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राजनीति: जवानों में अवसाद और योग

गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में जवानों की आत्महत्या और अवसाद के कई कारण गिनाए गए हैं जिनकी वजह से पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न अर्धसैनिक बलों के चार सौ से अधिक जवानों ने आत्महत्या की और साथ ही अपने साढ़े तीन दर्जन से अधिक साथियों को निशाना बनाया। आत्महत्या और साथियों को निशाना बनाने के अलावा बड़ी संख्या में जवान नौकरी भी छोड़ रहे हैं।

indian armyतस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक रूप से किया गया है।

अभिजीत मोहन

सेना और सशस्त्र बलों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से चिंतित केंद्र सरकार द्वारा तीनों सेनाओं में योग और ध्यान के जरिए जवानों को अवसाद से बचाने की पहल एक स्वागतयोग्य कदम है। सेना के जवानों का मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होना इसलिए भी आवश्यक है कि उन्हें अनुकूल व प्रतिकूल सभी परिस्थितियों में समान रूप से काम करना पड़ता है। लेकिन त्रासदी है कि विगत कुछ वर्षों में सेना और सशस्त्र बलों के जवानों में अवसाद के कारण आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है, साथ ही वे अपने सहकर्मियों को निशाना बनाने से भी नहीं चूक रहे हैं। यह स्थिति बेहद खतरनाक है। ऐसे में आवश्यक हो जाता है कि सरकार उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ व मजबूत बनाए, ताकि वे स्वस्थ तन-मन से अपने कर्तव्यों का भलीभांति निर्वहन कर सकें। अच्छी बात है कि इसे ध्यान में रख कर ही सरकार द्वारा उनमें व्याप्त तनाव को दूर करने के लिए ‘सहयोग और मिलाप’ जैसे प्रोजेक्ट शुरू किए हैं जिसके सार्थक परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इस पहल से जवानों में आत्महत्या करने और सहकर्मियों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति में कमी आ रही है।

सरकार के आंकड़े बताते हैं कि 2016 में सेना में आत्महत्या के संदिग्ध मामलों की संख्या एक सौ चार थी, जो 2017 में घट कर पचहत्तर और 2018 में अस्सी रही। इसी अवधि में सेना में सहकर्मियों की हत्या के मामलों में भी उल्लेखनीय कमी आई। इस अवधि में यह संख्या क्रमश: दो, एक और एक थी। इसी तरह 2016 में नौसेना में आत्महत्या के संदिग्ध मामलों की संख्या छह थी, जो 2017 में पांच और 2018 में आठ दर्ज की गई। अच्छी बात यह रही कि इस अवधि में नौसेना में सहकर्मियों की हत्या का कोई मामला सामने नहीं आया। वायुसेना की बात करें तो 2016 में आत्महत्या के संदिग्ध मामलों की संख्या उन्नीस थी, जो 2017 में इक्कीस और 2018 में सोलह दर्ज की गई। वर्ष 2016 में वायुसेना में सहकर्मियों की हत्या का केवल एक मामला सामने आया। लेकिन अच्छी बात यह रही कि 2017 और 2018 में ऐसा एक भी मामला देखने को नहीं मिला।

अब जब सरकार जवानों में आत्महत्या को रोकने और वे अपने सहकर्मियों को निशाना न बनाएं, इसके लिए उन्हें मनोवैज्ञानिक सलाहकारों की मदद दे रही है तो निस्संदेह उनके स्वभाव में बदलाव आएगा। अच्छी बात यह भी है कि जवानों को पहले के बजाय अब बेहतर गुणवत्ता के कपड़े, गुणवत्तापरक भोजन, विवाहितों के लिए आवास और यात्रा जैसी कई सुविधाएं दी जा रही हैं जिससे उनमें किसी तरह का अवसाद नहीं पनप रहा है। एक वक्त था जब जवान उचित खानपान न मिलने की शिकायत कर सोशल मीडिया के जरिए अपनी वेदना प्रकट करते थे, वहीं कुछ जवान छुट्टियां न मिलने की वजह से अवसाद में आकर अपने ही साथियों को निशाना बना रहे थे। जवानों की इस प्रवृत्ति से देश और समाज में गलत संदेश जा रहा था।

पिछले साल सीमा सुरक्षा बल के एक जवान ने खराब खाने को लेकर अपना वीडियो जारी किया था। इसी तरह सीआरपीएफ का एक जवान एक वीडियो में अर्धसैनिक बल के जवानों को सेना के बराबर वेतन और अन्य सुविधाएं देने की मांग कर रहा था। सोशल मीडिया पर यह वीडियो खूब चर्चा में रहा। औरंगाबाद में सीआइएसएफ के एक जवान ने अपने ही चार साथियों को गोलियों से उड़ा दिया था। कुछ साल पहले झारखंड राज्य के सरायकेला में एक जवान ने अपने असिस्टेंट कमांडेट सहित छह लोगों को गोलियों से उड़ा दिया। जांच में पता चला कि हत्यारोपी जवान अवसाद से पीड़ित था। इस तरह की कई घटनाएं देश को विचलित कर चुकी हैं। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि बहुतेरे जवान बुरी तरह अवसादग्रस्त हैं और दबाव में आकर आत्महत्या एवं साथी जवानों की हत्या करने जैसा कदम उठा रहे हैं। अच्छी बात है कि देर से ही सही सरकार ने जवानों के दर्द को समझा और कुछ इस तरह का वातावरण निर्मित कर रही है जिससे कि जवान आत्महत्या जैसे कदम न उठाएं और न ही अवसादग्रस्त होकर अन्य साथियों को निशाना बनाएं।

आमतौर पर आत्महत्या की प्रवृत्ति उन जवानों में सर्वाधिक देखी जाती है जो सीमा पर पहरा देते हैं या जोखिम भरे क्षेत्रों में काम करते हैं। अक्सर इन कार्यों में जवानों को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत-पाक सीमा पर गोलीबारी और आतंकी गतिविधियों के कारण पिछले तीन साल में सुरक्षा बलों के तकरीबन चार सौ जवानों ने जान गंवाई है। इनमें सीमा सुरक्षा बल के सबसे अधिक जवान शहीद हुए हैं। इस बल ने 2015 से 2017 के दरम्यान एक सौ सड़सठ जवानों को खोया है। अपने साथ के जवानों की शहादत को देख कर अन्य जवानों का विचलित होना स्वाभाविक है। मनोवैज्ञानिकों की मानें तो इनमें से कुछ जवान अवसाद में चले जाते हैं। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट में जवानों की आत्महत्या और अवसाद के कई कारण गिनाए गए हैं जिनकी वजह से पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न अर्धसैनिक बलों के चार सौ से अधिक जवानों ने आत्महत्या की और साथ ही अपने साढ़े तीन दर्जन से अधिक साथियों को निशाना बनाया। आत्महत्या और साथियों को निशाना बनाने के अलावा बड़ी संख्या में जवान नौकरी भी छोड़ रहे हैं। केंद्र सरकार भी लोकसभा में स्वीकार कर चुकी है कि अब तक नौ हजार से अधिक अर्धसैनिक बलों के जवान नौकरी छोड़ चुके हैं। इसका मतलब साफ है कि जवान अपनी नौकरी की सेवा शर्तों को लेकर संतुष्ट नहीं हैं।

आमतौर पर अर्धसैनिक बलों के आला अफसर यह दलील देते हैं कि जवानों में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति का मूल कारण उनका पारिवारिक तनाव है, न कि नौकरी के दौरान उपजने वाला मानसिक दबाव। इसमें दो राय नहीं कि जवानों के खुदकुशी करने और नौकरी छोड़ने के पीछे पारिवारिक तनाव भी एक अहम कारण है। लेकिन इसके और भी कारण हैं जिन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। सच तो यह है कि नौकरी की कठिन सेवा शर्तें भी जवानों की परेशानी और आत्महत्या की एक प्रमुख वजह हैं। यहां ध्यान देना होगा कि पिछले कुछ वर्षों से सेना द्वारा नौकरी की सेवा-शर्तें एवं वेतन विसंगतियों को लेकर सवाल उठाया जाता रहा है। अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार ने इसे संज्ञान में लेते हुए सेना में ‘वन रैंक वन पेंशन’ की नीति को लागू किया और वेतन एवं पेंशन में व्याप्त विसंगतियों को दूर करने का कदम उठाया। लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है सेवा शर्तों को उदार बनाना। कठिन सेवा शर्तें कई तरह की परेशानियां खड़ी कर रही हैं। हम केवल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल की ही बात करें तो अस्सी फीसद जवानों को पिछले दो दशक से एक जगह पर स्थायी रूप से नियुक्ति नहीं मिल पाई है और वे समय-समय पर मिलने वाली प्रोन्नति से भी वंचित हैं। सच कहें तो उनका जीवन खानाबदोशों की तरह हो गया है।

सरकार को समझना होगा कि सेना और बलों के जवान भी समाज के हिस्सा हैं, उन्हें भी मानवीय संवेदनाएं प्रभावित करती हैं। उनके मन में भी परिवार के साथ रहने की ललक होती है। ऐसे में सरकार और सेना के उच्च अधिकारियों की जिम्मेदारी बनती है कि वे जवानों की भावनाओं का ख्याल रखें और उन्हें उचित पोषण के अलावा जरूरत पड़ने पर छुट्टियां दें ताकि वे सामाजिक और धार्मिक समारोहों में शामिल हो सकें। वैसे भी जवान नाना प्रकार की चुनौतियों का सामना करते हैं। अगर उन्हें समय-समय पर छुट्टियां मिलें तो वे अवसाद में जाने से बचेंगे।

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