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निरंकार सिंह का लेख : विकास का पैमाना क्या हो

हमारे उच्चवर्गीय और सत्ताधारी लोग आवश्यकताओं को निरंतर बढ़ाते जाने, अधिकाधिक प्राप्त करने की होड़ में लगे रहने की ‘विकास’ और ‘प्रगति’ की पश्चिम की पुरानी अवधारणाओं पर मोहित हैं।
Author नई दिल्ली | July 18, 2016 00:10 am
गरीबी बढ़ती जा रही है। अगर वास्तविक आकलन हो तो कम से कम चालीस प्रतिशत जनता आज भी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है।

केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, आजकल सभी विकास का राग अलाप रही हैं। लेकिन इस विकास का लाभ आम आदमी को कितना मिल रहा है यह विचारणीय विषय है। विकास का पैमाना क्या हो? यह शुरू से ही विवाद का विषय रहा है। पर आज देश या प्रदेश के विकास का पता उस देश या प्रदेश की दौलत, उसके लोगों की खुशहाली और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी हैसियत से चलता है। कोई देश या प्रदेश कितना दौलतमंद है, इसका पता उसके कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), भुगतानों की बकाया रकम, विदेशी-विनियिम-मुद्रा की सुरक्षित निधि, आर्थिक विकास की दर और प्रतिव्यक्ति आय से भी चलता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसकी हिस्सेदारी और इन दोनों क्षेत्रों में उसके विकास की दर भी यह संकेत देती है कि उसकी आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत है और उसमें कमाई हुई दौलत को संभाले रखने और उसे लगातार बढ़ाते रहने की सामर्थ्य है या नहीं। ये आर्थिक संकेत वैसे अपने आप में काफी अहमियत रखते हैं, लेकिन ये काफी कुछ छिपा जाते हैं, जैसे देश या प्रदेश के आम आदमी की दशा और बेरोजगारी का इन संकेतकों से कुछ पता नहीं चलता है।

‘प्रतिव्यक्ति आय’ लोगों की औसत आय को बताती है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि हर देशवासी के पास उतना धन है। इसका आंकड़ा अमीरों और गरीबों, दोनों की आमदनियों के औसत से निकाला जाता है। इससे यह भी नहीं पता चलता कि किसी एक देश या एक राज्य या एक क्षेत्र की खुशहाली दूसरे देशों की तुलना के लिए एक जैसी है। आजकल एक नया मानदंड अपनाया जाने लगा है। खरीद-क्षमता में समानता। इस कार्य के लिए कई इससे भी ज्यादा पेचीदा तरीके अपनाए जाने लगे हैं। पर ये सब मिल कर भी आम आदमी के दैनिक जीवन के चंद पहलुओं को ही दर्शा पाते हैं। ये आंकड़े इस बात पर बिल्कुल प्रकाश नहीं डालते कि लोगों ने जो जीवन-स्तर प्राप्त कर लिया है, उसे वे बनाए रख सकते हैं या नहीं।

भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में जहां मजदूरों, किसानों, बुनकरों और तमाम छोटे-मोटे कारीगरों की संख्या कुल जनसंख्या का दो तिहाई से भी अधिक हो, वहां जीडीपी या प्रतिव्यक्ति आय के पैमाने से उनकी दशा को नहीं जाना जा सकता है। इस बहुसंख्यक आबादी के जीवन से जुड़े मुद््दों की पहचान करने के लिए जो मानदंड अपनाए जा सकते हैं वे हैं- इन लोगों को किस प्रकार का भोजन मिलता है और उसकी पौष्टिकता की स्थिति क्या है? शिशुओं की मृत्यु दर, पीने के पानी की सुलभता और गुणवत्ता, रहने की जगह, लोगों के आवासों की श्रेणियां, रोग के आक्रमण उसके दुष्प्रभाव, असमर्थताएं और गड़बड़ियां, चिकित्सा सुविधाओं की सुलभता, साक्षरता, प्राथमिक स्कूलों की संख्या और पढ़ाई का स्तर, आवागमन की सुविधा, बिजली की उपलब्धता और तेजी से बदलते आर्थिक माहौल में समाज की मांगों के हिसाब से युवाओं को तरह-तरह के कारीगरी व हुनर को सिखाने और प्रशिक्षित करने के केंद्रों की संख्या बेरोजगारी की तुलना में कितनी है।

आम जनता के जीवन में सुधार लाने के लिए जरूरी कई और सुझावों का जिक्र भी किया जा सकता है। महात्मा गांधी का कहना था कि देश के लिए किए गए हर काम की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसके द्वारा सबसे गरीब और पिछड़े आदमी की आंखों के आंसू पोंछे जा सकते हैं या नहीं। उनका मानना था कि जब ऐसा दिन आएगा तभी यह माना जाएगा कि हमारा राष्ट्र सुखी राष्ट्र हो गया है। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अज्ञान के निराकरण के साथ-साथ जब तक हर नागरिक को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिलेगा तब तक देश की प्रगति अवरुद्ध रहेगी। पर सामाजिक और आर्थिक विकास को देखें तो बड़ी भयानक तस्वीर सामने आएगी। जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है, बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है। देश की एक चौथाई जनता गरीबी रेखा के नीचे है। भोजन, वस्त्र के अलावा पेयजल, मनुष्य के रहने लायक मकान, चिकित्सा सेवा, आवागमन की सामान्य सुविधा जैसी न्यूनतम आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं।

अब सवाल यह उठता है कि प्रचलित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से क्या यह तस्वीर बुनियादी रूप से बदल सकती है। क्या केंद्र और राज्य सरकारें इसके लिए कोई ठोस उपाय कर रही हैं। हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, जनकल्याण के लिए तमाम योजनाओं के मद में केंद्र सरकार राज्य सरकारों को सिर्फ धन मुहैया कराती है। इन योजनाओं को लागू करने का जिम्मा राज्य सरकारों का है। लेकिन इन योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई राज्यों में इस कदर लूट चल रही है लोकतांत्रिक सत्ता का मतलब ही हो गया है अपना और अपने लोगों को दौलतमंद बनाना। उनकी दौलत तो दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ जाती है, पर आम जनता गरीबी व बेबसी में पिसती रहती है।

आखिर हमारी प्रचलित व्यवस्था और उसका दर्शन क्या है? यह एक बुनियादी सवाल है, क्योंकि पहली बात यह है कि क्या कोई प्रचलित व्यवस्था भी है? देश की पैंसठ फीसद आबादी गांवों में रहती है और पैंतीस फीसद शहरों में। इस पैंतीस फीसद का एक तिहाई हिस्सा औद्योगिक मजदूर है और कुछ चौथे या तीसरे वर्ग के कर्मचारी हैं। इसके अलावा छोटे-मोटे कारोबारी और उनसे जुड़े हुए लोग हैं। इनमें टैक्सी, टैम्पो और रिक्शाचालक आदि हैं। शहरी क्षेत्रों में भी गरीबी और गंदगी है, गंदी बस्तियां हैं, फिर भी गांव से शहर की ओर लगातार पलायन हो रहा है। इस आबादी के एक छोटे-से हिस्से को वहां रोजगार मिल जाता है। शहरों की ओर ग्रामीण आबादी के पलायन की प्रमुख वजह यही है।

शहरों में एक छोटा-सा हिस्सा पाश्चात्य रहन-सहन की दृष्टि से काफी सुखी है। इनमें सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और विश्वविद्यालयों, विद्यालयों के शिक्षक, कर्मचारी, कुछ व्यापारी और उद्यमी भी शामिल हैं। राजधानियों में सरकारी अधिकारी और मंत्री भी रहते हैं। इसलिए अगर कोई व्यवस्था है तो वह इन्हीं लोगों से बनी है, जिनका हर दस साल बाद वेतन लगभग दोगुना हो जाता है। सांसद और विधायक तो खुद अपना वेतन-भत्ता मनमाने ढंग से बढ़ा लेते हैं। इस व्यवस्था का दर्शन शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग का दर्शन है। ग्रामीण क्षेत्रों का भी जो विशिष्ट वर्ग है वह लगातार शहरी क्षेत्रों की ओर खिंचा जा रहा है।

इस व्यवस्था का दर्शन यही है कि जितना हमारे पास हो, उससे हम ऊपर उठें। परिवर्तनकारी जमातों का कहना है कि जो उपलब्ध है, वह और भी अधिक लोगों को उपलब्ध कराया जाए अर्थात लाभों का वितरण हो। सारी राजनीति, सारे विशेषाधिकार एक छोटे तबके तक सीमित है। यह आवश्यक नहीं है कि ये सभी पूंजीपति हों। पर सबके सब विशेषाधिकार-युक्त हैं और सार्वजनिक क्षेत्र ही औद्योगिक संरचना का सबसे बड़ा हिस्सा है। देश का विशिष्ट वर्ग चाहता है कि तकनीक और भी अधिक आधुनिक हो, औद्योगीकरण बढ़े तथा कृषि का अधिक से अधिक यंत्रीकरण हो। आज भारत की आधुनिकता का मर्म यही है। गांधीजी की कल्पना इससे बिल्कुल भिन्न थी। पर जवाहरलाल नेहरू के जमाने में इन्हीं विद्वानों ने या इनके ही जैसे विद्वानों ने गांधीजी के मार्ग को दकियानूस माना और जवाहरलाल की आधुनिक दृष्टि के प्रशंसक बने रहे। परिणाम सामने है।

गरीबी बढ़ती जा रही है। अगर वास्तविक आकलन हो तो कम से कम चालीस प्रतिशत जनता आज भी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। बेकारी भी बढ़ती जा रही है। साथ-साथ विषमता भी कम होने के बदले बढ़ ही रही है। इसीलिए अब सबका ध्यान फिर से गांधीजी के विचारों की ओर जाने लगा है। उच्च वर्ग के बहुत-से विद्वानों को भी ऐसा महसूस होने लगा है कि गांधीजी के दिखाए रास्ते को छोड़ कर भारत ने बहुत गलती की है। अत: ये सब लोग भी गांधीजी की विचारधारा से मिलते-जुलते विचार रखने लगे हैं। जैसे कि कृषि-विकास हमारी विकास योजना का मुख्य आधार बनना चाहिए। इसकी बुनियाद पर ही गृह उद्योगों और ग्रामोद्योगों की एक रूपरेखा गांवों के विकास के लिए बनानी चाहिए। उसमें बिजली, परिवहन और बाजार आदि की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं। बड़े उद्योगों की उपेक्षा करने की बात नहीं है, पर अपने देश में जहां पूंजी की बहुत कमी हो और मानव-शक्ति बड़े पैमाने पर बेकार पड़ी हो तथा देश की अधिकांश आबादी गांवों में बसती हो, वहां योजना की बुनियाद ही बदलनी चाहिए।

मगर यह बात खासतौर पर ध्यान में रखनी चाहिए कि आज भी हमारे उच्चवर्गीय और सत्ताधारी लोग आवश्यकताओं को निरंतर बढ़ाते जाने, अधिकाधिक प्राप्त करने की होड़ में लगे रहने की ‘विकास’ और ‘प्रगति’ की पश्चिम की पुरानी अवधारणाओं पर मोहित हैं। यही वजह है कि हमारी योजनाएं तथा विकास के सारे कार्यक्रम उलटे हमारी समस्याओं को अधिक पेचीदा बना रहे हैं।

जरूरत इस बात की है कि सभी देशवासियों को सुरक्षित और सुखद वर्तमान तो मिले ही, बेहतर भविष्य भी मिले। यह तभी संभव है जब देश की जनता में भी अपने देश को बेहतर बनने की प्रबल भावना जगे। दुनिया के जो देश विकसित बने हैं, उसमें वहां की जनता का भी योगदान है। अमेरिका, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया आदि देश जिस प्रकार कार्य योजना बना कर आगे बढ़े हैं, हम भी उसी प्रकार कार्य योजना बना कर और लागू करके आगे बढ़ सकते हैं।

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