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निर्मल रानी का लेख : खाद्य पदार्थों में छिपे खतरे

लगभग पूरे देश के उपभोक्ता इस समय सब्जी व फल उत्पादकों से लेकर दुकानदारों तक की इन कारगुजारियों के शिकार हैं।

नई दिल्ली | June 15, 2016 4:08 AM
प्रतीकात्मक फोटो

देश के करोड़ों लोग जब लंबे समय से बिक रही बहुचर्चित व लोकप्रिय खाद्य सामग्री मैगी खाने के आदी हो चुके थे उस समय पिछले दिनों इस समाचार ने देश में तहलका मचा दिया कि इसमें मिलाई जाने वाली लेड की अत्यधिक मात्रा उपभोक्ताओं के लिए कैंसर जैसे भयंकर रोग का कारण बन सकती है। इसी प्रकार कुछ दिनों पूर्व खबर आई कि ब्रेड जैसी दैनिक उपयोगी वस्तु जो लगभग पूरे देश में सामान्य रूप से खाई जाती है उसमें शामिल कुछ आपत्तिजनक रसायन ऐसे हैं जिनसे उपभोक्ता को कैंसर हो सकता है। देश के डॉक्टरों तथा वैद्य-हकीमों द्वारा आम लोगों को सलाह दी जाती है कि वे हरी सब्जियां, साग, फल आदि का सेवन करें तो शरीर हृष्ट-पुष्ट तथा रोग-मुक्त रहता है। पर जब सब्जी उत्पादन तथा फलों के पकाने की प्रक्रिया पर नजर डालें तो हमें लगेगा कि शायद साग-सब्जी व फलों से जहरीली कोई वस्तु है ही नहीं। कभी-कभी देश के खोजी पत्रकारों द्वारा कुछ ऐसी रिपोर्टें प्रसारित की जाती हैं जिन्हें देख कर अपने-आप से यह सवाल करना पड़ता है कि आखिर खाएं तो खाएं क्या? और पौष्टिक आहार ढूंढ़ने जाएं तो जाएं कहां।

यह बात इस समय सामान्य रूप से लगभग सभी को ज्ञात हो चुकी है कि खेतों में पैदा होने वाली सब्जियों की लता अथवा पौधे की जड़ों में एक ऐसे जहरीले व नुकसानदेह इंजेक्शन का इस्तेमाल किया जाता है जिससे वह सब्जी रातों-रात फूल कर तैयार हो जाती है। कहने वाले लोग तो यहां तक कहते हैं कि रात में खेतों में सब्जियां इतनी तेजी से बढ़ती हैं कि उनके बढ़ने की प्रक्रिया के दौरान पत्तों की आवाज भी सुनाई देती है। इसी प्रकार अधिकांश फल ऐसे हैं जिन्हें समय-पूर्व पेड़ों से तोड़ लिया जाता है और उन्हें कारबेट जैसे जहरीले रसायन की गर्मी से पकाया जाता है। ये बातें सरकारी या गैर-सरकारी लोगों से छुपी नहीं हैं। पर यह स्थिति कितनी बड़ी सच्चाई का रूप धारण कर चुकी है कि मंत्री से लेकर संतरी तक तथा आला अधिकारी से लेकर मजदूर वर्ग तक सभी को बाजार में उपलब्ध इसी प्रकार की जहरीली चीजें खाने के लिए विवश होना पड़ता है। कम समय में अधिक उत्पादन तथा अधिक आय की चाहत ही इन हालात के पैदा होने का मुख्य कारण है। हालांकि राज्य सरकारों द्वारा खाद्य सामग्रियों में इस प्रकार के जहरीले रसायनों का इस्तेमाल किए जाने के विरुद्ध कानून बनाए गए हैं। कभी-कभी छापेमारी की खबरें भी आती हैं। मगर नतीजा, आखिरकार वही ढाक के तीन पात।

दूध, घी, खोया व पनीर जैसी पौष्टिक समझी जाने वाली खाद्य सामग्रियों में किन-किन तरीकों से मिलावट की जाती है और किस प्रकार पानी में विभिन्न प्रकार के रसायन, डिटर्जेंट पाउडर आदि मिला कर ये खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं। इनसे संबंधित खबरें भी समय-समय पर मीडिया लोगों को दिखाता रहता है। खासतौर पर त्योहारों के समय में किस प्रकार इन्हीं नकली व जहरीली खाद्य सामग्री से तैयार की गई मिठाइयां बाजारों में बेची जाती हैं यह भी हम सब देखते व सुनते रहते हैं। लेकिन चूंकि इस प्रकार के जानलेवा धंधे में शामिल लोगों के विरुद्ध कभी कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाती और हमारे देश के लचीले कानूनों के चलते इन घिनौने कारनामों में संलिप्त अपराधी या तो कानून की गिरफ्त में नहीं आ पाते या फिर गिरफ्तारी के बाद अदालत से इन्हें जल्द जमानत मिल जाती है, लिहाजा उनके मन में किसी प्रकार का भय पैदा नहीं होता और वे पुन: दूसरों को धीमा जहर दिए जाने के अपने नापाक व्यवसाय में व्यस्त हो जाते हैं। गोया उन्हें पुलिस अथवा कानून के डंडे का कोई डर कतई नहीं रहता।

कुछ समय पूर्व मुंबई के निकट एक बाहरी इलाके की एक ऐसी खतरनाक रिपोर्ट एक टीवी चैनल ने प्रसारित की जिसे देख कर रूह कांप उठी। दिखाया गया था कि सब्जी उगाने वाले खेतों के बीच से औद्योगिक कचरा बहाने वाला एक नाला गुजर रहा है जिसमें सिवाय जहरीले बदबूदार द्रव्य के और कुछ नहीं है। इन खेतों के सब्जी उत्पाद्र इसी जहरीले नाले में मोटरपंप डाल कर उसका जहरीला द्रव्य खींच कर अपने खेतों की सिंचाई कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त उन खेतों में सिंचाई करने का कोई दूसरा साधन नहीं है। अब जरा कल्पना कीजिए कि जिन सब्जियों की पौध की जड़ों में शुरू से ही जहरीले रसायन कचरे से सिंचाई की जा रही हो वे सब्जियां तैयार होने के बाद कितनी जहरीली होंगी! और ये सब्जियां महानगर मुंबई के ग्राहकों को बेची जाती हैं। इतना दहलाने वाला समाचार टीवी पर प्रसारित होने के बावजूद सरकारों के कान खड़े नहीं होते। और यदि संबंधित विभाग ऐसे विषयों पर कोई संज्ञान लेता भी है तो वह भी भ्रष्टाचार की धारा में डुबकी लगा कर अपने कर्तव्य को पूरा किया समझता है।

खेतों में आमतौर पर इस्तेमाल होने वाली यूरिया व अन्य रासायनिक खादों की वजह से बेशक हमारे देश में प्रति एकड़ की दर से फसल के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है, पर इनके दुष्प्रभाव के परिणामस्वरूप न केवल खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता में कमी आई है बल्कि पक्षियों की अनेक प्रजातियां या तो विलुप्त हो गई हैं या विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसी प्रकार के जहरीले खाद्य पदार्थों की देन है कि आज किशोरावस्था में ही बच्चों को कहीं कैंसर हो रहा है तो कहीं उनकी आंखें कमजोर हैं, कोई पीलिया का शिकार है तो कोई हृदय रोग से प्रभावित है। आज के बच्चों की शारीरिक दशा देख कर उन पर दया आती है। कोई बच्चा बाहरी प्रदूषित वस्तुएं खाकर जरूरत से ज्यादा मोटा हो जाता है या फिर उसका शरीर कंकाल-सा प्रतीत होता है। इन सब बातों का मूल कारण दूषित खान-पान ही है। और हालात इस हद तक बिगड़ चुके हैं कि लाख चाहने के बावजूद कोई व्यक्ति स्वयं को इन चीजों से सुरक्षित नहीं रख सकता।

सवाल यह है कि जिस भावी युवा पीढ़ी के हाथों हम देश के भविष्य की बागडोर सौंपने की तैयारी कर रहे हैं, हमारी सरकारें जिनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी तरह-तरह की योजनाएं बनाती रहती हैं, जिन बच्चों के अठारह वर्ष की आयु पूरे होने का राजनैतिक पार्टियां सिर्फ इसलिए इंतजार करती हैं कि ये नए युवा मतदाता अगले चुनाव में उनकी ओर आकर्षित हों और उनके पक्ष में मतदान करें। क्या उन्हीं राजनैतिक दलों, राजनेताओं तथा सत्ताधीशों की यह जिम्मेदारी नहीं कि वे यह सुनिश्चित करें कि बाजार में ऐसी कोई भी वस्तु, कोई भी खाद्य सामग्री बिकने न पाए जिनके इस्तेमाल से किसी देशवासी के स्वास्थ्य को रत्ती भर नुकसान पहुंचता हो? यदि देशवासियों का तन-मन स्वस्थ नहीं होगा तो हम स्वस्थ समाज व स्वस्थ भारत की कल्पना ही कैसे कर सकते हैं?

हमारे देश में इंतिहा तो यह है कि सड़ी-गली और जहरीली व रासायनिक विधियों द्वारा तैयार की गई वस्तुएं तो बिकती ही हैं, इसके अतिरिक्त यही वस्तुएं महंगे दामों पर भी बेची जाती हैं और मौका लगने पर दुकानदार इन्हें कम तौलने की कोशिश भी करता है। लगभग पूरे देश के उपभोक्ता इस समय सब्जी व फल उत्पादकों से लेकर दुकानदारों तक की इन कारगुजारियों के शिकार हैं। पर चूंकि आम ग्राहक एक असंगठित समाज का सदस्य है इसलिए वह पैसे खर्च करने के बावजूद जहरीली खाद्य सामग्री खरीदने के लिए मजबूर है। भारत की गिनती दुनिया के सर्वाधिक कुपोषण-ग्रस्त देशों में होती है। पर अब कुपोषण की समस्या केवल गरीबी और वंचना की वजह से नहीं है; इस वजह से भी है कि खेत से लेकर बाजार तक खाद्य पदार्थों को लगातार दूषित किया जा रहा है। ग्राहक के पास कितनी भी क्रयशक्ति हो, उसके लिए शुद्धता और पौष्टिकता दुर्लभ होती जा रही है।

इन हालात में यह शासन-प्रशासन का दायित्व है कि वे देश के लोगों को ऐसा जहरीला नेटवर्क चलाने वालों के चंगुल से बचाएं। साथ-साथ स्वयंसेवी संगठनों को भी इस विषय पर यथाशीघ्र सक्रिय होने की जरूरत है। जहां कहीं भी फलों व सब्जियों के उत्पादन में टॉक्सिन अथवा दूसरे जहरीले इंजेक्शन या रसायन का प्रयोग किया जाता हो या जिन गोदामों में कारबेट या इन जैसे दूसरे रसायनों के माध्यम से फलों को जल्द पकाने का काम किया जाता हो उन खेतों व गोदामों का पर्दाफाश किया जाना जनहित में जरूरी है। इसके अतिरिक्त, कानून में भी इस मामले में और सख्ती लाए जाने की जरूरत है। क्योंकि इस प्रकार के अपराध कोई अनजाने में किए जाने वाले अपराध की श्रेणी में नहीं आते बल्कि ऐसे अपराध केवल जल्दी से अधिक धन कमाए जाने की खातिर किए जाने वाले सुनियोजित अपराध हैं।

इन अपराधों के परिणामस्वरूप देश के आम नागरिक न केवल गंभीर बीमारियों के शिकार होते हैं बल्कि ऐसी ही संगीन बीमारियों के चलते लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ती है। लिहाजा, ऐसे अपराधों की बाबत देश में कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए। बेहतर होगा कि ऐसे कृत्य गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में रखे जाएं, ताकि आम लोगों की जान से खेलने की इनकी आदतों पर लगाम लगाई जा सके। और जब तक ऐसा नहीं होता तब तक देश की जनता निश्चित रूप से यह सोचने को मजबूर है कि आखिर हमें कहां और कैसे मिलेगा पौष्टिक आहार?

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