आभासी मुद्रा का छद्म तंत्र

किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि बिटक्वाइन के भाव लगातार ऊपर जाने के ठोस कारण क्या हैं, सिवाय इसके कि इसके भाव अतीत में बहुत कम समयावधि में इतने ऊपर चले गए। सरकार को इस संबंध में तेजी से काम करना चाहिए। क्रिप्टोकरेंसी सिर्फ निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि सरकारों के लिए भी खतरा है।

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मुकेश अंबानी ने क्रिप्टोकरेंसी बिल का समर्थन किया।

आलोक पुराणिक

क्रिप्टोकरेंसी पर चर्चा तेज हो गई है। इस पर प्रतिबंध लगने की बात हो रही है। सरकार जल्दी ही इस संबंध में कानून ला सकती है। क्रिप्टोकरेंसी दरअसल क्या है, इस सवाल का जवाब अभी तक रिजर्व बैंक और भारत सरकार के पास नहीं है, पर निवेशकों ने इसमें बहुत रकम लगा दी है। भारत में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सरकारें उन मसलों पर हरकत में बहुत देर में आती हैं, जिन पर उन्हें पहले चेत जाना चाहिए। अब यह बहस शुरू हुई है कि क्रिप्टोकरेंसी के प्रति नीतिगत रुख क्या हो।

खबरों के मुताबिक सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड आफ इंडिया यानी सेबी के नियंत्रण के दायरे में क्रिप्टोकरेंसी का निवेश लाया जा सकता है। पर यह इतना आसान नहीं है। क्रिप्टोकरेंसी है क्या, यह समझना और उसे नियंत्रित किया जाना आसान भले न हो, पर इसके खतरों का सामना देर-सबेर हर बड़ी अर्थव्यवस्था को करना होगा। इस पर बिना वैश्विक समन्वय के कारगर नियंत्रण लगा पाना मुश्किल होगा।

क्रिप्टोकरेंसी दुनिया में ऐसी कथित करेंसी है, जिसका भुगतान आतंक से लेकर किसी और चीज के लिए किया जा सकता है। पर इसकी जिम्मेदारी किसकी है, करेंसी का अंतिम भुगतान कौन सुनिश्चित करेगा, यह अभी साफ नहीं है। आतंकी गतिविधियों के लिए क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल संभव है। यानी कुल मिला कर क्रिप्टोकरेंसी से सिर्फ निवेशकों को नहीं, सरकारों को भी खतरा है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्रिप्टोकरेंसी को करेंसी माना ही नहीं जा सकता, यद्यपि इसकी बिक्री करेंसी के तौर पर ही की जा रही है। किसी प्रपत्र या वस्तु को करेंसी की मान्यता तभी दी जा सकती है, जब यह स्पष्ट हो कि इसका जारीकर्ता कौन है। अमेरिकी डालर करेंसी की जिम्मेदारी अमेरिका की है। भारतीय करेंसी की जिम्मेदारी रिजर्व बैंक के गवर्नर लेते हैं। यानी करेंसी तभी आधिकारिक करेंसी है, जब कोई उसकी जिम्मेदारी ले रहा हो। क्रिप्टोकरेंसी के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है।

निवेश का इतिहास अभूतपूर्व बेवकूफियों से भरा हुआ है और इसे इंसानी लालच का कमाल कहें कि हर बार कोई माध्यम बन ही जाता है इंसानी लालच का। क्रिप्टोकरेंसियां हैं क्या, यह सवाल बहुत महत्त्वपूर्ण है। अक्सर इन्हें एक करेंसी के तौर पर चिह्नित किया जाता है। पर, यह करेंसी नहीं है। करेंसी का कोई जारीकर्ता होता है, करेंसी के पीछे कोई गारंटी होती है।

भारतीय रुपयों के ऊपर लिखा होता है कि मैं धारक को इतने रुपए देने का वचन देता हूं। ऐसी कोई गारंटी बिटक्वाइन या किसी और क्रिप्टोकरेंसी के साथ नहीं जुड़ी हुई है। फिर, क्रिप्टोकरेंसी क्या कोई संपत्ति है, जैसे शेयर या मकान या बैंक डिपाजिट या सोना। इस सवाल की भी पड़ताल होनी चाहिए।

शेयर किसी कंपनी में हिस्सेदारी होती है, किसी कंपनी में मिल्कियत का एक हिस्सा है। जैसे-जैसे उस कंपनी का कारोबार बढ़ता है, उसका मुनाफा बढ़ता है, वैसे-वैसे उस कंपनी की कीमत बढ़ती जाती है। साथ में उसकी हिस्सेदारी की चाह रखने वालों की संख्या बढ़ती है, यानी मांग बढ़ती है। इसलिए अच्छी कंपनियों के शेयर लगातार ऊपर जाते हैं। पर बिटक्वाइन किसी कंपनी में कोई भागीदारी नहीं देता। मकान जैसी कोई भौतिक संपत्ति भी यह नहीं है। बैंक डिपाजिट यह है नहीं, कोई बैंक इसकी जिम्मेदारी नहीं लेता। सोना यह है नहीं। तो यह है क्या?

यह दरअसल, तकनीक द्वारा उपजा एक ऐसा उत्पाद है, जिसे लेकर तरह-तरह की गलतफहमियां हो गई हैं। सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि इसके भाव लगातार ऊपर जाएंगे। कीमत चाहे आलू की हो, शेयर, बिटक्वाइन या किसी और की, मूल अर्थशास्त्र एक ही होता है- मांग ज्यादा होती है, आपूर्ति कम होती है। पर यहां कारोबार दिखाई पड़ रहा है, मुनाफा बढ़ता दिखाई पड़ रहा है। एक और कारण होता है दुर्लभता। सोना कुछ नहीं करता, कोई धंधा नहीं करता, सिर्फ ताले में बंद करके रखा जाता है।

पर सोना दुर्लभ है, आपूर्ति सुलभ नहीं है। मकान के भावों के बढ़ने के मूल में भी वही कारण है, आपूर्ति सीमित है। पर बिटक्वाइन या किसी भी क्रिप्टोकरेंसी की आपूर्ति को लेकर आधिकारिक तौर पर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। बिटक्वाइन या किसी भी क्रिप्टोकरेंसी का कोई ऐसा प्रयोग नहीं है, जैसे सोने का है। उसे पहन कर सामाजिक हैसियत बढ़ाई जा सकती है। मकान का है, जिसमें रहा जा सकता है या शेयर का है, जिसे खरीद कर भविष्य में लाभांश हासिल किया जा सकता है, कीमत बढ़ोत्तरी हासिल की जा सकती है।

फिर क्रिप्टोकरेंसी में मूल्यवत्ता कहां से आ रही है। इसका जवाब है, अज्ञान मिश्रित लालच से। एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब डेढ़ करोड़ लोगों ने क्रिप्टोकरेंसी में रकम लगा रखी है। ये डेढ़ करोड़ लोग भले भारत की जनसंख्या का एक प्रतिशत भी न हों, पर यह संख्या न्यूजीलैंड की कुल आबादी की तीन गुना है। सरकार बहुत देर से जागी है इस मसले पर। अब इसे लेकर कानून बनाने की बात हो रही है, यह सब पहले ही होना चाहिए था।

इंसानी मनोवृत्तियों में एक बहुत बुनियादी होता है- लालच। लालच विवेक की कब्र पर ही उगता है। लालच के ऐसे नमूने पहली बार नहीं दिखाई पड़े हैं वित्तीय बाजारों में। सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में ट्यूलिप के फूलों को लेकर ऐसा लालच नीदरलैंड्स में देखा गया था। लोगों में यह भरोसा बैठ गया कि ट्यूलिप के फूलों के भाव सिर्फ ऊपर जाएंगे। लोगों ने घर गिरवी रख कर ट्यूलिप खरीदे। जैसा कि होना था, एक दिन भाव जमीन पर आ गए और बहुत सारे लोग डूब गए।

वित्तीय जगत में बहुत सारे कारोबार मूर्खों की उपलब्धता पर चलते हैं। किसी ने बिटक्वाइन लिया पांच सौ डालर का, उसे एक हजार डालर में खरीदने वाला एक और बड़ा मूर्ख मिल गया। मंगल ग्रह के प्लाट भी खरीदे-बेचे जा सकते हैं। यह सब चलता रहता है। एक दिन पता लगता है कि कोई खरीदार नहीं है, और सब धड़ाम हो जाता है।

1992 में हर्षद मेहता के घोटाली दिनों में कई शेयर रातों-रात दोगुने हो रहे थे। मूर्खों को और बड़े मूर्ख मिल रहे थे, बतौर खरीदार। एक दिन सब धड़ाम हो गया। थोड़ा-सा विवेक किसी भी चीज के भाव बढ़ने को लेकर होना चाहिए। उसकी दुर्लभता, उसकी आपूर्ति, उसकी मांग को लेकर स्पष्टता होनी चाहिए। वरना तो कई बाबा दो मिनट में गहने दोगुने करने के वादे पर माल लेकर चंपत हो जाते हैं। रिजर्व बैंक ने कई बार चेतावनी दी है, जिसका आशय है कि बिटक्वाइन या किसी किप्टोकरेंसी को लेकर स्पष्टता नहीं है।

बिटक्वाइन समेत किसी भी क्रिप्टोकरेंसी का कारोबार अभी किसी भारतीय प्राधिकरण के दायरे में नहीं है, जहां शिकायत दर्ज की जा सके। इंटरनेट ने कई तरह की लूटों के वैश्विक कर दिया है, क्योंकि लालच एक वैश्विक इंसानी वृत्ति है। जो भी निवेशक एक साल में बारह प्रतिशत से ज्यादा का रिटर्न देने की बात करे, उसे गहराई से शक की निगाह से देखा जाना चाहिए। पर लालच शक को खत्म कर देता है। बिटक्वाइन के मामले में यही हो रहा है।

किसी के पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि बिटक्वाइन के भाव लगातार ऊपर जाने के ठोस कारण क्या हैं, सिवाय इसके कि इसके भाव अतीत में बहुत कम समयावधि में इतने ऊपर चले गए। सरकार को इस संबंध में तेजी से काम करना चाहिए। क्रिप्टोकरेंसी सिर्फ निवेशकों के लिए नहीं, बल्कि सरकारों के लिए भी खतरा है।

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