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दम तोड़ती मदद की पुकार

अलग-अलग सेवाओं के लिए ढेरों हेल्पलाइन नंबरों की भरमार जनता में सिवाय दुविधा बढ़ाने के और कुछ नहीं करती। इसके अलावा असंख्य हेल्पलाइनों से जुड़े कर्मचारी काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी निगरानी भी नहीं हो सकती। ऐसे में ज्यादातर हेल्पलाइन हाथी के दांत जैसी दिखावटी व्यवस्था बन कर रह जाते हैं। साफ है कि अगर हेल्पलाइन रूपी आपातकालीन नंबर हमेशा सक्रिय नहीं रखे जा सकते और इनके जरिए लोगों की मदद नहीं हो सकती है, तो इन्हें बंद करना ज्यादा बेहतर होगा।

बंगाल चुनाव नतीजों के बाद हुई हिंसा के पीड़ितों से मिलते बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा। (पीटीआई)।

संजय वर्मा
संकट अक्सर अनदेखे-अनजाने होते हैं। आपदाएं बता कर नहीं आतीं। सदियों से यही होता आया है। पर इंसानी सभ्यता ने विकास के साथ संकटों से मुकाबले के कई उपाय किए हैं। आपदा प्राकृतिक हो, तो कई जतन करके लोगों को उनसे बाहर निकाला जाता है। जहां तक संभव हो, उन्हें आने वाली मुसीबत के बारे में पहले से सूचित किया जाता है। फिर भी अगर कोई किसी भी संकट में फंस जाए, तो इसकी जानकारी लेने के प्रबंध किए जाते हैं। ऐसा ही एक प्रबंध है हेल्पलाइन। फोन से की जाने वाली मदद की पुकार। इसे कभी पुलिस सुनती है, कभी अग्निशमन विभाग, कभी अस्पताल, तो कभी आपदा नियंत्रण कक्ष। मगर क्या हो, अगर मुसीबत में फंसे लोगों की पुकार को सुनने वाला तंत्र काम ही न करे। वे हेल्पलाइनें बंद मिलें, जिन पर मदद की गुहारों को सुनने और संबंधित लोगों तक उन्हें पहुंचाने की जिम्मेदारी है। कोरोना काल में कुछ ऐसा ही हमारे देश में अनेक स्तरों पर होता दिखाई दिया है।

अपराध, बाल-अधिकारों की वंचना, शोषण, आग, बीमारी की आपदा आदि तमाम स्थितियों से उबारने में मदद मांगने के लिए अक्सर लोग टेलीफोन की शरण में जाते रहे हैं। दी गई हेल्पलाइन के जरिए आवश्यकता के अनुसार कभी पुलिस की पीसीआर वैन को बुलाया जाता है, तो कभी अस्पताल की एंबुलेंस को। बाढ़, भूकंप, सुनामी, चक्रवात, रेल दुर्घटना आदि स्थितियों में अक्सर सरकार और प्रशासन की ओर से अस्थायी किस्म की हेल्पलाइनें स्थापित की जाती हैं। इन पर मुसीबत में फंसे लोगों की गुहार सुनने और उन तक मदद पहुंचाने के प्रबंध किए जाते हैं। ये हेल्पलाइनें कितनी तरह की हो सकती हैं, इसका अंदाजा इधर कोरोना से फैली महामारी के दौर में देश में हो रहा है।

हाल में जिस तरह से कोरोना की दूसरी संहारक लहर के कारण आपात स्थितियां पैदा हुई हैं, उनमें तमाम किस्म की हेल्पलाइनों की बाढ़ आ गई है। हेल्पलाइनों पर समस्या सुनी जाए और निदान के प्रयास हों, तो ऐसी हेल्पलाइनों से भला किसी को क्या इनकार हो सकता है। लेकिन जिस जनता को इन हेल्पलाइनों से मदद की उम्मीद थी, वही जनता इनकी नाकामियों की कहानी कह रही है। लोग बता रहे हैं कि ये हेल्पलाइनें मदद करने के बजाय दुविधा ज्यादा पैदा कर रही हैं।

महामारी के ताजा दौर में कई राज्य सरकारों ने ढेरों हेल्पलाइनें कायम की हैं। दिल्ली में आक्सीजन सिलिंडर भरने की जानकारी देने की हेल्पलाइन है, तो उत्तर प्रदेश में दवाओं और आॅक्सीजन सिलिंडर की कालाबाजारी रोकने हेतु शिकायत करने की हेल्पलाइन है। सिर्फ सरकार नहीं, स्थानीय प्रशासन के अलावा राजनीतिक पार्टियों ने जनता में पैठ बनाने के लिए अपनी ओर से भी कई हेल्पलाइनें खोल दी हैं। दावा किया जा रहा है कि मरीज और उनके परिजन इन हेल्पलाइन सेवाओं से चिकित्सीय परामर्श की सुविधा, जांच के लिए चिह्नित केंद्र, सरकारी और निजी क्षेत्र में कोरोना इलाज के लिए सुविधा, उपलब्ध बिस्तर, आक्सीजन आदि से संबंधित जानकारी फोन करके ले सकते हैं। दावा यह भी है कि ये हेल्पलाइन नंबर चौबीसों घंटे काम करते हैं।

बढ़-चढ़ कर यह भी कहा जा रहा है कि इन हेल्पलाइनों से पूरे देश में जारी कोरोना वायरस के कहर के खिलाफ लड़ाई का आगाज असरदार तरीके से हो सकेगा। ये पहलकदमियां ऊपर से काफी अच्छी लगती हैं। ऐसा लगता है कि देश पर इस समय जो मुसीबत आई है, घर बैठे उसका समाधान हो जाएगा। पर हकीकत में ऐसा नहीं है। हेल्पलाइनों का जंजाल अपने आप में किसी आपदा से कम नहीं है।

हेल्पलाइनें किस तरह के संकट पैदा कर रही हैं, हाल में इसके असंख्य उदाहरण मिले हैं। जैसे, आॅक्सीजन सिलिंडर और अस्पताल में मरीजों के लिए खाली बिस्तरों की जानकारी देने वाली हेल्पलाइनों का ही किस्सा उनकी दुर्गति की कहानी कह देता है। अव्वल तो ऐसी ज्यादातर हेल्पलाइनों पर दूसरे छोर पर कोई फोन उठाने वाला नहीं होता। आक्सीजन की या अस्पताल में बिस्तर की मांग कर रहा मरीज का परिजन या तो घंटों हेल्पलाइन पर फोन करते-करते थक जाता है और उसका मरीज समय पर इलाज नहीं मिलने के कारण बेमौत मर जाता है या फिर हेल्पलाइनों पर अधूरी या गलत जानकारी दी जाती है।

कई तीमारदारों ने हाल में शिकायत की है कि जिन अस्पतालों ने अपनी वेबसाइट पर बिस्तर खाली होने की जानकारी दिखाई, हेल्पलाइन पर फोन करने से उन्हें अस्पताल में कोई बिस्तर नहीं होने की बात बताई गई। कहा गया कि वे वेबसाइट के आंकड़ों पर यकीन न करें। ऐसे में मरीज और उनके तीमारदार क्या करें, यह उनकी समझ में ही नहीं आता। सच तो यह है कि कुछ मीडिया संगठनों ने जब हाल में कुछ राज्यों और शहरों में जारी किए गए हेल्पलाइन नंबरों की असलियत जानने का प्रयास किया, तो पाया कि उनमें से ज्यादातर काम ही नहीं कर रहे हैं। हालांकि उनमें से कुछ नंबर सही साबित हुए हैं, लेकिन बहुत से हेल्पलाइन नंबर ऐसे थे, जिन पर कोई जवाब नहीं मिल रहा था।

हेल्पलाइन नंबरों का काम न करना या उनसे सही जानकारी न मिलने का क्या असर होता है, इसकी एक मिसाल तीन साल पहले राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन के संबंध में मिल चुकी है। उपभोक्ता आयोग ने अपनी इस हेल्पलाइन की हकीकत जानने के लिए 2018 में एक आतंरिक सर्वेक्षण कराया था। उसमें पता चला कि विभिन्न कंपनियों के उत्पादों, उनकी सेवा में कमी संबंधी मामलों में उपभोक्ताओं ने शिकायत के जरिए जो जंग छेड़ी थी, उनमें से चौंसठ फीसद शिकायकर्ताओं ने अपनी लड़ाई बीच में ही छोड़ दी, क्योंकि उनकी शिकायतों का कोई निपटारा नहीं हुआ। सर्वेक्षण में यह तथ्य भी सामने आया कि इक्यावन फीसद लोग इस हेल्पलाइन सेवा से बिल्कुल संतुष्ट नहीं थे। यानी हेल्पलाइन लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। ऐसे में सवाल है कि लाखों-करोड़ों के खर्च से चलने वाली ये सरकारी हेल्पलाइनें कैसे वास्तव में मुसीबत के मारों के लिए मददगार साबित हों और अपनी सार्थकता साबित करें।

इसका पहला उपाय तो यह है कि इनकी एक केंद्रीयकृत व्यवस्था हो और विशेष जरूरत का नंबर एक ही हो। जैसे हाल में देश की राजधानी में दिल्ली सरकार ने आॅक्सीजन सिलिंडर भरने के लिए जो हेल्पलाइन शुरू की है, उस पर उत्तर प्रदेश के मेरठ और गाजियाबाद के अलावा फरीदाबाद (हरियाणा) के लोग भी मदद मांगने लगे। वजह यह थी कि दूसरे राज्यों के लोगों के पास अपने राज्य में कायम ऐसी ही किसी हेल्पलाइन की कोई जानकारी नहीं थी। अगर आॅक्सीजन सिलिंडर की उपलब्धता का कोई हेल्पलाइन नंबर कायम किया जा रहा है, तो केंद्रीय स्तर पर या फिर सारे राज्य मिलकर एक ही नंबर नहीं बना सकते। दूरसंचार के इस आधुनिक युग में भी अगर हमारा तंत्र यह मामूली उपाय करने में समर्थ नहीं है, तो यह विडंबंना है।

अलग-अलग सेवाओं के लिए ढेरों हेल्पलाइन नंबरों की भरमार जनता में सिवाय दुविधा बढ़ाने के और कुछ नहीं करती। इसके अलावा असंख्य हेल्पलाइनों से जुड़े कर्मचारी काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी निगरानी भी नहीं हो सकती। ऐसे में ज्यादातर हेल्पलाइन हाथी के दांत जैसी दिखावटी व्यवस्था बन कर रह जाते हैं। साफ है कि अगर हेल्पलाइन रूपी आपातकालीन नंबर हमेशा सक्रिय नहीं रखे जा सकते और इनके जरिए लोगों की मदद नहीं हो सकती है, तो इन्हें बंद करना ज्यादा बेहतर होगा। इससे कम से कम जनता के पैसे की बर्बादी तो रुकेगी।

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