ताज़ा खबर
 

राजनीति: कृषि के लिए निर्यात जरूरी

उत्पादन में कई देशों से बहुत आगे होते हुए भी निर्यात में हम पीछे हैं। इसका मुख्य कारण है हमारी निर्यात होने वाली वस्तुओं में विविधता की कमी और ज्यादा कीमत वाले उत्पादों का निर्यात कम होना। मसलन, वैश्विक बाजार में इस समय कृषि उत्पादों में सबसे ज्यादा मांग सब्जियों और फूलों की है। हमारे कुल कृषि निर्यात में ऊंची कीमत वाले उत्पादों का हिस्सा सिर्फ पंद्रह फीसद है, जबकि निर्यात का बावन फीसद हिस्सा गेहंू, चावल और समुद्री उत्पादों का है जिनकी वैश्विक बाजार में आपूर्ति हद से ज्यादा है और कीमत बहुत ही कम।

Author February 13, 2019 5:00 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो सोर्स : Indian Express)

सुविज्ञा जैन

खेती-किसानी पर सोच-विचार अचानक बढ़ गया है। सिर्फ किसान और सरकारें नहीं शहरों में रह रहे नौकरीपेशा, उद्योग धंधों में लगे और सामाजिक चिंताशील लोग भी कृषि पर विमर्श करते दिख रहे हैं। इससे देश में कृषि पर संकट की तीव्रता पता चलती है। कृषि और किसानों के लिए क्या और कितना किया जाए, इस पर पिछले दो दशकों में सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर खूब विचार-विमर्श हुआ और दोनों ही स्तर पर विशेषज्ञ समितियों की ढेरों सिफारिशें हमारे सामने हैं। लेकिन कृषि सुधार की हर योजना और उपाय की बात देश के सीमित संसाधनों पर आकर अटकती रही है। यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि देश के अंदर से कृषि के लिए संसाधन जुटाने की तमाम कोशिशें हो चुकी हैं और शायद इसीलिए कुछ समय से कृषि निर्यात बढ़ा कर बदहाल होती जा रही कृषि को राहत देने की कोशिशें दिख रही हैं। लेकिन वैश्विक बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की स्थिति बेहतर हो नहीं पाई।

भारत शुरू से ही कृषि प्रधान देश है। लेकिन आजाद होते ही भारत के सामने सबसे बड़ा संकट पर्याप्त भोजन की व्यवस्था का ही था। उस समय खाद्य उत्पादन हमारी मांग के हिसाब से बहुत कम था। पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत में हम सैंतालीस लाख टन अनाज विदेशों से मंगा रहे थे। उसके पांच साल बाद उत्पादन बढ़ा कर हम अपना कृषि आयात घटा कर दस लाख टन तक ले आए। लेकिन तीसरी पंचवर्षीय योजना के दौरान दो युद्ध और गंभीर सूखे ने कृषि की कमर तोड़ दी और सन 1966 में भारत को अपनी आबादी की खाद्य जरूरत पूरा करने के लिए एक करोड़ टन अनाज आयात करना पड़ा। संकट से उबरने के लिए तब उन्नत बीजों के इस्तेमाल की योजना से हरित क्रांति की नींव रखी गई थी। आखिर खाद्य आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल हुआ और फिर कुछ भारतीय कृषि उत्पादों का निर्यात भी शुरू हुआ। इसमें गेहंू प्रमुख था। उस समय से आज तक भारतीय कृषि उत्पादन औसतन बढ़ता ही रहा। आजादी के बाद पहली पंचवर्षीय योजना की शुरुआत में जो खाद्य उत्पादन करीब पांच करोड़ टन था, वह आज अट्ठाईस करोड़ टन तक पहुंच चुका है। लेकिन कृषि निर्यात उस हिसाब से नहीं बढ़ पाया। इस समय कृषि उत्पादन में भारत दुनिया के शीर्ष पांच देशों में है। लेकिन कृषि निर्यात के मामले में हम वैश्विक सूची में पहले दस देशों में भी नहीं आते।

पिछले साल के कृषि निर्यात के आंकड़े पर नजर डालें तो वाणिज्य मंत्रालय की निगरानी में आने वाले मुख्य तीस क्षेत्रों में सोलह क्षेत्रों का निर्यात घटा है। उन सोलह उत्पादों में आठ कृषि उत्पाद हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में हमारे कई कृषि उत्पादों की मांग घटी है। इसके कई कारण हो सकते हैं। लेकिन प्रबंधन प्रौद्योगिकी के पाठों के मुताबिक वैश्विक बाजार में किसी उत्पाद की मांग घटने के दो ही कारण हो सकते हैं। या तो बाजार में दूसरे देश भारतीय उत्पाद से बेहतर गुणवत्ता के उत्पाद दे रहे हैं या उनका माल हमसे सस्ता है। सार्वभौमिक नियम यह है कि अगर किसी उत्पाद की आपूर्ति ज्यादा हो और खरीददार सीमित तो प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है और माल बिकने के मौके कम हो जाते हैं। इसलिए या तो हम अपने उत्पाद की गुणवत्ता बढ़ाएं या अपने कृषि उत्पाद की लागत को कम करने का इंतजाम करें।

भारतीय कृषि इस समय निर्यात बढ़ाने पर ज्यादा निर्भर इसलिए भी है कि हर साल कृषि पैदावार का रिकॉर्ड टूट रहा है। कई फसलों की उपज भी घरेलू जरूरत से ज्यादा होने लगी है। मसलन पिछले साल गन्ने की रेकॉर्ड पैदावार हुई। इससे तीन करोड़ पंद्रह लाख टन चीनी बनी। जबकि चीनी की घरेलू खपत सिर्फ ढाई करोड़ टन थी। तब सरकार को चीनी निर्यात के लिए चीनी मिलों को ट्रांसपोर्ट सबसिडी देने का एलान करना पड़ा। पचास लाख टन चीनी निर्यात करने का लक्ष्य बनाया गया था। आज तक का मोटा अनुमान है कि तीस से पैंतीस लाख टन चीनी ही निर्यात हो पाएगी। इसी के साथ इस साल की फसल आ चुकी है। इस साल भी चीनी का उत्पादन तीन करोड़ टन से ज्यादा रहने का अनुमान है। ऐसी ही कई दूसरी फसलों की खपत को लेकर सरकार अब कृषि निर्यात को एक बड़े विकल्प के रूप में देख रही है। और इसलिए अब देश के बाहर बाजार तलाशने पर ज्यादा जोर है।

वैश्वीकरण के दौर में बाजार तलाशना इतना आसान नहीं है। हर देश प्रतिस्पर्धा में है। ऐसे में भारत प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अभी तक निर्यात पर अलग-अलग सबसिडी देकर अपना माल बाहर बेच रहा था। लेकिन पिछले कुछ समय से भारत पर अंतरराष्ट्रीय मंचों से यह दबाव बन रहा है कि हम अपने जिन उत्पादों का निर्यात बढ़ाने के लिए सबसिडी दे रहे हैं उसे बंद कर दें। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में हमारी शिकायत भी दर्ज कराई गई है। लेकिन अगर हम सबसिडी बंद करते हैं तो विदेशों में भारतीय माल के दाम बढ़ जाते हैं। सबसिडी हटाने के लिए दूसरे देशों का तर्क है कि वैश्विक बाजार में सभी उत्पादकों के लिए समान मौके होने चाहिए। सरकार के निर्यात पर सबसिडी दे देने से दूसरे देशों के उत्पाद की बिक्री के मौके घाट जाते हैं। वैश्विक व्यवस्था का यही दबाव हमारे ऊपर है। इधर अपनी अंदरूनी माली हालत के कारण सबसिडी की मदद देकर ज्यादा समय तक अपने माल को टिकाए रखना भी मुश्किल काम है। इसलिए भारत को अपने कृषि उत्पाद को प्रतिस्पर्धा में लाने के दूसरे उपाय सोचने ही पड़ेंगे।

बहरहाल, इसे मानने में कोई हर्ज नहीं है कि अभी तक भारतीय कृषि विश्व बाजार में प्रमुख विक्रेता नहीं बन पाई है। उत्पादन में कई देशों से बहुत आगे होते हुए भी निर्यात में हम पीछे हैं। इसका मुख्य कारण है हमारी निर्यात होने वाली वस्तुओं में विविधता की कमी और ज्यादा कीमत वाले उत्पादों का निर्यात कम होना। मसलन, वैश्विक बाजार में इस समय कृषि उत्पादों में सबसे ज्यादा मांग सब्जियों और फूलों की है। हमारे कुल कृषि निर्यात में ऊंची कीमत वाले उत्पादों का हिस्सा सिर्फ पंद्रह फीसद है, जबकि निर्यात का बावन फीसद हिस्सा गेहंू, चावल और समुद्री उत्पादों का है जिनकी वैश्विक बाजार में आपूर्ति हद से ज्यादा है और कीमत बहुत ही कम। गेहंू और चावल जैसे उत्पादों को निर्यात करने की एक बड़ी वजह यह है कि भारतीय कृषि निर्यात नीति अवशिष्ट निर्यात आधारित है। यानी अभी तक हम उन वस्तुओं के निर्यात पर जोर लगाते आए हैं जो घरेलू खपत पूरा होने के बाद बच जाती हैं। जबकि इस समय वैश्विक मांग को देखते हुए खासकर निर्यात के नजरिए से ज्यादा कीमत वाली फसलें उगाने पर जोर लगाने की जरूरत है।

इसीलिए पिछले महीने वाणिज्य मंत्रालय की तरफ से नई कृषि निर्यात नीति में मोटे तौर पर चार लक्ष्य बनाए गए हैं। इसमें मुख्य लक्ष्य है 2022 तक कृषि निर्यात को दुगना करना यानी तीस अरब डॉलर से साठ अरब डॉलर तक पहुंचाना। निर्यात किए जाने वाले उत्पादों में विविधता लाना और नए बाजार तलाशना। इसी के साथ ज्यादा कीमत वाली फसलों के उत्पादन और निर्यात को बढ़ाना, और राज्यों के लिए वैश्विक बाजार आसानी से पहुंच में लाने के संस्थागत तंत्र को मुहैया करना और निर्यात में आने वाली रुकावटों को कम करना। यानी यह तय हो गया है कि क्या किया जाए। अब देखा जाना है कि इसे किया कैसे जाएगा? कृषि निर्यात के ये उपाय लागू हो पाए तो भारतीय कृषि के लिए यह कदम मील का पत्थर साबित हो सकता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App