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राजनीति: गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की समस्या

सरकारी स्कूलों की खराब होती गुणवत्ता के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की उदासीनता और लापरवाही जिम्मेदार है। अधिकारी और शिक्षक सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सुविधाएं तो प्राप्त करते हैं, लेकिन अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाते हैं। जरूरत है 2015 में दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सख्ती से लागू करने की, जिसमें कोर्ट ने सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़वाना अनिवार्य किया था।

Author Published on: February 7, 2019 4:37 AM
तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

शम्स तमन्ना

इस बार 2019-20 के बजट में शिक्षा के क्षेत्र में करीब चौरानवे हजार करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में यह आबंटित रकम दस फीसद अधिक है। इसमें उच्च शिक्षा के लिए 37,461.01 करोड़ रुपए और स्कूली शिक्षा के लिए 56,386.63 करोड़ रुपए रखे गए हैं। केवल राष्ट्रीय शिक्षा मिशन में 38573 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया गया है। इन राशियों में जहां कक्षाओं का डिजिटलीकरण करना शामिल है, वहीं शिक्षकों के पढ़ाने का स्तर सुधारना और उन्हें प्रशिक्षण देना भी शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार इस वित्त वर्ष में शिक्षा के बजट में 3.69 फीसद का इजाफा हुआ है। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अपने-अपने बजट में स्कूली शिक्षा पर एक बड़ी राशि खर्च करने के बावजूद देश के सरकारी स्कूलों की हालत किसी से छिपी नहीं है। विशेष रूप से, शिक्षकों के पढ़ाने का स्तर इस पूरी शिक्षा व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है।

देश के सबसे बड़े हिंदी भाषी राज्य उत्तर प्रदेश और बिहार के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। परिणामस्वरूप अभिभावक अब अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की बजाय निजी स्कूल में पढ़ाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई गैर सरकारी संस्थाओं ने अपनी रिपोर्ट में अभिभावकों के इस रुझान को सामने लाकर सरकारी स्कूलों की हालत और शिक्षकों के पढ़ाने के स्तर जैसी खामियों को उजागर किया है।

आंकड़े बताते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश में अभिभावकों का सरकारी स्कूलों से मोहभंग हो रहा है। 2015-16 की तुलना में 2016-17 में इन दोनों राज्यों के सरकारी स्कूलों में नामांकित बच्चों की संख्या में करीब 24.79 लाख की कमी दर्ज की गई। अकेले बिहार में ही पंद्रह लाख बच्चे कम नामांकित हुए। वर्ष 2015-16 में जहां बिहार के सरकारी स्कूलों में दो करोड़ पैंतीस लाख बच्चों का नामांकन हुआ था, वहीं 2016-17 में यह आंकड़ा घट कर दो करोड़ उन्नीस लाख रह गया। इसी अवधि के दौरान उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा एक करोड़ बासठ लाख की तुलना में घट कर एक करोड़ बावन लाख रह गया। हालांकि केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और कर्नाटक के सरकारी स्कूलों में भी बच्चों के नामांकन में मामूली गिरावट आई है। कुल मिलाकर देश भर के सरकारी स्कूलों में छप्पन लाख से ज्यादा बच्चों के नामांकन में कमी आई है और इन आंकड़ों में अकेले बिहार और उत्तर प्रदेश का हिस्सा तैंतालीस फीसद है।

सरकारी स्कूलों में नामांकन में आई कमी का सीधा-सा मतलब है कि अभिभवाक अब अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकारी स्कूलों से ज्यादा निजी स्कूलों को तरजीह दे रहे हैं। दरअसल, सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में आ रही लगातार गिरावट से अभिभावकों को यह एहसास होने लगा है कि यहां उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल नहीं है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जहां निजी नौकरियां ही एकमात्र विकल्प हैं, ऐसे में यदि उनके बच्चों को आगे रहना है तो सरकारी नहीं बल्कि पब्लिक स्कूल ही उचित होगा। उन्हें इस बात का यकीन है कि प्राइवेट कंपनियों की कार्य-संस्कृति और उस वातावरण को तैयार करने की क्षमता पब्लिक स्कूलों में होती है। यह कार्य-संस्कृति वास्तव में अंग्रेजी भाषा से जुड़ी है।

अभिभावकों को लगता है कि सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी केवल एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है, वह भी नाममात्र के लिए, जबकि पब्लिक स्कूलों में हिंदी विषय को छोड़ कर अन्य सभी विषय न केवल अंग्रेजी में पढ़ाए जाते हैं बल्कि स्कूल परिसर में छात्रों को अंग्रेजी भाषा में ही बात करने के लिए प्रेरित भी किया जाता है। अंग्रेजी भाषा से स्कूली पढ़ाई करने वाले बच्चों को भविष्य में मेडिकल, इंजीनियरिंग, कानून, प्रबंधन और मीडिया जैसे पेशेवर क्षेत्रों की पढ़ाई कराने वाले देश के उच्च शिक्षण संस्थाओं में आसानी से प्रवेश मिल सकता है। जबकि सरकारी स्कूलों में हिंदी माध्यम से पढ़ने वाले बच्चों को इन्हीं क्षेत्रों में प्रवेश पाना मुश्किल हो जाता है।

बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में पब्लिक स्कूलों के प्रति अभिभावकों के बढ़ते रुझानों के पीछे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार भी एक बड़ा कारण है। पिछले कुछ दशकों में इन दोनों राज्यों में प्रति व्यक्ति आय में काफी सुधार हुआ है। केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय की एक रिपोर्ट के अनुसार 2004-05 में बिहार में प्रति व्यक्ति आय 8560 रुपए थी जो बढ़ कर 2014-15 में 16652 रुपए हो गई। उत्तर प्रदेश में इसी अवधि के दौरान यह 14580 रुपए से बढ़ कर 22892 रुपए प्रति व्यक्ति तक पहुंच गई। घर की अच्छी आमदनी ने बच्चों की गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई के प्रति अभिभावकों के नजरिये को भी बदला है।

सरकारी स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में लगातार गिरावट आने का बड़ा कारण शिक्षकों की कमी भी है। देशभर में सरकारी स्कूलों में तकरीबन साठ लाख शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं, लेकिन अलग-अलग स्तरों पर जारी किए गए सरकारी आंकड़ों और कई संस्थाओं के शोध-सर्वे में यह बात सामने आई है कि इस वक्त देशभर में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के लगभग दस लाख पद खाली हैं। इनमें अकेले नौ लाख पद प्राथमिक स्कूलों में खाली हैं। प्राथमिक स्तर पर सबसे ज्यादा दो लाख चौबीस हजार से ज्यादा पद उत्तर प्रदेश में खालीहैं। इसी तरह बिहार में दो लाख से ज्यादा प्राथमिक स्कूल शिक्षकों के पद खाली हैं। पश्चिम बंगाल और झारखंड के प्राथमिक एवं माध्यमिक स्कूलों में भी शिक्षकों के औसतन एक तिहाई पद खाली हैं।

इसके बाद मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का नंबर आता है, जहां स्थिति कुछ बेहतर है लेकिन इसे भी संतोषजनक नहीं कहा जा सकता है। इसके विपरीत गोवा, ओड़ीशा और सिक्किम में प्राथमिक स्कूलों में शिक्षकों का कोई पद खाली नहीं है। सिक्किम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर शिक्षकों के शत-फीसद पद भरे हुए हैं। जबकि माध्यमिक स्तर पर देश में शिक्षकों की सबसे ज्यादा कमी झारखंड में है। बिहार में भी माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों के स्वीकृत सत्रह हजार से अधिक पद खाली हैं। देश के सबसे अशांत राज्य जम्मू-कश्मीर में भी इक्कीस हजार से अधिक माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों की जगह खाली है।

समस्या केवल शिक्षकों की कमी की नहीं, प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी की भी है। सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटबिलिटी (सीबीजीए) और चाइल्ड राइट एंड यू (क्राई) के एक शोध के अनुसार योग्य शिक्षकों की कमी देश के लगभग सभी राज्यों में है। समूचे देश में शिक्षक-छात्र अनुपात, शिक्षकों की संख्या और उनके प्रशिक्षण के मामले में बिहार की स्थिति सबसे खराब है, जहां खाली पड़े पदों को भरने के लिए अतिथि शिक्षकों के नाम पर बड़ी संख्या में अप्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती कर दी गई। बिहार के प्राथमिक स्कूलों में अड़तीस फीसद से ज्यादा अध्यापक प्रशिक्षित नहीं हैं, जबकि माध्यमिक स्तर पर ऐसे शिक्षकों की संख्या पैंतीस फीसद है। दूसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल आता है जहां प्राथमिक स्तर पर 31.4 और माध्यमिक स्तर पर 23.9 फीसद शिक्षक प्रशिक्षित नहीं हैं।

सरकारी स्कूलों की खराब होती गुणवत्ता के लिए शिक्षा विभाग के अधिकारियों की उदासीनता और लापरवाही जिम्मेदार है। अधिकारी और शिक्षक सरकारी खजाने से वेतन और अन्य सुविधाएं तो प्राप्त करते हैं, लेकिन अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों में पढ़ाते हैं। जरूरत है 2015 में दिए गए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को सख्ती से लागू करने की, जिसमें कोर्ट ने सभी नौकरशाहों और सरकारी कर्मचारियों के लिए उनके बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़वाना अनिवार्य किया था। जब सरकारी अफसरों और कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे तभी इन स्कूलों की हालत सुधर पाएगी।

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