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राजनीति: विकास और सवाल

प्रदेश में चल रही और स्वीकृत जल-बिजली परियोजनाओं की संख्या पर नजर डालें तो हो सकता है कि आप हैरानी में पड़ जाएं। वर्तमान समय में यहां छोटी-बड़ी चार सौ अठारह जल-बिजली परियोजनाएं हैं जो या तो चलाई जा रही हैं या स्वीकृत हैं। इन परियोजनाओं की कुल बिजली-उत्पादन-क्षमता 14,690 मेगावाट है। बिजली का इतना उत्पादन निश्चित ही विकास को नए आयाम दे सकता है, लेकिन उसका तर्कसंगत होना जरूरी है।

Author February 1, 2019 6:42 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (सोर्स: Express archive)

संजय ठाकुर

देश के विकास में जल-बिजली परियोजनाओं का योगदान तो स्वयं-सिद्ध है, लेकिन जल-बिजली के दोहन का तर्कसंगत होना भी जरूरी है। जल-बिजली का अति दोहन विकास से कहीं ज्यादा विनाश का कारण बनता है। फिर इनकी दास्तान वही रह जाती है कि पहाड़ों को निचोड़ दिया गया, धरती को प्यासा कर दिया गया और चांदी बटोरने के लिए कुछ लोगों ने धरती पर बहती चांदी जैसी जलधारा को मिटा कर प्रकृति को रौंदने का षड्यंत्र रच डाला। यही वास्तविकता बिजली-राज्य के रूप में विकसित हिमाचल प्रदेश की जल-बिजली परियोजनाओं की भी है। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात तो यह है कि यहां जरूरत से कहीं ज्यादा जल-बिजली परियोजनाओं को स्वीकृत करने के साथ-साथ इन परियोजनाओं के संबंध में निर्धारित मापदंडों व नियमों को भी ताक पर रख कर पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया जा रहा है। यहां यह कहानी नदियों से शुरू हुई, फिर सहायक नदियों से होती हुई बड़े नालों तक जा पहुंची और अब तो यह हाल है कि छोटे-छोटे नालों पर भी जल-बिजली परियोजनाएं या तो खड़ी कर दी गई हैं या फिर चलाई जानी स्वीकृत हैं।

प्रदेश में चल रही और स्वीकृत जल-बिजली परियोजनाओं की संख्या पर नजर डालें तो हो सकता है कि आप हैरानी में पड़ जाएं। वर्तमान समय में यहां छोटी-बड़ी चार सौ अठारह जल-बिजली परियोजनाएं हैं जो या तो चलाई जा रही हैं या स्वीकृत हैं। इन परियोजनाओं की कुल बिजली-उत्पादन-क्षमता 14,690 मेगावाट है। बिजली का इतना उत्पादन निश्चित ही विकास को नए आयाम दे सकता है, लेकिन उसका तर्कसंगत होना जरूरी है। यहां महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्रदेश के इतने बड़े पैमाने पर बिजली-उत्पादन की न तो कोई सही दिशा है और न ही इसका कोई तार्किक आधार। यहां इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि बिजली के इस अंधाधुंध दोहन के पीछे पहाड़ों का दर्द और धरती का रुदन छुपा है।

हिमाचल प्रदेश को बिजली-राज्य का दर्जा बहुत पहले ही तब मिल गया था जब यहां केंद्र सरकार के सहयोग से बड़ी जल-बिजली परियोजनाएं चलाई गई थीं। इन परियोजनाओं की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 2,727 मेगावाट है। इस समय प्रदेश में चार बड़ी जल-बिजली परियोजनाएं केंद्र सरकार के साथ साझा रूप से चलाई जा रही हैं। इसके अतिरिक्त प्रदेश अकेले ही 1,531.45 मेगावाट की कुल तीस परियोजनाएं भी चला रहा है। साथ ही प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा 4102 मेगावाट बिजली क्षमता की छह और परियोजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इस तरह से देखें तो वर्तमान में यहां राज्य व केंद्र सरकारों की कुल चालीस जल-बिजली परियोजनाएं चल रही हैं, जिनकी कुल उत्पादन क्षमता 8360 मेगावाट है। साथ ही यहां निजी क्षेत्र में भी छियासी जल-बिजली परियोजनाएं चलाई जा रही हैं जिनकी कुल उत्पादन-क्षमता 5795 मेगावाट है।

हिमाचल प्रदेश में इतने बड़े पैमाने पर चलाई जा रही जल-बिजली परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति क्या है, इस पर गौर करना बहुत ज्यादा जरूरी है। यहां चल रही एक सौ छब्बीस (सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों की) परियोजनाओं में से सिर्फ पचास परियोजनाएं बिजली उत्पादन की स्थिति में हैं। इन परियोजनाओं की कुल उत्पादन-क्षमता 3,478 मेगावाट है। इनमें डेढ़ हजार मेगावाट उत्पादन-क्षमता की राज्य व केंद्र की साझा रूप से चलाई जा रही प्रदेश की सबसे बड़ी सतलुज जल बिजली निगम लिमिटेड के तहत चलने वाली परियोजना के अतिरिक्त, राज्य सरकार की 466.95 मेगावाट उत्पादन-क्षमता की बीस परियोजनाएं और केंद्र सरकार की 1,020 मेगावाट क्षमता की तीन परियोजनाएं हैं। इनके अतिरिक्त निजी क्षेत्र की भी 492.05 मेगावाट उत्पादन-क्षमता की तीन परियोजनाएं हैं। इस तरह से देखें तो प्रदेश में चल रही कुल 126 परियोजनाओं में से पचास परियोजनाएं ही उत्पादन की स्थिति में हैं। इसका नतीजा यह है कि कुल 14155 मेगावाट उत्पादन-क्षमता में से 3478 मेगावाट बिजली उत्पादन हो रहा है।

इसमें सबसे हास्यास्पद बात यह है कि एक तो प्रदेश में पहले से चल रही जल-बिजली परियोजनाओं को ही सही ढंग से नहीं चलाया जा रहा है और प्रदेश सरकार द्वारा 534 मेगावाट उत्पादन-क्षमता की दो सौ बानवे और परियोजनाएं स्वीकृत कर दी गई हैं। इन परियोजनाओं के पीछे की वास्तविकता में भ्रष्टाचार का दुष्चक्र है। यह भ्रष्टाचार प्रदेश सरकार व प्रशासनिक स्तर के कुछ लोगों ने बहुत बड़े पैमाने पर किया है।

नई परियोजनाओं को स्वीकृत करने से पहले इनकी आवश्यकता या चलाए जाने की स्थिति पर कभी गौर नहीं किया गया। पहाड़ों के दर्द और धरती के रुदन की चीत्कार इन परियोजनाओं में सुनी जा सकती है। प्रकृति को आदमी कितनी बुरी तरह से रौंद सकता है, इसका भयावह रूप हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के विभिन्न क्षेत्रों में साफ देखा जा सकता है। यहां कई स्थानों पर नदी-नालों की दिशा मोड़ दी गई है, तो कई स्थानों पर नदी-नालों को बड़ी-बड़ी सुरंगों में गायब कर दिया गया है। इन नदी-नालों के प्राकृतिक मार्ग को बदल कर इनके प्राकृतिक मार्ग के आसपास के स्थानों को जलविहीन करके उजाड़ दिया गया है। एक लंबे समय से ज्यादा नमी में विकसित होने वाले यहां के बहुत-से पेड़-पौधों सहित भारी मात्रा में अन्य वनस्पति सूख चुकी है। ऐसी ज्यादातर परियोजनाओं को स्वीकृत करने से पहले सभी निर्धारित मापदंडों व नियमों को नजरअंदाज किया गया है। उदाहरण के लिए, किसी भी परियोजना को स्वीकृत करने से पहले स्थान-विशेष की स्थिति को देखा जाता है। यह स्थान वन-क्षेत्र से एक निश्चित व निर्धारित दूरी पर होना चाहिए।

अब वास्तविक स्थिति यह है कि ज्यादातर परियोजनाओं को स्वीकृत करने से पहले इस पहलू पर गौर ही नहीं किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसी बहुत-सी परियोजनाएं वन क्षेत्र में या वन क्षेत्र के आसपास निश्चित व निर्धारित दूरी से कम दूरी पर स्वीकृत की गई हैं। इस बाबत सरकार के संबंधित महकमे का कहना था कि कोई भी विकास पर्यावरण को सुरक्षित रख कर नहीं किया जा सकता। यह जवाब जहां चिंताजनक व गैर-जिम्मेदाराना है वहीं इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि हिमाचल प्रदेश सरकार न तो पर्यावरण को लेकर चिंतित है और न ही उसने जल-बिजली परियोजनाओं को स्वीकृत करने से पहले पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक पहलुओं को ध्यान में रखा है।

हिमाचल प्रदेश में जल-बिजली परियोजनाओं के अंधाधुंध विस्तार की वास्तविकता यह है कि प्रदेश की बिजली-राज्य की छवि और यहां जल बिजली उत्पादन की संभावनाओं व क्षमताओं के चलते जल-बिजली परियोजनाएं भ्रष्टाचार का आसान जरिया बन गई हैं। सारी बातों को एक तरफ रख दें तो एक बड़ी वास्तविकता यह है कि हिमाचल प्रदेश में जरूरत से कहीं ज्यादा जल-बिजली परियोजनाएं स्वीकृत की जा रही हैं। यहां पहले से चल रही परियोजनाओं को ही सही ढंग से चला लिया जाए तो जरूरत से कहीं ज्यादा बिजली-उत्पादन किया जा सकता है। ऐसी परियोजनाओं में जल-बिजली का निर्धारित मापदंडों व नियमों का पालन कर, प्रत्येक दृष्टि से सुरक्षित व लाभपूर्ण दोहन किया जा सकता है। इस समय प्रदेश में राज्य व केंद्र की सरकारों द्वारा अलग-अलग व संयुक्त रूप से बहुत-सी परियोजनाएं चलाई जा रही हैं। इस तरह से जहां जल-बिजली-उत्पादन को बढ़ा कर विकास की गति को तेज किया जा सकता है वहीं पहाड़ों को भी उजड़ने से बचा कर पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सकता है। कुछेक मुनाफाखोरों व धन-लोलुपों के लिए प्रकृति का यह चीर-हरण बिल्कुल भी तर्कसंगत नहीं है।

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