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राजनीति: आजादी का मतलब जिम्मेदारी

दुर्भाग्य से हमारे यहां देश में आजादी तो है, लेकिन जिम्मेदारी और व्यवस्था की भावना नहीं है। हम लोग जो मन में आया उसे करने की आजादी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। हमारा यह गैर-जिम्मेदाराना प्रदर्शन हमारे रोजमर्रा के कामों में भी साफ दिखाई देता है। इसी कारण हमारी सड़कों पर अराजकता दिखाई देती है। लोग बाएं-दाएं का ख्याल किए बिना उलटा-सीधा चलने में संकोच नहीं करते हैं।

Author January 26, 2019 2:55 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Image Source: Facebook/Prashant V. Singh)

एक राष्ट्र के रूप में हमने भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए और उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने का संकल्प लिया है। हमने जिस संसदीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अपनाया है, उसे जनता द्वारा जनता का शासन कहा गया है। पर लोकतंत्र का अर्थ वास्तव में जनता पर जनता का शासन नहीं है। जनता स्वयं कभी शासन नहीं कर पाती। लोकतंत्र का मतलब यही है कि जनता का नेतृत्व करने का सुयोग हर व्यक्ति को मिल सकता है। पश्चिम में लोकतंत्र का जो स्वरूप प्रचलित है, उसमें विचारों की विभिन्नता और उसके आधार पर नेताओं की विविधता के लिए पर्याप्त अवसर हैं। इस विभिन्नता और विविधता के बीच से ही जनता अपनी रुचि के अनुसार अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। इस दृष्टि से लोकतंत्र की परिभाषा इन शब्दों से नहीं की जा सकती है कि सरकार को पदारूढ़ और पद से हटाने की क्षमता जनता के पास है।

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का मार्गदर्शक हमारा संविधान है। इस संविधान के अनुसार प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे, स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे। नागरिक का यह कर्तव्य भी है कि वह भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे, देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे। सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे।

देश की रक्षा करने का मतलब केवल सीमाओं पर लड़ना ही नहीं है। जो भी ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों का पालन और निर्वहन कर रहा है, वह देश की रक्षा ही कर रहा है। जो पूरी ईमानदारी के साथ कर चुका रहा है, वह देश सेवा ही है। जो सरकारी सेवा में है और निष्ठा के साथ दायित्व निभा रहा है, जो जज है और सही फैसले दे रहा है, जो सांसद, विधायक या ग्राम सभाओं, पंचायतों, जिला पंचायत, नगर पालिकाओं के चुने हुए प्रतिनिधि हैं, यदि बिना किसी भेदभाव के व धन को बर्बाद किए या कमीशन लिए-दिए बगैर जनता की सेवा कर रहे हैं, या जो व्यापारी, किसान, पेशेवर, शिक्षक, मजदूर किसी भी वर्ग के हों, यदि अपने क्षेत्र में बिना किसी नोच-खसोट के या कामचोरी किए अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं तो सभी देश की रक्षा कर रहे हैं। रही बात कर देने की, तो कर देना हमारी जिम्मेदारी का आधा हिस्सा है, जो शेष आधा हिस्सा है वह भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। और वह आधा हिस्सा है ऐसी व्यवस्थाएं चुनना, ऐसे लोगों को चुनना या ऐसे लोगों को चुने जाने का माहौल बनाना जो हमारे दिए गए करों के एक भी पैसे का दुरुपयोग न तो करें और न ही होने दें। इसके साथ ही किसी भी जाति, धर्म, समूह, आर्थिक स्थिति, भाषा, प्रदेश, क्षेत्र, लिंग, अवस्था के बारे में अभद्र, असम्मानजनक, अमर्यादित या चोट पहुंचाने वाली टिप्पणी करना या अपमान करना संविधान की इस मूल भावना के विपरीत है। ऐसी टिप्पणियों पर संविधान के उल्लंघन का दोषी होने के अपराध में कार्रवाई हो सकती है।

दरअसल लोकतंत्र का मतलब उसकी विभिन्न लोकतंत्रात्मक संस्थाएं ही नहीं है। वास्तव में इसकी भावना का समावेश जनजीवन में होना चाहिए। यह जीवन की एक प्रणाली है। लोकतंत्र की चरितार्थता प्रातिनिधिक विधान-सभाओं अथवा निर्वाचित सरकारों में नहीं, वरन लोगों के स्वेच्छाप्रेरित सहयोगात्मक कार्यों में है, जिससे वे मिल-जुल कर अपनी समस्याओं का समाधान करते हैं, अपने हितों का समाधान करते हैं और अपनी व्यवस्था का संचालन करते हैं। लोकतंत्र तभी सफल समझा जा सकता है जब लोग स्वेच्छा से प्रेरित होकर अपने कर्तव्यों का पालन करें। जिन लोगों ने अध्यवसाय और प्रेरणाशक्ति का परिचय दिया है, उनके देश में लोकतंत्रात्मक व्यवस्था सफल रही है। लोकतंत्र से स्पष्ट अभिप्राय सामाजिक-आर्थिक न्याय, अवसर की समानता, औद्योगिक लोक व्यवस्था के साथ-साथ उन सभी बातों से ही है जिन्हें हम राजनीतिक लोकतंत्र के नाम से जानते-मानते हैं। और यदि इस लक्ष्य तक पहुंचा सकने में समाजवाद या साम्यवाद विफल हुए हैं तो उस दिशा में प्रयास जारी रखना नितांत आवश्यक है।

जात-पांत और छुआछूत जैसी सामाजिक प्रणालियां एवं मानसिक प्रवृत्तियां भी लोकतंत्र के मार्ग की सबसे बड़ी बाधाएं हैं। जिस समाज में लोग जातिगत आधार पर ऊंच-नीच और अछूत समझे जाते हों, उसमें लोकतंत्र नहीं चल सकता। यह दूसरी बात है कि हर व्यक्ति की योग्यता और क्षमता जन्म से ही भिन्न होती है, किंतु इसकी ऊहापोह प्राणि-शास्त्र का विषय भले हो, जातिवाद से इससे कोई संबंध नहीं हैं। लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वाले प्रत्येक भारतीय विचारक को यह समझ लेना चाहिए कि इस देश में लोकतंत्र के सबसे प्रबल शत्रु जातिवाद और अस्पृश्यता ही हैं। इसके साथ ही यह भी समझ लेने की बात है कि लोकतंत्र के इन प्रबल शत्रुओं को राजनीति के हथियारों से ही नहीं, वरन शिक्षा और विवेक के शस्त्रों से भूमिसात किया जा सकता है। थोड़ा बहुत इसका संबंध अर्थ-व्यवस्था से भी है। आर्थिक स्थिति सुधरने से दलित और पिछड़े वर्गों की सामाजिक अवस्था भी उन्नत हो सकती है। परंतु इनकी आर्थिक स्थिति सुधर जाने से ही जाति प्रथा समाप्त हो जाएगी, यह मानना भूल होगी, क्योंकि आर्थिक दृष्टि से संपन्न जाति वाले भी परस्पर जाति भेद तो मानते ही हैं।

दरअसल भारतीयों में जिस गुण का अभाव पाया जाता है, वह अपने देश के प्रति जिम्मेदारी और समर्पण भावना की कमी है। यह गुण चीन के लोगों में प्रचुर मात्रा में है। इसीलिए चीन में अपनी बहुत अधिक आबादी के बावजूद क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। उन्होंने विकसित देशों को उलझन में डाल दिया है। दुर्भाग्य से हमारे यहां देश में आजादी तो है, लेकिन जिम्मेदारी और व्यवस्था की भावना नहीं है। हम लोग जो मन में आया उसे करने की आजादी को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। हमारा यह गैर-जिम्मेदाराना प्रदर्शन हमारे रोजमर्रा के कामों में भी साफ दिखाई देता है। इसी कारण हमारी सड़कों पर अराजकता दिखाई देती है। लोग बाएं-दाएं का ख्याल किए बिना उलटा-सीधा चलने में संकोच नहीं करते हैं। लोग अपने आसपास के परिवेश को गंदा रखते हैं और सोचते हैं कि सफाई का कार्य तो सरकार का है। बिना किसी हिचक के और यह सोचे-विचारे कि उनके ये कार्य राष्ट्रीय कल्याण और स्वास्थ्य के लक्ष्य तक पहुंचने के मार्ग में बाधक बनते हैं।

कभी-कभी तो किसी भी बात पर लोग इतना उग्र हो जाते हैं कि अपना विरोध जताने के लिए अपनी ही सार्वजनिक संपत्ति (बस, ट्रेन और इमारतों) को आग लगा देते हैं जो उनके ही दिए गए करों से खरीदी और बनाई गई हैं। इसलिए जब तक हमारे भीतर अपने कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी, राष्ट्र के प्रति प्रेम नहीं पैदा होगा तब तक लोकतंत्र सफल नहीं हो सकता। आज एक बार पुन: भारत ऐसी ही पतनावस्था से उबर रहा है। इसलिए भावी भारत के निर्माताओं का यह कर्तव्य है कि वे उन स्रोतों का पता लगाएं, जो शाश्वत भारतीय जन-जीवन को गतिशील बनाए रखने में समर्थ हैं। आज जिस पद्धति का हम विधान करने चले हैं, उसकी संगति निश्चय ही भारत की शाश्वत भावना और अखंड परंपरा से बैठानी चाहिए।

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