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राजनीति: बोडो आतंक की चुनौती

बोडोलैंड की मांग उभरने का प्रमुख कारण असम के आदिवासी क्षेत्रों में अन्य इलाकों से आकर बसने वालों और घुसपैठ को माना जाता है। दरअसल, असम में 1947 से ही घुसपैठियों की आवाजाही रही जो 1971 में बड़े पैमाने पर बढ़ गई। भारत की विभिन्न सरकारें इसे लगातार नजरअंदाज करती रहीं और इस कारण समूचा उत्तर-पूर्व अलगाव और आतंकवाद का केंद्र बन गया।

Author February 12, 2019 5:41 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक तौर पर (Source: PTI)

ब्रह्मदीप अलूने

पूर्वोत्तर के प्रवेश द्वार असम में जितनी भौगोलिक असमानताएं हैं उससे कहीं ज्यादा सांस्कृतिक विभिन्नताएं हैं। बराक और ब्रह्मपुत्र घाटी में बंटे इसके प्राकृतिक क्षेत्र कबीलों और जातियों के प्रभुत्व की रक्तरंजित लड़ाई से अभिशप्त रहे हैं और देश की सुरक्षा के लिए यह बड़ा चुनौतीपूर्ण रहा है। हाल ही में सीबीआइ की विशेष अदालत ने असम के विभिन्न इलाकों में 2008 में शृंखलाबद्ध बम विस्फोट के मुख्य साजिशकर्ता नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आॅफ बोडोलैंड के प्रमुख रंजन दैमारी और नौ अन्य को उम्रकैद की सजा सुनाई है। इन विस्फोटों में इक्यासी लोग मारे गए थे। भारत से अलग पृथक बोडोलैंड के पक्ष में लगातार हिंसक आंदोलन चलाने वाले नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आॅफ बोडोलैंड के उग्रवादियों का कानूनी शिकंजे में फंसना निश्चित ही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की बड़ी सफलता है, लेकिन इस संगठन के प्रभाव की हिंसक चुनौती अभी भी बरकरार है।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) की सूची में शामिल आतंकी संगठनों में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड समेत पूर्वोत्तर के अन्य संगठन शामिल हैं जो बोडोलैंड की मांग को लेकर हिंसक आंदोलन छेड़े हुए हैं। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आॅफ असम या उल्फा भी शामिल है। बोडोलैंड की मांग उभरने का प्रमुख कारण असम के आदिवासी क्षेत्रों में अन्य इलाकों से आकर बसने वालों और घुसपैठ को माना जाता है। दरअसल, असम में 1947 से ही घुसपैठियों की आवाजाही रही जो 1971 में बड़े पैमाने पर बढ़ गई। भारत की विभिन्न सरकारें इसे लगातार नजरअंदाज करती रहीं और इस कारण समूचा उत्तर-पूर्व अलगाव और आतंकवाद का केंद्र बन गया। इस घुसपैठ से वहां रहने वाले आदिवासियों के सामने सांस्कृतिक, आर्थिक और जातीय पहचान का संकट खड़ा हो गया और इसी कारण वहां अस्सी के दशक में अलगाववादी संगठन उल्फा अस्तित्व में आया। उसने अपनी पहचान बनाए रखने के लिए पृथक बोडोलैंड की मांग रखी। बाद में बोडो ने मूल निवासी बनाम प्रवासी को मुख्य एजेंडा बना लिया, उन्होंने प्रवासी मुसलमानों और अन्य आदिवासी समूहों को निशाना बनाना शुरू किया जो बाद में जातीय और सांप्रदायिक उन्माद का कारण बन गया।

उल्फा के समान ही असम में सक्रिय नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) भी भारत से आजाद होकर एक अलग होमलैंड की मांग कर रहा है। यह मूलत: बोडो आदिवासी समुदाय का संगठन है जो असम को अपनी जमीन मानते हैं और यहां पर बसने वाले अन्य जातीय समूहों को संदेह से देखते हैं। बोडो, जिन्हें अपना प्रतिद्वंद्वी समझते हैं उनमें असम में रहने वाले हिंदी भाषी, अन्य आदिवासी समुदाय और मुसलमान शामिल हैं। मुसलमानों में अधिकांश बंगाली मुसलमान हैं, जिसका फायदा बांग्लादेश से आए घुसपैठियों ने भी उठाया है और इससे इस इलाके में हिंसा में बढ़ोतरी हो रही है। एनडीएफबी अरुणाचल प्रदेश, भूटान और बांग्लादेश की सीमा के पास अधिक सक्रिय है। यहीं से वह अपनी गतिविधि चलाता है। साल 2003 में भारतीय सेना ने भूटान की सेना के साथ मिल कर ऑपरेशन ऑल क्लियर नामक एक आतंकवाद विरोधी अभियान चलाकर कई आतंकी शिविरों को ध्वस्त कर दिया था। इस कार्रवाई में नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के कई आतंकी मारे भी गए थे। लेकिन उसके बाद भी इस समूह की हिंसक गतिविधियां जारी रहीं। इसका प्रमुख कारण उन्हें बांग्लादेश से मिलने वाली मदद रही है।

असम के बोडोलैंड टेरीटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट्स के अंतर्गत कोकराझार, बक्सा, उदलगुड़ी और चिरांग इलाके आते हैं। यहां पर एनडीएफबी अधिक प्रभावी है और सेना के साथ अन्य जातीय समूहों को अक्सर निशाना बनाते हैं। भूटान, बांग्लादेश और चीन से लगता यह इलाका बोडो उग्रवादियों को छिपने की जगह और हथियार भी उपलब्ध कराता है। बांग्लादेश असम में अशांति का मुख्य स्रोत है। चार हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा भौगोलिक और सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण भारत के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा संकट रही है। इसका फायदा पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आइएसआइ खूब उठाती है और कई इलाकों में भारत के विरुद्ध विद्रोही संगठनों को आश्रय और प्रशिक्षित करके भारत पर हमले करने के लिए प्रेरित करती है। उनका ध्यान खासतौर पर ऐसे समूहों के लिए होता है जो भारत के सीमा प्रांतों में विभाजन करना चाहते हैं।

पूर्वोत्तर के कई विद्रोही संगठनों को बांग्लादेश में पनाह मिलती रही है। वहां का काक्स बाजार विदेशी हथियारों का प्रमुख केंद्र है। यहीं से सड़क मार्ग से भी हथियार भारत आ जाते हैं। बांग्लादेश के चटगांव, खगराचरी, मौलवी बाजार, हबीबगंज, स्लीट, मेमन सिंह, कुरी ग्राम, कोमिला, रंगमाटी, बंदरबन और ढाका में ऐसे कई शिविर हैं जो आतंकवादियों की पनाहगाह हैं। यहां पर भारत विरोधी अंतरराष्ट्रीय ताकतें भी प्रभावी हैं। भारत के पूर्वोत्तर के कई अलगाववादी नेता बांग्लादेश में परिवार के साथ बस गए हैं और वहां की नागरिकता भी इन्हें मिल गई है। ये अलगाववादी बांग्लादेशी पासपोर्ट का प्रयोग करते हैं जो आसानी से उन्हें उपलब्ध हो जाते हैं। इस पासपोर्ट के जरिए ये दुनियाभर के आतंकी संगठनों के संपर्क में आते हैं और उनके प्रशिक्षण स्थलों तक पहुंच बनाते हैं।

एनडीएफबी के अलगाववादी नेता और उपाध्यक्ष धीरेन बोरो और महासचिव गोविंदा बासु मैत्री को सुरक्षा एजेंसियों ने साल 2002-2003 में पकड़ा था। इन्होंने खुलासा किया था कि पूर्वोत्तर के कई आतंकी संगठनों को आइएसआइ पाकिस्तान में प्रशिक्षण देती है और उन्हें ढाका से पाकिस्तान ले जाया जाता है।
इसके पहले बोडो और संथाल आदिवासियों का विवाद तो चलता रहता था, लेकिन पृथक बोडोलैंड की मांग खालिस्तान की मांग के साथ ही उठी। इन सबके पीछे पाकिस्तान के तानाशाह जिया उल हक की अस्सी के दशक में शुरू की गई आपरेशन जिब्राल्टर की वह नीति थी जो भारत में बड़े पैमाने पर जातीय और सांप्रदायिक तनाव भड़काने के लिए तैयार की गई थी। असम में मुसलमानों और बोडो के बीच हिंसक संघर्ष होते रहे हैं। इन इलाकों में बोडो की संख्या करीब तीस फीसद है और आम चुनावों में यदि कोई बोडो उम्मीदवार किसी गैर बोडो उम्मीदवार से हार जाए तो हिंसा अक्सर भड़क जाती है।

बोडो अलगाववादियों के एक नए गुट बोडो लिबरेशन टाइगर्स यानी बीएलटी ने हिंसा का रास्ता छोड़ बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट नामक राजनीतिक पार्टी बनाई। अब यह दल प्रभावी भूमिका में आ गया है। बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद ने भी उग्रवादी संगठनों और उनके समर्थकों को राजनीतिक ताकत के साथ आर्थिक लाभ भी प्रदान किया है। यह भी साफ है कि बोडोलैंड टेरीटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट्स (बीटीएडी) में अल्पसंख्यक होने के बावजूद बोडो अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट अब असम का ऐसा राजनीतिक दल भी है जो बोडो के विशेष अधिकारों का समर्थन करता है। इसे नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) का ही एक गुट माना जाता है। इसके साथ ही बोडो उग्रवादी संगठनों में उल्फा को भी बेहद खतरनाक माना जाता है। वह असम का विभाजन कर अलग संप्रभु राष्ट्र की मांग कर रहा है और अरुणाचल से सटे इलाकों को बोडोलैंड घोषित करना चाहते हैं। उनका दावा है कि अलग हुए बिना बोडो जाति का विकास नहीं हो सकेगा।

नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड के कुछ आतंकियों के जेल में होने से बोडोलैंड आंदोलन बहुत ज्यादा प्रभावित हो इसकी संभावना कम ही है। असम में अभी भी उल्फा और नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट आॅफ बोडोलैंड के उग्रवादी सकिय होकर कार्य कर रहे हैं। उन्हें न केवल राजनीतिक समर्थन हासिल है, बल्कि पड़ोसी देशों से सामरिक मदद भी मिल रही है। साल 2016 में पृथक बोडोलैंड के पक्ष में कई संगठनों ने मिल कर राज्य भर में हिंसक प्रदर्शन भी किए थे। जाहिर है, बोडोलैंड की समस्या को समाप्त करने के लिए सामूहिक रूप से दीर्घकालीन राजनीतिक, सामाजिक और सामरिक प्रयास करने की जरूरत है।

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