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बचाना होगा छोटी नदियों को

नदी संरक्षण के हमारे प्रयास बड़ी और बारहमासी नदियों पर ही केंद्रित रहे हैं। जबकि छोटी नदियां प्रदूषण और उपेक्षा की शिकार हैं। इन्हें किसी बड़ी संरक्षण योजना में शामिल नहीं किया गया है। अन्य चर्चित मुद्दों के आगे छोटी नदियों के सवाल प्रमुखता से सामने नहीं आ पाते हैं।

देश में जल संरक्षण की दिशा में छोटी नदियां काफी मददगार होती हैं। ((Twitter/@sarbanandsonwal))

वेंकटेश दत्ता
हमें अपने गांवों और कस्बों की ताल-तलैया और छोटी नदियों की याद होगी, जो कभी स्वच्छ जल का बड़ा स्रोत हुआ करती थीं। लेकिन धीरे-धीरे अब ये सरकारी छोटी नदियां और तालाब राजस्व दस्तावेजों से गायब हो रहे हैं। जो तालाब, पोखर बचे भी हैं तो उनकी स्थिति दयनीय ही है। सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ जिससे जल संरक्षण के ये स्रोत खत्म होते चले गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि अनियोजित विकास का नदियों के जीवन पर गंभीर असर पड़ा है। इसे दुखद ही कहा जाएगा कि कई नदियां तो अब सीवेज बहाने वाली नहरों में तब्दील बन गई हैं।

जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, पीने के पानी और सिंचाई जल का संकट भी गहराता जा रहा है। सैकड़ों छोटी नदियां मिल कर एक इकाई बनाती हैं। छोटी नदियां और उनके साथ जुड़ी झीलें, गीली जमीन और तालाबों की शृंखला नदियों को जीवंत रखती है। नदियों का आपस में जुड़ा यह पारिस्थितिकी तंत्र उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना नदियों का निरंतर बहना। छोटी नदियां मानसूनी वर्षा और भूजल पर निर्भर होती हैं। यदि लंबे अंतराल तक सूखा रहता है या भूजल स्तर में तेजी से गिरावट आती है, तो सबसे पहले छोटी नदियां सूख जाती हैं। खतरा यह है कि गंगा बेसिन में विलुप्त होती छोटी नदियां और उपेक्षित हजारों तालाब बड़े खतरे का संकेत दे रहे हैं। भविष्य की खाद्य सुरक्षा पर भी इसका गहरा असर पड़ेगा।

पिछले तीन दशकों में बारहमासी नदियां अब खंडित और रुक-रुक कर बहने वाली मौसमी नदियां बन रही हैं। भारत की मैदानी नदियां जैसे- गोमती, रामगंगा, चंबल, केन, बेतवा के प्रवाह का एकमात्र आधारभूत स्रोत भूजल और वर्षा जल है।

गंगा को हम तब तक अविरल और निर्मल नहीं बना पाएंगे, जब तक इसकी सभी सहायक नदियों के संरक्षण के लिए कोई बड़ी मुहिम नहीं चलाई जाती। इस मुहिम की जरूरत आज इसलिए भी ज्यादा है, क्योंकि कई छोटी नदियां, तालाब, पोखर और प्राकृतिक जल के स्रोत लगभग खत्म होते जा रहे हैं। गंगा नदी को अविरल और निर्मल बनाने के लिए पर्याप्त प्रवाह और जल गुणवत्ता के साथ निरंतरता आवश्यक है। इसमें सहायक नदियों का भी सदानीरा होना जरूरी है। गीली जमीन वाले सिकुड़ते क्षेत्र, तालाब और झीलें अब नदियों से नहीं मिलते हैं। नदी संरक्षण के हमारे प्रयास बड़ी और बारहमासी नदियों पर ही केंद्रित रहे हैं। जबकि छोटी नदियां प्रदूषण और उपेक्षा की शिकार हैं। इन्हें किसी बड़ी संरक्षण योजना में शामिल नहीं किया गया है। अन्य चर्चित मुद्दों के आगे छोटी नदियों के सवाल प्रमुखता से सामने नहीं आ पाते हैं।

जलवायु परिवर्तन, भूमि-उपयोग परिवर्तन और अत्यधिक जल अपव्यय के कारण बारहमासी नदियां अब मौसमी नदियां बनती जा रही हैं, विशेष रूप से वे छोटी नदियां जो भूजल और झरनों पर निर्भर होती थीं। दरअसल नदियों में जल की निरंतरता भूजल से ही रहती है। जहां भूजल का स्तर बेहतर है, वहां नदियां भी बहती रहती हैं। तालाब और भूजल का सीधा रिश्ता है। जहां खूब सारे जलाशय, पोखर या तालाब होते हैं, वहां भूजल स्तर भी ठीक रहता है। प्राकृतिक नालों और तालाबों से भूमिगत जल स्रोतों में पानी जाता रहता है और यही पानी हमारी नदियों में प्रवाह बनाता है।

सत्तर के दशक में पंपों से सिंचाई क्रांति की शुरुआत हुई थी। इसी के साथ भू-जल के दोहन का सिलसिला शुरू हुआ। इसकी वजह से मध्य और निचले गंगा बेसिन में जल प्रवाह लगभग साठ फीसद कम हो गया। यह अच्छा संकेत नहीं है, क्योंकि बारहमासी नदियों का आधारभूत प्रवाह भूजल प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भर करता है। भूजल हमारी पचासी फीसद कृषि, घरेलू और औद्योगिक जरूरतों को पूरा करता है। देश के आधे से अधिक भू-भागों में जलस्तर तेजी से नीचे गिरता जा रहा है। गंगा की कई सहायक नदियां हैं जिनमें पिछले पचास वर्षों में प्रवाह में तीस से साठ फीसद की गिरावट आई है।

इसके प्रमुख कारणों में से एक भूजल स्तर में गिरावट और प्रवाह में कमी आना है। यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि सभी नदियों के आधार-प्रवाह को बनाए रखने में भूजल का बड़ा योगदान है। भूजल की लगातार कमी निश्चित रूप से गंगा में पानी की मात्रा और प्रवाह कम करने में योगदान दे रही है। गंगा से सटे इलाकों में भूजल भंडार में भी लगभग तीस से चालीस सेंटीमीटर तक की कमी आई है। नदी के प्रवाह पर भूजल स्तर में गिरावट का प्रभाव गंगा की कई अन्य सहायक नदियों पर देखा जा सकता है, जिन्हें बर्फ के पिघलने से कोई पानी नहीं मिल रहा है।

कई छोटी-बड़ी सहायक नदियों का पानी गंगा नदी में मिल कर इसके प्रवाह को बढ़ाता है। स्वस्थ जलीय निवास को बनाए रखने के लिए प्रवाह आवश्यक है। साठ के दशक के उत्तरार्ध में दिल्ली में यमुना नदी में बड़ी संख्या में कछुए होते थे और उन्हें आसानी से तटों पर देखा जा सकता था। अब नदी जैविक रूप से मृत है। कछुए गायब हो गए हैं। जहरीले अपशिष्टों में मछलियों का जीवित रहना मुश्किल है। उत्तर प्रदेश में बहने वाली गोमती नदी अपने ऊपरी और मध्य हिस्सों में रुक-रुक कर बहने वाली धारा हो गई है। कभी यह एक बारहमासी नदी हुआ करती थी। अब गर्मियों के महीनों में कई हिस्सों में सूख जाती है। पहली बार नदी के उदगम स्थल से करीब सौ किलोमीटर तक का हिस्सा छोटे-छोटे खंडों में सूख गया है। यहां तक कि इसमें मिलने वाली सत्ताईस सहायक नदियों में से चौबीस नदियां सूख चुकी हैं।

मछलियां प्रदूषण के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं। जब नदियां सूख जाती हैं या अलग-अलग तालों में विखंडित हो जाती हैं, तो मछलियों, कछुओं जैसे जलीय जीवों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाता है। नदियों के सूख जाने पर मछलियां, मेंढक, पक्षी और कछुए सबसे ज्यादा संघर्ष करते हैं। हम बिजली के पंप से जमीन के अंदर का जल निकाल सकते हैं और अपनी प्यास बुझा सकते हैं। लेकिन ये जीव अपने अस्तित्व के लिए कहां जाएंगे, इस बारे में कोई नहीं सोचता।

आज मछलियों की कई प्रजातियां खतरे में हैं, खासकर उन नदियों में जहां सिंचाई और जलापूर्ति के लिए अत्यधिक जल निकाला जा रहा है और साथ ही शहरों का गंदा उस जल मिला दिया जाता है। कभी हमारी बारहमासी नदियां विविध देशी प्रजातियों की मछलियों को आश्रय देती थीं, उनमें से कई का तो आर्थिक महत्त्व भी था। लेकिन पानी के दोहन और प्रदूषण के कारण उनकी आबादी को भारी नुकसान पहुंचा। दुनिया भर के अध्ययनों ने साबित किया है कि प्राकृतिक और अविरल बहने वाली धाराओं में मछलियों और अन्य जलीय जीवों की विविधता अक्षुण्ण बनी रहती है। बारहमासी नदियों में जलीय जंतु समुदाय अधिक स्थिर होते हैं, जबकि खंडित और संशोधित धाराएं अपने जलीय जानवरों को खोना शुरू कर देती हैं।

नदी से पानी लेने के विज्ञान को हम बखूबी जानते हैं, लेकिन नदी में वापस पानी लाने का ज्ञान अधूरा है। नदी के पूरे जल ग्रहण प्रबंधन का ज्ञान महत्त्वपूर्ण है। क्षेत्र के जल ग्रहण प्रबंधन की समझ इसके ऐतिहासिक मानचित्रों के साथ होनी चाहिए। छोटी नदियों, तालाबों और झीलों को राजस्व दस्तावेजों में दुरुस्त करना होगा, ताकि इस पर कोई अतिक्रमण न हो। जलस्रोतों के पुनरोद्धार के लिए हमें पुराने तालाबों को नया जीवन देना होगा। छोटी-बड़ी नदियों की जमीन को वापस लौटाना होगा। प्राकृतिक जल स्रोतों पर हुए कब्जे और अतिक्रमण हटाने के लिए नीतिगत ढांचों को और मजबूत करना होगा। एक नदी में न्यूनतम पारिस्थितिकी प्रवाह होना चाहिए। इतना जल रहे की जमीन में भी पानी पहुंचता रहे और जलीय जीवों का संसार भी बचा रहे।

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