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राजनीति: मुसीबत में भारतीय छात्र

करीब आठ साल पहले कैलिफोर्निया की ट्राई-वैली यूनिवर्सिटी का घोटाला सामने आया था। जनवरी 2011 में जब अमेरिका की सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सविर्सेज ने जांच की थी तो यह विश्वविद्यालय वीजा फ्रॉड में शामिल पाया गया था। बाद में उसे बंद करा दिया गया नतीजतन, इससे वहां पढ़ रहे एक हजार से ज्यादा भारतीय छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया था। इसी के फौरन बाद जुलाई 2011 में जब यू्निवर्सिटी ऑफ नॉर्दर्न वर्जीनिया की जांच की गई, तो वहां भी ऐसा ही वीजा घोटाला सामने आया।

Author Published on: February 8, 2019 5:16 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अभिषेक कुमार सिंह

अमेरिका में ‘पे एंड स्टे’ गिरोह का भंडाफोड़ होने से वहां भारतीय छात्रों के फंसने की घटना ने ऐसी समस्या की तरफ ध्यान खींचा है जो एक ओर पढ़ाई व नौकरी के लिए यूरोप-अमेरिका जाने की भारतीय ललक सामने रखती है, तो दूसरी तरफ बाहर जा रहे लोगों की छानबीन और उन्हें मानव तस्करी से बचाने के उपायों की खामियों को उजागर करती है। तीस जनवरी को अमेरिका से खबर आई कि वहां एक फर्जी विश्वविद्यालय की आड़ में अवैध रूप से लोगों को अमेरिका में ठहराने का धंधा चलाया जा रहा है। इस विश्वविद्यालय को चलाने के आरोप में आठ भारतीयों और भारतीय मूल के अमेरिकी लोगों को गिरफ्तार किया गया। उसके बाद अमेरिका के आव्रजन एवं सीमा शुल्क प्रवर्तन विभाग ने विश्वविद्यालय से एक सौ तीस छात्रों को भी गिरफ्तार कर लिया, जिनमें एक सौ उनतीस भारतीय हैं। ये छात्र इस विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए पंजीकृत थे, लेकिन पढ़ाई करने के बजाय देश भर में काम कर रहे थे। हालांकि भारत ने इस मामले में तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए अपनी ओर से राजनयिक विरोध दर्ज करा दिया।

विदेश मंत्री ने यह वादा भी किया कि इन भारतीय छात्रों को कानूनी मदद दिलाई जाएगी, ताकि इन पर कोई कड़ी कार्रवाई न हो। बाद में यह भी पता चला कि यह फर्जी विश्वविद्यालय असल में एक स्टिंग ऑॅपरेशन के तहत अमेरिका ने खुद बनाया था। अमेरिका के मिशिगन राज्य में यूनिवर्सिटी आॅफ फार्मिंग्टन नाम से इस विश्वविद्यालय को अमेरिकी सुरक्षा बलों के एजेंट ही चला रहे थे, ताकि पैसे के बदले अवैध प्रवास की चाहत रखने वालों को पकड़ा जा सके। हालांकि भारतीय अधिकारियों ने कहा कि जिन भारतीय छात्रों ने इस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, मुमकिन है कि वे ठगी के शिकार हो गए हों। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जिन छात्रों ने इस विश्वविद्यालय में दाखिला लिया था, वे जानते थे कि यह एक अवैध विश्वविद्यालय है और ऐसे लोगों का मकसद अमेरिका में अवैध रूप से रुकना और काम करना था। दावा है कि विश्वविद्यालय का इस्तेमाल पैसे के बदले अवैध रूप से अमेरिका में रहने देने की स्कीम के तौर पर किया गया। अवैध प्रवास की इच्छा से पहुंचे लोगों की धरपकड़ के स्टिंग ऑपरेशन जैसे अभियान अमेरिका में पहले भी चलाए जाते रहे हैं।

अमेरिका और यूरोपीय देश बीते करीब एक दशक से वीजा नियमों में धांधली का हवाला देकर उनमें तब्दीली की चेतावनी भी देते रहे हैं। छह साल पहले (2013 में) एक अमेरिकी सीनेटर ने वीजा धांधलियों का हवाला देते हुए अमेरिका में काम कर रही भारत की तीन आइटी कंपनियों का नाम लेकर आरोप लगाया था कि ये छोटी अवधि के लिए अमेरिका में काम करने को इच्छुक विदेशी पेशेवरों को दिए जाने वाले एच-1-बी वीजा का दुरुपयोग कर रही हैं। आरोप था कि ये कंपनियां ऐसे कमर्चारियों को यह वीजा दिला रही हैं जो कम वेतन लेकर अमेरिका में काम करने को राजी हो जाते हैं। इसका असर माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों पर पड़ता है जो ऐसा वीजा ज्यादा संख्या में नहीं दे पाने के कारण अपने कर्मचारियों पर ज्यादा पैसे खर्च करने को बाध्य होती हैं। तब उस सीनेटर ने इसे एक तरह का वीजा फर्जीवाड़ा करार दिया था। हालांकि उस वक्त भी डरबिन के बयान और रवैये पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि उस दौरान खुद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा अपने पहले चुनावी कैंपेन के वक्त से ऐसी ही संरक्षणवादी बयानबाजी करते रहे हैं। उन्होंने यह कह कर अपने नागरिकों को भयभीत किया भी था कि क्या होगा अगर ज्यादातर नौकरियां भारतीय कंपनियों के पास चली जाएंगी और उन्हें तब बंगलुरु जाकर काम करना पड़ेगा।

यदि इस मसले के दूसरे पहलू यानी आव्रजन में धांधली को देखें, तो यह खुद अमेरिका की अपनी समस्या भी है। क्योंकि ऐसे ज्यादातर वीजा घोटाले खुद अमेरिकी कर रहे हैं। करीब आठ साल पहले कैलिफोर्निया की ट्राई-वैली यूनिवर्सिटी का घोटाला सामने आया था। जनवरी 2011 में जब अमेरिका की सिटिजनशिप एंड इमिग्रेशन सविर्सेज ने जांच की थी तो यह विश्वविद्यालय वीजा फ्रॉड में शामिल पाया गया था। बाद में उसे बंद करा दिया गया जिससे इससे वहां पढ़ रहे एक हजार से ज्यादा भारतीय छात्रों का भविष्य अंधकारमय हो गया था। इसी के फौरन बाद जुलाई 2011 में जब यू्निवर्सिटी आॅफ नॉर्दर्न वर्जीनिया की जांच की गई, तो वहां भी ऐसा ही वीजा घोटाला सामने आया। इसके अगले साल अगस्त 2012 में कैलिफोर्निया के सनीवेल स्थित हरग्वेन यू्निवर्सिटी में वीजा घोटाला सामने आया था। इससे वहां पढ़ रहे वाले 400 भारतीय छात्रों के भविष्य का संकट पैदा हुआ था, क्योंकि अमेरिका के इमिग्रेशन एंड कस्टम्स इनफोसर्मेंट ने विश्वविद्यालय की मान्यता वापस लेने के लिए नोटिस जारी किया था। इसलिए अमेरिकी सीनटरों को यह समझाना होगा कि भारतीयों को कठघरे में खड़ा करने के साथ-साथ साफ-सफाई की एक जरूरत खुद उनके अपने घर में भी है।

हालांकि कई दशकों से कनाडा, अमेरिका से लेकर सऊदी अरब आदि दूसरे देशों से श्रमिकों को धोखे से लाकर जबर्दस्ती काम करवाने का कारोबार चल रहा है। भारत और आसपास के देशों से अपना सब कुछ बेच कर या गिरवी रख कर गए लोगों के पासपोर्ट उन्हें लाने वाले दलाल या कंपनियां अपने कब्जे में कर लेती हैं और उनके शोषण का अंतहीन सिलसिला चलता रहता है। वैसे तो भारत सरकार का प्रवासी मंत्रालय ऐसे प्रवासियों के लिए फिक्रमंद तो दिखता है जो रोजगार के लिए यूरोप-अमेरिका, कनाडा, आॅस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों में जाते हैं। मोटे तौर पर इन आइटी पेशेवरों और इंजीनियरों की नौकरी व अन्य हित सुरक्षित माने जाते हैं, लेकिन वैश्विक मंदी ने उनके रोजगारों पर भी असर डाला है। फिर भी अमेरिका और यूरोप का ऐसा रवैया थोड़ा हैरान ही करता है क्योंकि वहां भारतीय आइटी कंपनियों ने ज्यादातर मामलों में किसी अमेरिकी या यूरोपीय कानून की अवहेलना नहीं की है। इन कंपनियों ने न सिर्फ आइटी से संबंधित नौकरियों में ब्रिटेन-अमेरिका में बेहद प्रतिस्पर्धी माहौल बनाया है बल्कि यूरोपीय-अमेरिकी समुदाय में नई चुनौतियों के बरक्स खड़ा होने का साहस और जुझारुपन पैदा किया है।

विदेशों में खास तौर पर रोजगार के लिए गए करीब एक करोड़ दस लाख से अधिक प्रवासी भारतीयों के लिए संकट यह है कि उन्हें स्थानीय श्रम कानूनों में होने वाले फेरबदल के साथ-साथ सिकुड़ते रोजगार विकल्पों की समस्या से भी जूझना है जिन पर अब स्थानीय लोग दावा करने लगे हैं। ऐसे में सवाल यह है कि कुशल और अकुशल श्रमिक के रूप में बाहर गए अनिवासी भारतीयों के हित में हमारी सरकार को क्या-क्या उपाय करने चाहिए जिससे उनसे मिलने वाली विदेशी मुद्रा निर्बाध ढंग से देश में आती रहे और बाहरी मुल्कों में उन प्रवासियों के हित भी सुरक्षित रहें। सरकार कबूतरबाजी के चोर दरवाजे बंद करके इसकी शुरुआत कर सकती है। इसके बाद उसे गौर करना चाहिए कि जिन देशों में भारतीय कामगार व आइटी पेशेवर जा रहे हैं, क्या उनके आव्रजन में वहां के वीजा और श्रम कानूनों से कोई खिलवाड़ तो नहीं किया जा रहा है। साथ ही, यदि उन देशों के वीजा और श्रम कानूनों में कोई बड़ी तब्दीली नजर आए तो ऐसे लोगों को वहां जाने से रोक लेना चाहिए। ऐसा करके ही हम अपने युवाओं के रोजगार और भविष्य को सुरक्षित बना सकते हैं।

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