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दहशत का दुर्गद्वार

पुण्य प्रसून वाजपेयी अजमल कसाब फरीदकोट के ओकारा गांव का था। नवेद फैसलाबाद की शहरी कॉलोनी गुलाम मोहम्मद अबद का है। कसाब गरीब परिवार का था, नवेद मध्यवर्गीय परिवार का है। कसाब पेट के लिए लश्कर से जुड़ा, नवेद इस्लाम के नाम पर जमात-उद-दावा के साथ जुड़ा। कसाब के वक्त लश्कर-ए-तैयबा का पूरा प्रशिक्षण तालिबानी […]

Author August 9, 2015 4:50 PM

पुण्य प्रसून वाजपेयी

अजमल कसाब फरीदकोट के ओकारा गांव का था। नवेद फैसलाबाद की शहरी कॉलोनी गुलाम मोहम्मद अबद का है। कसाब गरीब परिवार का था, नवेद मध्यवर्गीय परिवार का है। कसाब पेट के लिए लश्कर से जुड़ा, नवेद इस्लाम के नाम पर जमात-उद-दावा के साथ जुड़ा। कसाब के वक्त लश्कर-ए-तैयबा का पूरा प्रशिक्षण तालिबानी अंदाज में था। नवेद के वक्त इस्लाम और आइएसआइएस के सिद्धांत ने जमात-उद-दावा की तकरीर में जगह ले ली थी। कसाब के वक्त लश्कर सरगना हाफिज सईद कश्मीर की आजादी के नाम पर उसी तरह गरीब परिवारों से एक लड़का मांगा करता था जैसे अफगानिस्तान में तालिबान के लिए लश्कर समेत आतंक की कई तंजीमों ने पाकिस्तान के गरीब इलाकों में आतंक को रोजगार और ताकत से जोड़ दिया था।

नवेद के वक्त तक पाकिस्तान में तालिबान को लेकर मोहभंग होने लगा था और आइएसआइएस के जरिए इस्लामिक राज्य को नए तरीके से परिभाषित करने की दिशा में जमात-उद-दावा के मुखिया हाफिज सईद ने तकरीर शुरू कर दी थी। तो 1986 में बने लश्कर-ए-तैयबा के भारतीय संसद पर हमले के बाद ही 2002 में जमात-उद-दावा बना कर हाफिज सईद ने आतंक को सामाजिक कार्यों से जोड़ कर खुद को विस्तार दे दिया। और पाकिस्तान में भी किसी सरकार ने पहले लश्कर फिर जमात-उद-दावा को रोकने की कोशिश इसलिए नहीं की कि सामाजिक-आर्थिक तौर पर जिन बदनसीब हालात का सामना पाकिस्तान का एक बड़ा तबका कर रहा है, उसमें लश्कर ने अपनी फौज में भर्ती कर गरीब परिवारों के लिए रोजगार के अवसर भी खोले और इस्लाम को लेकर पाकिस्तान के रईसों के सामने चुनौती भी रखी।

जब दुनिया भर में लश्कर-ए-तैयबा पर प्रतिबंध लगाया जाने लगा तो जमात-उद-दावा बना कर आतंकी गतिविधियों के लिए सामाजिक-आर्थिक कार्यों को ढाल बनाया गया। लेकिन भारत के लिए ये सारे सवाल कोई मायने नहीं रखते कि पाकिस्तान में किस तरह आतंक सामाजिक जरूरतों से जुड़ गया। लेकिन भारत सरकार यह अब भी नहीं समझ पा रही है कि पाकिस्तान ही नहीं, दुनिया भर में आतंक की परिभाषा बदल रही है।

आज हर शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद श्रीनगर के निचले इलाके की जामा मस्जिद के बाहर आइएसआइएस के झंडे उसी तर्ज पर लहराते हैं जैसे कभी पाकिस्तान के झंडे लहराया करते थे। अंतर सिर्फ झंडों का नहीं आया है, बल्कि चेहरा ढंक कर जो हाथ झंडे लहराते और नारे लगाते हैं वे युवा गरीब या अनपढ़ नहीं, बल्कि पढ़े-लिखे हैं और अच्छे परिवारों से आते हैं। यानी कश्मीर में भी आतंकवाद का चेहरा बदल रहा है।

अब कश्मीर का पढ़ा-लिखा युवा मौजूदा मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार या दिल्ली की मोदी सरकार के खिलाफ नारे लगाते हुए अपनी मौजूदगी आतंक के साथ जोड़ने से नहीं कतरा रहा है। यानी एक तरफ लश्कर-ए-तैयबा और जमात-उद-दावा के साथ पाकिस्तान का पढ़ा-लिखा युवा जुड़ रहा है या कहें पहली बार पाकिस्तान के भीतर नजर यह भी आ रहा है कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी तक में जमात-उद-दावा की तकरीर होती है।

जिस फैसलाबाद से नवेद निकला वहां के शहरी मिजाज और पाकिस्तान के तीसरे सबसे संपन्न जिले के कॉलेजों में भी हाफिज सईद बीते दो बरस में छह बार पहुंचा। यानी जिस नवेद का एक भाई कॉलेज में पढ़ाता है, एक भाई व्यवसाय करता है, बहन यूनिवर्सिटी में पढ़ती है, उस परिवार का लड़का जमात-उद-दावा की तकरीर से प्रभावित होकर लश्कर से जुड़ता है। वहीं कश्मीर में डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले से लेकर इंजीनियरिंग और पीएचडी करने वाले छात्र हाथों में बंदूक लेकर जब खुद को आतंकवादी बताने से नहीं कतराते और अपनी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने से नहीं हिचकते, तो संकेत साफ है कि युवाओं को मुख्यधारा से कैसे जोड़ा जाए।

आतंकवाद की जो परिभाषा कश्मीर और दिल्ली की सरकारें अभी तक गढ़ती रही हैं और उस पर नकेल कसने के लिए उन्होंने जो उपाय किए हैं वे या तो विफल हो रहे हैं या उन तरीकों को लेकर युवाओं में आक्रोश है। पाकिस्तान की अपनी मजबूरी उसके शक्ति-केंद्र को लेकर हो सकती है, क्योंकि पाकिस्तान में चुनी हुई सरकार के समांतर सेना और आइएसआइ की भूमिका न सिर्फ बढ़ी है, बल्कि मौजूदा वक्त में तो नवाज शरीफ के हर कदम के उलट पाकिस्तानी सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने पहल की है। पर भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं है। चुनी हुई सरकार के साथ विदेश नीति को लेकर तो विपक्ष भी हमेशा साथ खड़ा होता है।

पर पहली बार कश्मीर में पढ़े-लिखे युवा ही नहीं, कभी मुंबई, तो कभी हैदराबाद, कभी बंगलुरु तो कभी केरल से किसी न किसी युवा की आवाज आइएसआइएस को लेकर उभरती है, तो नया सवाल यह होता है कि क्या आतंक की नई परिभाषा गढ़ते आइएसआइएस को युवा तबका समझ नहीं पा रहा है। कह सकते हैं कि आतंकवाद को लेकर भारत सरकार की नीति हमेशा बिल्कुल सहन न किए जाने की रही है और पाकिस्तान के लिए आतंकवाद एक राष्ट्रीय नीति के तौर पर उभरती दिखाई देती है। जहां उसके कर्ता-धर्ता अलग-अलग वक्त में अलग-अलग रुख दिखाएं, क्योंकि आज अगर पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ भारत में आतंकवादियों की घुसपैठ करा रही हैं तो याद कीजिए मुशर्रफ के वक्त सरकार ही कश्मीर की आजादी का राग अलापने से नहीं कतरा रही थी।

मगर फिर सवाल भारत का है। कश्मीर की सबसे बड़ी समस्या आज भी दिल्ली की नजर में आतंकवाद है। लेकिन इसके उलट अगर हकीकत को समझने का प्रयास करें तो कश्मीर का सबसे बड़ा संकट वह पढ़ा-लिखा वर्ग है, जिसके सामने आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं है। होना यह चाहिए कि श्रीनगर तक देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंच आसान हो जाए। विकास की जो चकाचौंध सरकार लाना चाहती है, उसमें जीने के विकल्प कश्मीरी युवाओं के पास होने चाहिए। यानी देश की मुख्यधारा में कश्मीरी खुद को जुड़ा हुआ महसूस करे और उसके भीतर यह अहसास जागे कि वह भारत से न सिर्फ जुड़ा हुआ, बल्कि उसी के लिए उसे जीना-मरना है।

यह मुश्किल इसलिए नहीं है कि घाटी में कल तक अलगाववादी पाकिस्तान के हक में खड़े थे तो युवा भी राजनीतिक विकल्प के साथ पाकिस्तान के हक में नारे लगाता था। लेकिन मौजूदा वक्त में पाकिस्तान के नहीं, बल्कि आइएसआइएस और फिलस्तीन के झंडे लेकर युवा लहराता है, तो जुमे की नमाज के बाद हुर्रियत नेता उमर फारूक भी युवाओं के साथ खड़े हो जाते हैं। यानी अलगाववादियों को भी समझ में आ रहा है कि कश्मीर में आतंकवाद की 1989 वाली परिभाषा बदल रही है और अगर कश्मीरी युवा ही कोई लकीर खींचना चाहता है तो वे उसके साथ चलेंगे। अंतर सिर्फ यह नहीं आना चाहिए कि दिल्ली को लेकर कश्मीरी युवा का गुस्सा बरकरार रहे।

ऐसे में तीन सवाल हैं। पहला, क्या सरकार को कश्मीर को समझने के लिए कश्मीरी युवाओं को समझना होगा। दूसरा, क्या पाकिस्तान के साथ बातचीत को उस धरातल पर लाना होगा, जहां पाकिस्तानी सत्ता के तीन ध्रुव भी उभरें और आतंक को लेकर उसकी राज्य नीति भी दुनिया के सामने आए। और तीसरा, घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों को मारने की जगह नवेद की तर्ज पर पकड़ कर संयुक्त राष्ट्र या दुनिया के अन्य मंचों पर बतौर सबूत ऐसे जीवित आतंकवादियों को दिखाना चाहिए। यानी अभी तक पाकिस्तान और आतंकवाद को लेकर जो रास्ते अपनाए गए उन्हें बदलने की जरूरत है। क्योंकि मौजूदा हालात यह भी बताते हैं कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी पंजाब में खालिस्तान को फिर से जीवित करना चाहती है। और खालिस्तान को लेकर पाकिस्तान का कश्मीर-टू फार्मूला कोई आज का नहीं है। दो दशक पहले ही इसकी बिसात बिछा दी गई थी।

अभी पंजाब जिस तरह नशीले पदार्थों का अड््डा है और वहां युवाओं के सामने मुख्यधारा को लेकर अंधियारा ज्यादा है, ऐसे में गुरदासपुर का हमला चिंता का विषय तो है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि कश्मीर में अब भी घुसपैठ करने वाले आतंकवादियों को स्थानीय पनाह मिल रही है। नवेद के लिए सारे रास्ते अबू कासिम ने बनाए। पर अबू कासिम के लिए कश्मीर में कौन रास्ते बनाता रहा और कौन पनाह दिए हुए है यह भी सेना-पुलिस के पास जानकारी नहीं है। नवेद तो रमजान के वक्त भारत में घुसा, लेकिन अबू कासिम 2008 में घुसा और कई आतंकी हमलों को अंजाम दे चुका है। 2013 में सेना के ट्रक पर किए गए हमले के पीछे भी अबू कासिम ही था, जिसमें आठ फौजी शहीद हो गए थे।

अब सवाल है कि जब दिल्ली में पाकिस्तान के सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मिलेंगे तो कसाब की तर्ज पर नवेद को लेकर भी सबूत और दस्तावेज सौंपने का जिक्र होगा। या फिर भारत पहली बार जिंदा आतंकवादी को पकड़ने के बाद भी बातचीत कर दुनिया को नया संदेश देगा कि अब पाकिस्तान को लेकर भारत का रवैया सिर्फ आतंक के मद्देनजर नहीं, बल्कि पाकिस्तान के भीतर का सच भी अब वह दुनिया के सामने लेकर आएगा। इंतजार कीजिए, क्योंकि हर कोई जानता है कि पाकिस्तान पड़ोसी है, जिसे बदला नहीं जा सकता।

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