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विशिष्ट पहचान का संकट

किसी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार से वंचित करने की कानूनी प्रक्रिया कहती है कि इसके लिए सरकारी अधिकारी को उस व्यक्ति को नोटिस देना चाहिए और बताना चाहिए कि किन आधारों पर उनका सरकारी दस्तावेज, खासतौर से राशन कार्ड फर्जी है। लेकिन हैरत है कि देश में शायद ही किसी अधिकारी ने राशन कार्ड को फर्जी बता कर उसे निरस्त करने से पहले इस कानूनी प्रक्रिया का पालन किया होगा।

आधार कार्ड एक बेहद हीज जरुरी दस्तावेज है।

संजय वर्मा
बीते कुछ वर्षों से देश में हर काम के डिजिटलीकरण पर जोर दिया जा रहा है। खासतौर से आधार कार्ड को लेकर सरकार का जोर रहा है। सरकार यह दलील देती रही है कि हर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान योजना यानी आधार के क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी। साथ ही, इससे सरकारी योजनाओं को भी बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा। लेकिन आधार से जुड़ी सूचनाओं और आंकड़ों में सेंध की घटनाओं और क्रियान्वयन की मुश्किलों को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। जैसे यह कि आम जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा किए बगैर हर योजना को विशिष्ट पहचान से जोड़ने का मुश्किल लक्ष्य आखिर कैसे हासिल हो सकेगा। पहचान संबंधी जानकारियों की सुरक्षा और लोगों की निजता में सेंध की घटनाओं के मद्देनजर यह अक्सर ही पूछा जाता रहा है कि अगर किसी खामी के चलते आधार कार्ड पर दर्ज कोई निजी जानकारी उजागर हो जाए और गलत हाथों में पड़ जाए तो क्या होगा।

इस योजना के आलोचकों को इधर एक और बड़ी वजह आधार के विरोध को लेकर मिल गई है। ऐसी रिपोर्टें भी आई, जिनसे भूख से होने वाली मौतों का एक संबंध आधार की खामियों में दिखाई दे रहा है। ऐसी रिपोर्टों का संज्ञान लेते हुए कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने आधार से नहीं जुड़ने के कारण निरस्त किए गए राशन कार्डों के मामले को एक गंभीर समस्या बताया। इस बारे में सर्वोच्च अदालत ने सिर्फ टिप्पणी ही नहीं की, बल्कि केंद्र सरकार को इस पर नोटिस जारी किया और आरोपों पर सफाई देने को कहा। मामले की एक अहम कड़ी झारखंड की एक दलित महिला कोइली देवी से जुड़ती है, जिसकी ग्यारह साल की बेटी की वर्ष 2017 में मौत हो गई थी। कोइली ने आरोप लगाया था कि उनकी बेटी किसी हारी-बीमारी से नहीं, बल्कि भूख से मरी थी। उसे और परिवार को भोजन इसलिए नहीं मिल पाया था, क्योंकि वह अपने राशन कार्ड को आधार कार्ड से जोड़ने में सफल नहीं हो पाई थीं।

कोइली देवी का आरोप है कि दूसरे कई लोगों के साथ उनका राशन कार्ड भी आधार से नहीं जोड़े जाने के कारण निरस्त कर दिया गया। इसके बाद उन्हें राशन की दुकान से राशन मिलना बंद हो गया। तब कोइली देवी के आरोपों को मनगढंत बताते हुए सरकारी अधिकारियों ने दावा किया था कि उनकी बेटी की मौत की वजह मलेरिया थी, न कि भूख। सरकारी अधिकारियों के इस तर्क के पीछे बड़ा कारण यह है कि आठ साल पहले 2013 में जनता को भोजन का अधिकार मिल चुका है। वर्ष 2013 में पारित हुए देश के राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून में लोगों को भोजन पाने हक मिला है। भोजन की इस संवैधानिक गारंटी के तहत ही स्कूलों में मध्याह्न भोजन और राशन की जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) में खाद्यान्न व अन्य आवश्यक वस्तुएं बेहद सस्ती दरों पर मुहैया कराने की व्यवस्था की गई है।

गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों के लिए पीडीएस एक वरदान है, बशर्ते उन्हें किसी भी वजह से राशन देने से वंचित न किया जाए। खाद्य सुरक्षा को लेकर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि वर्ष 2013 से 2016 के बीच देश में राशन कार्ड समेत कई अन्य सरकारी दस्तावेज आधार से जोड़े नहीं जा पाने के कारण निरस्त कर दिए गए। सरकारी व्यवस्था में यह कायदा था कि जो दस्तावेज इस तय समय-सीमा में आधार से नहीं जोड़े जाएंगे, उन्हें फर्जी मान कर रद्द कर दिया जाएगा। यही वजह है कि कोइली देवी सहित लाखों लोग राशन पाने से वंचित हो गए।

विशिष्ट पहचान से राशन कार्ड को नहीं जोड़ पाने की अकेली वजह देश में खाद्यान्न असुरक्षा को बढ़ाने का बड़ा कारण रही है। किसी व्यक्ति को उसके मौलिक अधिकार से वंचित करने की कानूनी प्रक्रिया कहती है कि इसके लिए सरकारी अधिकारी को उस व्यक्ति को नोटिस देना चाहिए और बताना चाहिए कि किन आधारों पर उनका सरकारी दस्तावेज, खासतौर से राशन कार्ड फर्जी है। लेकिन हैरत है कि देश में शायद ही किसी अधिकारी ने राशन कार्ड को फर्जी बता कर उसे निरस्त करने से पहले इस कानूनी प्रक्रिया का पालन किया होगा।

उल्लेखनीय है कि आधार नामक विशिष्ट जैविक पहचान योजना के संबंध में अदालतें लगातार इसके क्रियान्वयन से जुड़ी विसंगतियों को देखते हुए इसकी अनिवार्यता पर सवाल उठाती रही हैं। साथ ही, यह भी कहा है कि इसकी गैरमौजूदगी में किसी व्यक्ति को सरकारी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। लेकिन सरकार किसी न किसी बहाने इसे हर चीज से जोड़ने पर आमदा रही है। ड्राइविंग लाइसेंस, मोबाइल फोन, रसोई गैस कनेक्शन, पीडीएस, मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं के अलावा तीन दर्जन कार्यक्रमों के लिए आधार कार्ड अनिवार्य किया जा चुका है। सरकार पचासों अन्य कार्यक्रमों को आधार से जोड़ने की बात भी कह चुकी है। यह भी दावा है कि सरकारी स्कूलों में उन्हीं बच्चों को मध्याह्न भोजन दिया जाएगा, जिनके पास आधार कार्ड होंगे। जबकि माना जा रहा है कि देश में बीस करोड़ बच्चों के आधार कार्ड अभी नहीं बन पाए हैं। वर्ष 2019 के आंकड़ों के मुताबिक इनमें से पंद्रह करोड़ बच्चे इसी कारण से मध्याह्न भोजन योजना लाभ से वंचित हैं।

समस्या का एक छोर आधार कार्ड में दर्ज लोगों की निजी जानकारियों में सेंध लगना भी है। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2009 में केंद्र सरकार ने आधार कार्ड बनाने की परियोजना शुरू की थी। अब तक एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों का आधार कार्ड बनाया जा चुका है। इनमें से करोड़ों लोगों की निजी जानकारियां बरास्ता आधार कार्ड लीक हो कर उनका बेजा फायदा उठाने वालों तक पहुंच भी चुकी हैं। विदेशी सेंधमारों ने जब-तब दावा किया है कि भारत सरकार भले ही आधार की जानकारियों को कंक्रीट की मोटी दीवारों के पीछे महफूज होने का दावा करती हो, लेकिन उसका सारा डाटा उनकी पहुंच में है। ऐसे में सरकार से यह पूछने का हक तो बनता ही है कि आखिर वह हर नागरिक की जानकारी जुटा कर ऐसे डाटाबेस में क्यों डाल देना चाहती है जिससे पता चले कि उसने कब और कहां कितने की खरीदारी की, कब रेल, बस या हवाई यात्रा की, उसका मोबाइल किसी एक वक्त में कहां था और असल में, वह उस वक्त कहां था- जब सरकार उसकी जानकारी लेना चाह रही थी। आधार कानून कहता है कि अगर कोई व्यक्ति, संस्था, एजेंसी किसी नागरिक के आधार कार्ड की जानकारी मांगे तो जैविक यानी उंगलियों, अंगूठे और पुतलियों की छाप के सिवा दूसरी जानकारियां पैसा लेकर दे सकती है। लेकिन इस तरह की सेंधों में तो करोड़ों लोगों की जैविक पहचान संबंधी जानकारियां भी यहां से वहां हो गर्इं।

आधार कार्ड से जुड़ी कई और समस्याओं का अंदाजा तब होता है, जब पता चलता है कि साइबर सेंधमार इसी का फायदा उठाकर तकरीबन हर रोज हजारों-लाखों लोगों के बैंक खातों और एटीएम से रकम उड़ा रहे हैं। जिस तरह बैंकों ने खाता खोलने से लेकर बैंकिंग का सारा कामकाज घर बैठे कराने के लिए अपने सर्वरों से उपभोक्ताओं को इंटरनेट के जरिये जोड़ा है और इसके लिए आधार से जोड़ने की अनिवार्यता कर दी है, इससे सुविधा के साथ-साथ कई मुसीबतें भी पैदा हो गई हैं। कोई संदेह नहीं कि सुविधाओं के डिजिटलीकरण का मुख्य आधार बनी विशिष्ट पहचान यानी आधार कार्ड ने लोगों को सहूलियत की बजाय मुसीबतें ज्यादा दी हैं। ऐसे में सरकार अगर दावा करती है कि वह आधार के जरिए लोगों की जिंदगी आसान करना चाहती है, तो उसे कई मोर्चों पर इससे जुड़ी मुश्किलों के समाधान खोजने होंगे।

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