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बंजर होती जमीन के खतरे

खेती योग्य जमीन को बंजर भूमि बनाने में मानवीय कारक भी कम नहीं रहे। बढ़ती आबादी के लिए आवास उपलब्ध कराने और अवैध खनन के चलते हर साल हजारों हेक्टेयर भूमि बंजर हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक हर साल करीब एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर जमीन मानव निर्मित कारणों से रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है।

Barren Land, Farmers trouble
इसरो की भू-क्षरण रपट बताती है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब तीस फीसद हिस्सा भू-क्षरण की चपेट में है।

कुंदन कुमार

दुनियाभर में भू-क्षरण और मरुस्थलीकरण बड़ी पर्यावरणीय चुनौतियों के तौर पर उभर कर आए हैं। सामान्यत: मरुस्थलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें शुष्क भूमि अपनी उत्पादकता खोती जाती है और मिट्टी बंजर हो जाती है। मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया में जमीन की पौधों को सहारा देने की शक्ति क्षीण हो जाती है और इसका सीधा प्रभाव मिट्टी के अन्न उपजाने की क्षमता पर पड़ता है।

इससे लोगों की आजीविका तो प्रभावित होती ही है, साथ ही साथ खाद्य पदार्थों का गहराता संकट लोगों को भुखमरी के कगार पर लाकर खड़ा कर देता है। यह चिंताजनक इसलिए भी है कि मरुस्थलीकरण जल प्रबंधन प्रणाली और कार्बन के भंडारण पर भी विपरीत प्रभाव डालता है। हालांकि यह बात दीगर है कि मरुस्थलीकरण की प्रक्रिया लंबे समय में घटित होती है, परंतु चिंताजनक बात यह है कि इसकी रफ्तार लगातार बढ़ती जा रही है, जो पर्यावरणविदों को परेशान कर रही है।

इसरो द्वारा हाल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार मरुस्थलीकरण के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार जल क्षरण है। करीब 10.98 फीसद क्षेत्र में मरुस्थलीकरण जल क्षरण की वजह से होता है। इसके बाद वनस्पति क्षरण का नंबर आता है। वनस्पति क्षरण के कारण 9.91 फीसद क्षेत्र रेगिस्तान में तब्दील हो चुका है। इसके अलावा वायु क्षरण, लवणता में कमी, मानव निर्मित बसावट क्षेत्र में और अन्य कारणों जैसे जल भराव, अत्यधिक पाला पड़ना, बंजर और चट्टानी भूमि आदि वजहें भी बढ़ते रेगिस्तान के लिए जिम्मेदार तत्व हैं।

खेती योग्य जमीन को बंजर भूमि बनाने में मानवीय कारक भी कम नहीं रहे। बढ़ती आबादी के लिए आवास उपलब्ध कराने और अवैध खनन के चलते हर साल हजारों हेक्टेयर भूमि बंजर हो रही है। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक हर साल करीब एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर जमीन मानव निर्मित कारणों से रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है। दुनिया की कुल कृषि योग्य भूमि का लगभग एक चौथाई हिस्सा अत्यधिक बंजर हो चुका है। शुष्क भूमि में वर्षा बहुत कम और अनियमित होती है।

खासकर विकासशील देशों में ऐसे स्थान मरुस्थलीकरण के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। एशिया और अफ्रीका की लगभग चालीस फीसद आबादी ऐसे क्षेत्रों में रह रही है जहां जमीन रेगिस्तान में बदलती जा रही है। दुनिया की लगभग साठ फीसद आबादी एशिया में है। इसमें से भी सत्तर फीसद लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भूमि और उससे जुड़ी पारिस्थितिकी तंत्र की व्यवस्थाओं पर निर्भर हैं। इसलिए प्रभावित लोगों के हिसाब से देखा जाए तो एशिया महाद्वीप भू-क्षरण, मरुस्थलीकरण और सूखे से सबसे ज्यादा त्रस्त है।

एशिया महाद्वीप में उत्तर-पूर्वी गोलार्द्ध में स्थित भारत क्षेत्रफल के हिसाब से दुनिया का सातवां सबसे बड़ा देश है। जनसंख्या के हिसाब से भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। लिहाजा भारत के लिए स्थितियां विशेष रूप से अधिक चिंताजनक हैं क्योंकि यहां दुनिया की कुल आबादी की 17.6 फीसद आबादी रहती है। दुनिया के कुल भू-भाग के महज 2.4 फीसद वाले इस देश पर करोड़ों कुपोषित लोगों के साथ ही वैश्विक भुखमरी के एक चौथाई हिस्से का बोझ भी है।

इसरो की भू-क्षरण रपट बताती है कि देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का करीब तीस फीसद हिस्सा भू-क्षरण की चपेट में है। भू-क्षरण देश की कुल भूमि के सत्तर फीसद हिस्से में फैले शुष्क भूमि वाले क्षेत्र में से करीब नौ करोड़ हेक्टेयर जमीन पर अपना जाल बिछा चुका है। यह भारत के कुल भू-भाग का करीब एक चौथाई हिस्सा है।

अमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र के सर्वेक्षण के अनुसार साल 2003-2005 और 2011-2013 के बीच महज आठ वर्षों में ही भू-क्षरण की प्रक्रिया में पंद्रह लाख हेक्टेयर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। तुलनात्मक तौर पर यूरोपीय संघ की तरफ से तैयार किए गए विश्व मरुस्थल मानचित्र के आंकड़ों से पता चलता है कि दुनिया भर में पिछली सदी में पचास के दशक के बाद से शुष्क भूमि में लगभग 0.35 फीसद बढ़ोतरी हुई है।
हाल में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान के सहयोग से भारत में भू-क्षरण से हो रहे नुकसान का आकलन करवाया था।

इस अध्ययन के बाद सामने आया कि भू-क्षरण की वजह से देश को 48.8 अरब डालर सालाना की चपत लग रही है। यह 2014-2015 में भारत की जीडीपी के लगभग 2.08 फीसद के बराबर था, जबकि उसी वर्ष कृषि और वानिकी क्षेत्रों के सकल घरेलू मूल्य से यह तेरह फीसद से भी अधिक है।

वास्तव में तेज होती मरुस्थलीकरण की समस्या पूरी दुनिया के लिए विकराल समस्या बन गई है। प्राचीन काल में सिंधु घाटी जैसी विकसित सभ्यता के विनाश का कारण भी सूखे तथा मरुस्थलीकरण को ही माना जाता है। मरुस्थलीकरण का प्रभाव समस्त प्राणिजगत, पर्यावरण, जलवायु और मृदा पर पड़ता है। यह एक ऐसी बहुआयामी समस्या है जिसके जैविक, भौगोलिक, सामाजिक और आर्थिक पक्ष हैं। इसलिए उससे निपटने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें अपने स्तर पर कुछ प्रयासों का दावा करती दिखती हैं।

सन 1985 में राष्ट्रीय भूमि उपयोग एवं परती विकास परिषद को उच्चतम नीति निर्धारक एवं समायोजन एजंसी के रूप में गठित किया गया था। यह परिषद देश भर की जमीनों के प्रबंधन पर विचार करती है। पिछले कई सालों से शोध संस्थाएं और कृषि विश्वविद्यालय मरुस्थलीकरण और सूखे के प्रभावों के गहन अध्ययन में लगे हुए हैं। इन अनुसंधानों की प्राथमिकता मरुस्थलीकरण को रोकने और सूखा-पीड़ित इलाकों की उत्पादकता बढ़ाने की कार्यविधियां विकसित करना है।

वैश्विक स्तर पर मरुस्थलीकरण जैसी समस्या से निपटने के लिए 1992 में रियो सम्मेलन में कुछ लक्ष्य भी तय किए गए थे, जिन्हें 1994 में स्वीकार किया गया और दिसंबर 1996 से वास्तविक रूप में अस्तित्व में लाया गया। भारत सहित एक सौ चौरानवे देश तथा यूरोपीयन संघ इसके हस्ताक्षरकर्ता देशों में शामिल हैं। यह कानूनी बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय समझौता है जो मरुस्थलीकरण और सूखे की समस्या से निपटने की दिशा में काम कर रहा है।

भारत ने मरुस्थलीकरण की समस्या से निबटने के लिए एक राष्ट्रीय कार्ययोजना बनाई थी, जिसमें सूखा प्रबंधन की तैयारी, जनजागरूकता, स्थानीय समुदाय के जीवन स्तर में सुधार, विकास के लिए समुदाय आधारित रणनीतियों को प्रमुखता के साथ चिह्नित किया गया था।

मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र के बनाए दस वर्षीय कार्यक्रम को ध्यान में रखते हुए भारत ने भी इस दिशा में काम तेज किया है।
गौरतलब है कि ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में सरकार ने कृषि पैदावार बढ़ाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन सरकार ने इस हकीकत को स्वीकार किया है कि इस लक्ष्य को तब तक हासिल नहीं किया जा सकता जब तक कि भूमि संसाधनों के क्षरण को रोका न जाए। इसलिए टिकाऊ भूमि प्रबंधन कार्यक्रम (स्लेम) शुरू किया गया था।

इस कार्यक्रम का उद्देश्य सतत भूमि प्रबंधन को बढ़ावा देना, जैव विविधता का संरक्षण और पारिस्थितिकीय प्रणालियों को बनाए रखना है। मरुस्थलीकरण और भूमि संसाधनों के अवनयन की समस्याओं के समाधान के लिए 2007 में मेड्रिड में हुए जलवायु सम्मेलन में सभी पक्षकार देशों ने मिल कर मरुस्थलीकरण की समस्या से निपटने के लिए दस वर्षीय रणनीति को स्वीकृति प्रदान की थी।

हालांकि मरुस्थलीकरण को नियंत्रित करने के काम में आम नागरिकों की भूमिका भी कम नहीं है। हम बेहतर भूमि उपयोग नियोजन एवं प्रबंधन, जनसंख्या नियंत्रण और अवैध खनन को नियंत्रित करके तथा वृक्षारोपण जैसे उपायों को अपना कर फैलते रेगिस्तान को नियंत्रित कर सकते हैं।

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