानिवृत्ति में तब कुछ ही दिन बाकी थे, देश के विभाजन के बाद के 22-23 दिसंबर, 1949 को तत्कालीन जिलाधिकारी केके नैयर के साथ मिल कर अयोध्या की विवादित बाबरी मस्जिद में भगवान राम को ‘प्रगट’ कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

उनके वंशजों ने समझा था कि गुमनामी बाबा को नेताजी प्रचारित करना बाबरी मस्जिद में भगवान राम को प्रगट कराने से कहीं ज्यादा आसान होगा। इसके दो कारण थे। पहला यह कि अब भी देश में बहुत से लोग नेताजी के विमान दुर्घटना में निधन की खबर को सही नहीं मानते। अब उक्त चौंसठ फाइलों के हवाले से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी ऐसे ही संकेत दिए हैं।

दूसरा यह कि गुमनामी बाबा की हस्तलिपि नेताजी की हस्तलिपि जैसी थी और उनके निवास से मिला नेताजी से संबंधित सामग्री का जखीरा वाकई आश्चर्यजनक था। मसलन, नेताजी जैसे गोल शीशे वाले सुनहरे फ्रेम के मेड इन जर्मनी चश्मे, रोलेक्स जेब घड़ी, फाउंटेनपेन, दूरबीन, 555 ब्रांड की सिगरेटें, विदेशी शराब, आजाद हिंद फौज की वर्दी, उसके गुप्तचर विभाग के प्रमुख पवित्र मोहन राय के बधाई संदेश, नेताजी के माता-पिता और परिजनों, उनके कोलकाता के जन्मोत्सवों और लीला राय की मौत पर हुई शोकसभाओं की दुर्लभ निजी तस्वीरें, जर्मन, जापानी और अंग्रेजी साहित्य की अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें, 1974 में कोलकाता के दैनिक ‘आनंद बाजार पत्रिका’ में चौबीस किस्तों में प्रकाशित रिपोर्ट ‘ताइहोकू विमान दुर्घटना: एक बनी हुई कहानी’ की कतरनें, भगवनजी को संबोधित अनेक पत्र और तार, नेताजी के लापता होने की गुत्थी सुलझाने के लिए गठित शाहनवाज और खोसला आयोगों की रपटें, हाथ से बने नक्शे, जिनमें उस स्थल को इंगित किया गया था, जहां कथित विमान दुर्घटना में नेताजी का निधन हुआ। इनके अलावा नेताजी के बारे में देश-विदेश के समाचार पत्रों छपी अनेकानेक खबरों और रिपोर्टों की कतरनें। बाबा के बारे में प्रचारित था कि वे जिसे भी देते, नए करारे नोट ही देते और अपने नजदीकी लोगों से कहा करते कि ‘इस देश के रजिस्टर से मेरा नाम काट दिया गया है।’

लेकिन बाबा को नेताजी बताने वालों को तब बहुत जोर का झटका लगा, जब आजाद हिंद फौज के गुप्तचर विभाग के प्रमुख रहे पवित्रमोहन राय तक ने उन्हें नेताजी मानने से इनकार कर दिया। राय के अनुसार वे नेताजी के जीवित होने की उम्मीद लिए अनेक जगहों पर उनको तलाशने जाते रहे हैं। गुमनामी बाबा के पास भी गए थे। लेकिन वे उन्हें पल भर के लिए भी नेताजी नहीं लगे। यह पूछे जाने पर कि बाबा के पास नेताजी से जुड़ी अनेक वस्तुओं का जखीरा कहां से आया? राय ने कहा कि बहुत संभव है कि बाबा ऐसी चीजों के संग्रह के शौकीन रहे हों, लेकिन ‘वे और जो भी हों, नेताजी कतई नहीं हैं।’ चूंकि इन वस्तुओं के बाबा के पास होने का पता उनके देहांत के पैंतालीस दिन बाद चला था, इसलिए फैजाबाद में भी कई लोग अंदेशा जताते हैं कि वे बाद में वहां रखी गई हो सकती हैं।

आगे चल कर नेताजी के लापता होने की तिबारा जांच के लिए गठित मुखर्जी आयोग ने भी गुमनामी बाबा को नेताजी मानने से इनकार कर दिया, तो इसके अनेक कारणों में से एक यह था कि बाबा और नेताजी की एक जैसी दिखने वाली हस्तलिपि प्रयोगशालाओं में तीन बार की गई फोरेंसिक जांच में एक नहीं सिद्ध हुई।

गुमनामी बाबा को नेताजी मानने वालों के पास कई महत्त्वपूर्ण सवालों के जवाब नहीं हैं। खासकर इस सवाल का कि गुमनामी बाबा नेताजी थे और अज्ञातवास के बावजूद कई लोगों को इसकी जानकारी थी, तो उन्होंने देहांत के बाद उनकी गरिमा के अनुरूप अंतिम संस्कार के जतन क्यों नहीं किए? किसने और क्यों उनकी पहचान मिटाने के लिए किसी रसायन से उनके शव का चेहरा विकृत कर डाला और कौन लोग थे, जिन्होंने पुलिस को इस अपराध की सूचना तक नहीं दी? कौन-से कारण थे कि बाबा के सेवकों ने उनकी मौत के बाद भी जनसामान्य को उनके दर्शन की अनुमति नहीं दी और इसे लेकर आपस में झगड़ते रहे?

नेताजी के इतने निरीह भाव वाले अज्ञातवास की बात उनके ऐतिहासिक शौर्य, पराक्रम और स्वभाव से मेल नहीं खाती। कितनी भी विषम स्थितियों में वे यों छिपछिपा कर दिन काटने के बजाय बाहर निकल कर चुनौतियों का सामना करते। खासकर तब, जब देश में अब भी उनके प्रति असीम समर्पण की भावना है। लेकिन एक पल को उनका अज्ञातवास स्वीकार भी कर लिया जाए, तो उनकी मृत्यु के बाद उसको रहस्य बनाए रख कर किस उद्देश्य की प्राप्ति की जा रही थी?

दरअसल, 16 सितंबर, 1985 को हुई बाबा की ‘गुमनाम’ मौत के बयालीस दिन बाद कुछ लोगों द्वारा उनके नेताजी होने का दावा किया जाना अचानक तब शुरू हुआ, जब फैजाबाद के दैनिक ‘नए लोग’ (जो अब बंद हो चुका है) ने प्रसार की अनैतिक स्पर्धा में अपने प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त बनाने के लिए 28 अक्तूबर, 1985 के अंक में पहले पृष्ठ पर खासी अहमियत से उनके नेताजी होने की सनसनी से जोड़ कर छापा और दावा किया कि बाबा के सेवक ही उनके नेताजी होने के सबूत नष्ट करने पर आमादा हैं। इसके बाद भी यह महीनों तक बाबा के सुभाषचंद्र बोस होने का प्रचार करता रहा। बाद में इस दैनिक के संपादक अशोक टंडन ने ‘गुमनामी सुभाष’ नाम की पुस्तक भी लिखी, जिसके कुछ अंश कमलेश्वर के संपादन में दिल्ली से प्रकाशित पत्रिका ‘गंगा’ में धारावाहिक रूप से छपे थे।

टंडन का दावा है कि उन्होंने बाबा के पास से मिली दो हजार सात सौ साठ वस्तुओं की बारीकी से जांच की है और उनमें से अनेक नेताजी से संबंधित हैं। यह सब सामान अदालती आदेश पर फैजाबाद जिला प्रशासन की निगरानी में रखा है, जिसकी सार-संभाल को लेकर सवाल उठते रहते हैं। अब उच्च न्यायालय के आदेश पर उसे अयोध्या के रामकथा संग्रहालय में रखे और प्रदर्शित किए जाने की बात चल रही है।

फैजाबाद में जानकार लोग कहते हैं कि इस मामले में महज इतनी जांच बाकी है कि गुमनामी बाबा को नेताजी के रूप में प्रचारित करने के पीछे किनका और कौन-सा षड्यंत्र था? दुर्भाग्य से सरकारों या कि प्रशासनों की ऐसी कोई जांच कराने में दिलचस्पी नहीं है और फैजाबाद में संघ परिवार के संगठन इस मामले को जोर-शोर से उठा रहे हैं। लगता है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव में लाभ की उम्मीद से वे किसी न किसी तरह इस मामले को गरमाए रखना चाहते हैं। दूसरी ओर ममता बनर्जी ने नेताजी से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करके गेंद मोदी सरकार की मार्फत उन्हीं के पाले में डाल दी है। अब केंद्र सरकार पर दबाव होगा कि वह भी अपने पास की नेताजी से जुड़ी फाइलें सार्वजनिक करे।

(कृष्ण प्रताप सिंह)

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