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राजनीति: जल संकट और चुनौतियां

भारत में पानी की किल्लत पिछले दस-पंद्रह सालों में ज्यादा बढ़ी है। इसका कारण सरकार की गलत नीतियां हैं। इन नीतियों का ही परिणाम रहा है कि राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में जल-स्तर दस से पंद्रह फीट तक नीचे चला गया है। इन इलाकों में बोतलबंद पानी का कारोबार बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां ही कर रही हैं, शीतलपेय बनाने के विशालकाय कारखाने चल रहे हैं।

सांकेतिक तस्वीर।

पानी की बढ़ती किल्लत को लेकर नेशनल इंस्टीटयूट आॅफ हाइड्रोलॉजी ने एक बहुत दिलचस्प अध्ययन किया है। इसके मुताबिक भारत में विकास की रफ्तार बढ़ने के साथ पानी का संकट बढ़ेगा और पानी को लेकर अनेक प्रदेशों में मारा-मारी मच सकती है। यहां एक बात पर गौर करना होगा कि जीडीपी की दर बढ़ रही है, इससे लोगों की आय में इजाफा हो रहा है और जीवन-शैली में तेजी से बदलाव आ रहा है। जाहिर है, आधुनिक जीवन-शैली प्राकृतिक संसाधनों के अतिदोहन पर ही आधारित है। पानी की खपत इसी वजह से पिछले तीस-चालीस साल में तेजी से बढ़ी है। अभी पानी की मांग प्रति व्यक्ति सौ से एक सौ दस लीटर के बीच है, जो 2025 तक बढ़ कर एक सौ पच्चीस लीटर या इससे अधिक हो सकती है। तब तक भारत की आबादी एक अरब अड़तीस करोड़ हो जाएगी और पानी की मांग सात हजार नौ सौ करोड़ लीटर हो जाएगी। लेकिन पानी की उपलब्धता इसकी आधी होगी। राष्ट्रीय जल आयोग के आंकड़ों के अनुसार 1997 में जल की उपलब्धता पांच सौ पचहत्तर क्यूबिक किमी थी (एक क्यूबिक किमी का मतलब 100 अरब लीटर), लेकिन अब यह लगभग पांच सौ क्यूबिक किमी है, जबकि मांग 800 क्यूबिक किमी के लगभग है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि उपलब्धता की तुलना में मांग कितनी ज्यादा है।

भूगर्भ विज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों पर नजर रखने वाली संस्थाओं के अनुसार भारत के पंद्रह फीसद भूजल स्रोत सूख गए हैं। सबसे ज्यादा कुएं, पंपिंग सैट, ट्यूूबवेल भारत में हैं। आंकड़े के मुताबिक जमीन से जल खींचने वाले यंत्रों की संख्या बीस लाख से अधिक है। ऐसे में विश्व बैंक के इस आकलन पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि अगले बीस सालों में भूजल के साठ फीसद स्रोत खतरनाक स्थिति में पहुंच जाएंगे। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए दयनीय बन सकती है कि जल की हमारी सत्तर फीसद मांग भूजल के स्रोतों से पूरी होती है। जाहिर है, तब न तो फसल उगाने के लिए पानी होगा और न उद्योग-धंधों के लिए। खेती-किसानी तो बर्बाद होगी ही, देश की बहुत बड़ी आबादी जल की एक-एक बूंद के लिए तरस सकती है।

विश्व में आज सबसे बड़ा संकट आतंकवाद और पर्यावरण हैं। लेकिन 2050 में जल त्रासदी सबसे बड़ा संकट होगा। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार 2025 तक दुनिया की आबादी आठ अरब और 2050 तक नौ अरब को पार कर जाएगी। एशिया, अफ्रीका, यूरोप आदि में बसने वाले देशों की बड़ी आबादी पानी की किल्लत से जूझ रही होगी। इन देशों में सब-सहारा, कांगो, मोजांबिक, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार, चीन, कोरिया, घाना, केन्या, नामीबिया, अफगानिस्तान, अरब अमीरात, ईरान, इराक, सीरिया सहित कई देश शामिल होंगे। अभी अफ्रीकी और एशियाई देशों में पांच में से एक व्यक्ति पानी के लिए जूझ रहा है। 2050 में साढ़े पांच अरब लोग पानी के संकट से जूझ रहे होंगे। जिस तरह से विकासशील देशों में गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है, उससे यह अनुमान लगाया गया है कि 2025 तक दुनिया की आधी आबादी शहरों में रह रही होगी। इससे जल संकट भीषण रूप ले सकता है।

संयुक्त राष्ट्र भी जल संकट को 2025 तक महासंकट में बदलते देख रहा है। इसलिए वह वर्षों पहले से दुनिया के देशों को जल संकट के प्रति सचेत करता रहा है। भारत में प्रत्येक व्यक्ति को रोजाना कम से कम पिच्यासी लीटर पानी मुहैया होना चाहिए। लेकिन तमाम कवायदों के बावजूद तीस फीसद लोगों को भी जरूरत भर पानी नहीं मिल पा रहा। इंटरनेशनल हाइड्रोलॉजिकल प्रोग्राम के अनुमान के मुताबिक वैश्विक तापमान (ग्लोबल वार्मिंग) के कारण अगले दस साल में वाष्पीकरण की रफ्तार आज की तुलना में दुगनी हो जाएगी। इसकी वजह से नदियों और अन्य जल स्रोतों का पानी कम हो जाएगा। गर्मी बढ़ने से ध्रुवों की बर्फ तेजी से पिघलेगी। इससे मीठा पानी खारे समुद्र में मिल जाएगा और मीठे पानी के जल-स्रोत सूखते चले जाएंगे। दूसरी समस्या जो सबसे विकराल रूप में सामने आ सकती है वह है, जल के लिए पलायन की। तब ऐसे स्थानों पर आबादी की भरमार हो सकती है जहां जल की उपलब्धता सुगम होगी। इससे आर्थिक-सामाजिक समस्याएं पैदा होंगी।

केंद्रीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक देशभर में कुल सालाना बारिश 1170 मिलीमीटर होती है, और वह भी महज तीन महीने में। लेकिन इस अकूत पानी का इस्तेमाल हम महज बीस फीसद कर पाते हैं यानी अस्सी फीसद पानी हम बगैर इस्तेमाल किए बह जाने देते हैं। इसका खमियाजा हर साल पानी की बेहद कमी के रूप में भुगतते हैं। यदि बरसात के पानी को संरक्षित करने की योजना पर अमल करें तो पानी की किल्लत से ही निजात नहीं मिलेगी, बल्कि पानी को लेकर होने वाली राजनीति से भी हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाएगा।

लेकिन बात इतनी-सी नहीं है। जिन इलाकों में बरसात बहुत कम होती है, वहां तो पाताल का पानी ही एकमात्र स्रोत होता है, वहां कैसे पानी की किल्लत से उबरा जाए, इस पर गौर करने की जरूरत है। देश के एक बड़े हिस्से में हर साल सामान्य से भी बहुत कम बारिश होती है। राजस्थान, महाराष्ट्र, बुंदेलखंड जैसे इलाकों में लोगों को बेहद सूखे की स्थिति से रूबरू होना पड़ रहा है। पानी की किल्लत के अलावा पेयजल का संकट भी देश के ज्यादातर प्रदेशों में है। राजधानी दिल्ली का पानी भी पीने के काबिल नहीं रह गया है। चंडीगढ़ स्थित लेबोरेटरी के परीक्षण के मुताबिक दिल्ली में जमीन के नीचे के पानी में क्लोराइड की मात्रा तय सीमा से बहुत अधिक एक हजार फीसद तक पाई गई थी। इसी तरह कैलशियम, मैग्नीशियम, कॉपर, सल्फेट, नाइट्रेट, फ्लोराइड, फेरिक (लोहा) और कैडमियम की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। इन तत्त्वों से युक्त पानी पीने से हृदयघात, किडनी पर बुरा असर, लीवर का संक्रमण, कैंसर, दांत संबंधित बीमारियां, तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर, त्वचा संबंधी रोग, तनाव, दमा जैसी अनेक समस्याएं बहुलता से देखी जा रही हैं।

निम्न जलस्तर वाले इलाकों में पानी की किल्लत तेजी से बढ़ रही है। यह इससे भी साबित होता है कि पिछले दस सालों में इन इलाकों में दो करोड़ से ज्यादा कुएं खोदे जा चुके हैं। ये कुएं दो सौ मीटर से लेकर एक हजार मीटर तक की गहराई वाले हैं। इससे पता चलता है कि जलस्तर हर साल दो से लेकर छह फुट तक नीचे जा रहा है। ऐसे में बरसात के पानी को संरक्षित करके ही इस आसन्न संकट से उबरा जा सकता है। जल संकट को देखते हुए जल-सुरक्षा पर विचार करना बहुत जरूरी है। जल-दोहन करने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर रोक लगनी चाहिए। कई राज्यों में व्यक्तिगत रूप से कुंआ खोदने और ट्यूबवेल लगाने पर रोक लगाई जा चुकी है। पाताल के पानी में जहरीले तत्त्वों की मात्रा का अधिक बढ़ना भी समस्या का बड़ा पहलू है। इस समस्या का कोई हल निकट समय में होता नहीं दिखाई पड़ रहा है।

भारत में पानी की किल्लत पिछले दस-पंद्रह सालों में ज्यादा बढ़ी है। इसका कारण सरकार की गलत नीतियां हैं। इन नीतियों का ही परिणाम रहा है कि राजधानी दिल्ली सहित कई राज्यों में जल-स्तर दस से पंद्रह फीट तक नीचे चला गया है। इन इलाकों में बोतलबंद पानी का कारोबार बड़े पैमाने पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां ही कर रही हैं, शीतलपेय बनाने के विशालकाय कारखाने चल रहे हैं। जल माफिया पानी की चोरी करके रात-दिन पानी के संकट को बढ़ावा दे रहे हैं। समस्याएं गंभीर हैं, इसलिए इन पर तुरंत गौर करने की जरूरत है।

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