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विज्ञान बनाम अंधविश्वास

आज भी चेचक को छोटी माता के रूप में संबोधित किया जाता है, उसे देवी माता के प्रकोप का परिणाम माना जाता है। किसी महामारी या प्राकृतिक आपदा के आने पर मंत्रों का जाप करना, शंख बजाना, घंटियां और तालियां बजाना कितना तार्किक है? अगर ऐसा करने से बीमारियों को ठीक किया जा सकता है तो चिकित्सकीय ज्ञान की जरूरत ही नहीं रह जाती!

Science and superstitionनए परिवर्तनशील सितारे, जिनकी चमक एक “महत्वपूर्ण उपलब्धि” के रूप में बदलती रहती है। (फोटो: एजेंसी)

ज्योति सिडाना

धर्म और विज्ञान एक दूसरे की विरोधी अवधारणाएं हैं। विज्ञान जहां तर्क पर आधारित ज्ञान को प्रोत्साहित करता है, वहीं धर्म अनुकरण और तर्कहीनता पर बल देता है। देखा जाए तो सभी धार्मिक ग्रंथ अथवा पुस्तकें संविधान के मूल्यों की विरोधी है। एक भी धार्मिक ग्रंथ ऐसा नहीं है जो संविधान के पक्ष में खड़ा नजर आता हो, क्योंकि दोनों की प्रकृति बिलकुल भिन्न है। संविधान वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है, जबकि कोई भी धर्म समानता या लैंगिक समानता की बात नहीं करता। ऐसे में अंध आस्था का शिकार होना स्वाभाविक है, क्योंकि अभी तक हम वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनी चेतना का भाग ही नहीं बना पाए हैं। संविधान के अनुच्छेद 51(क) में स्पष्ट उल्लेख है कि यह सभी नागरिकों की बुनियादी जिम्मेदारी है कि ह्यवह वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करेह्ण। लेकिन इसके बावजूद अंध आस्था का बाजार तेजी से विस्तार लेता जा रहा है।

अनेक टीवी चैनल भी चमत्कार, असंभव घटनाओं, इच्छाधारी नाग-नागिनों और भूत-प्रेतों का अस्तित्व दिखा कर और ज्योतिषियों की अवैज्ञानिक व्याख्याएं प्रसारित करके अंधविश्वास फैलाने में योगदान देते रहे हैं। उन्हें यह जरूर समझना चाहिए कि यह सब करके वे लोगों की सोच को आगे बढ़ाने के बजाय सदियों पीछे ले जा रहे हैं। टीवी पर दिखाए जाने वाले विभिन्न धारावाहिकों और कार्यक्रमों में नागिन, आत्मा, डायन, जादू-टोना जैसे अंधविश्वास और रूढ़ियों को पुन: उजागर करके वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर प्रहार करने का प्रयास एक सामान्य बात हो गई है। इससे लोगों में “भय का मनोविज्ञान” पैदा होता है और वे आसानी से अंध आस्था के बाजार का हिस्सा जाते हैं। या कहें कि मीडिया ने इसे न केवल एक उद्योग के रूप में स्थापित कर दिया है, अपितु लाभ कमाने की एक संस्था के रूप में स्थापित किया है।

हाल में आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले में एक शिक्षक और उनकी पत्नी ने कथित रूप से अंधविश्वास का शिकार होकर अपनी दो जवान बेटियों की हत्या कर दी। बेटियों की हत्या करने वाले उच्च शिक्षित माता-पिता का यह मानना था कि कलयुग समाप्त होकर सतयुग आने वाला है और दैवीय शक्ति से वे कुछ घंटों में फिर से जिंदा हो जाएंगी। साथ ही, बच्चियों की मां खुद के भगवान शिव होने का दावा भी कर रही थी। इसी तरह कुछ वर्षों पहले दिल्ली में भी एक ही परिवार के ग्यारह लोगों द्वारा की गई आत्महत्या को ऐसे ही अंधविश्वास के परिप्रेक्ष्य में देखा गया था।

ऐसी हदृय विदारक घटनाएं न केवल चिंताजनक हैं, अपितु संवैधानिक मूल्यों के विपरीत भी है। विज्ञान एवं तकनीक के इस युग में ऐसी घटनाओं का विस्तार होना समाज पर गंभीर सवाल खड़े करता है। वैज्ञानिक चेतना और ज्ञान के युग में अनुकरण का कोई स्थान नहीं होता, अपितु कारण-परिणाम संबंधों के आधार पर घटनाओं का तार्किक विश्लेषण किया जाता है। संभवत: कार्ल मार्क्स इसलिए धर्म को अफीम की संज्ञा देते थे। उनका तर्क था कि धर्म सामाजिक चेतना के विकास में अवरोध उत्पन्न करता है, धर्म आत्माविहीन विश्व की आत्मा है। यह वह अफीम है जिसके माध्यम से शासक वर्ग शोषित वर्ग को उस काल्पनिक विश्व में पहुंचाता है जहां शोषण को सहन करना व उसके विरुद्ध संघर्ष न करना उसकी नियति बन जाती है। इसलिए जब राजसत्ता ही अंध आस्था का शिकार हो तो नागरिक क्यों नहीं होंगे?

सोशल मीडिया पर अब एक नया चलन और शुरू हो गया है। लोग ऐसे धार्मिक संदेश भेजते हैं जिन पर लिखा होता है कि इस संदेश को ग्यारह या इक्कीस लोगों को भेजें, तुरंत अच्छी खबर मिलेगी और ऐसा नहीं करने पर बुरी खबर मिलेगी या नुकसान उठाना होगा। जो लोग बिना सोचे-समझे इस तरह के संदेशों या वीडियो आगे भेज देते हैं उनके मन में यह कहीं न कहीं भय का मनोविज्ञान काम करता है और उन्हें लगता है कि इसे भेज देना चाहिए, ताकि कोई नुकसान न हो जाए।

आज के समय में इस तरह की घटनाओं और सोच में वृद्धि होना अनेक सवालों को जन्म देता है, जैसे- क्या आधुनिक शिक्षा मिथ्या चेतना और वास्तविक चेतना में अंतर कर पाने में समर्थ नहीं है? क्या अंधविश्वास शिक्षित और अशिक्षित दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है? क्या विज्ञान और आस्था एक दूसरे के पूरक हैं? क्या आस्था और तर्क एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं? विज्ञान और तकनीकी के विस्तारित युग में अंधविश्वास की घटनाओं में वृद्धि चिंता की बात है। जबकि होना तो यह चाहिए था कि शिक्षा, विशेष रूप से वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विस्तार लोगों में अंधविश्वास की प्रवृत्ति को कमजोर करता, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

चित्तूर की घटना को ही लें, जिसमें बच्चियों के माता-पिता दोनों ही उच्च शिक्षित हैं, और कॉलेज में विज्ञान के शिक्षक हैं। इसके बाद भी उन्होंने ऐसी घटना को कैसे अंजाम दिया, यह हैरानी पैदा करने वाली बात है। फ्रांस के दार्शनिक माइकल फूको ने कहा है कि उत्तर-आधुनिक समाज में ‘ज्ञान शक्ति है’, जिसके पास ज्ञान है, वही शक्तिशाली है। अगर उनका तर्क सही है तो फिर लोग सिद्धि क्यों पाना चाहते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि अंधविश्वास या आस्था स्वयं को कमजोर समझने वाले लोगों को मजबूती देती है? शायद जो लोग स्वयं पर कम विश्वास करते हैं, वही लोग अंध आस्था रखते हैं? यह भी माना जाता है कि असफलता मनुष्य को अंधविश्वास की ओर धकेलती है, यानी जब मनुष्य को वांछित परिणाम नहीं मिलते तो वह इस तरह की गतिविधियों का सहारा लेता है।

बीसवीं सदी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग ने कहा था- मैंने देखा है वे लोग भी जो ये कहते हैं कि सब कुछ पहले से ही तय है, और हम उसे बदलने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते, वे भी सड़क पार करने से पहले दाएं-बाएं देखते हैं। ऐसे लोग विज्ञान और आस्था के बीच द्वंद्वात्मकता का शिकार होते हैं। कहते हैं कि जहां अंधविश्वास होता है, वहां विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। इसीलिए तो कहीं हमारे देश की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा विकास के मार्ग पर चलने से वंचित रह गया?

आज भी चेचक को छोटी माता के रूप में संबोधित किया जाता है, उसे देवी माता के प्रकोप का परिणाम माना जाता है। किसी महामारी के आने पर या प्राकृतिक आपदा के आने पर मंत्रों का जाप करना, शंख बजाना, घंटियां और तालियां बजाना कितना तार्किक है? अगर ऐसा करने से बीमारियों को ठीक किया जा सकता तो चिकित्सकीय ज्ञान की जरूरत ही नहीं रह जाती! आस्था रखना बुरा नहीं है, पर अंध आस्था का पक्ष लेना गैर-तार्किक और अवैज्ञानिक है। जिस आस्था की बुनियाद किसी की हत्या पर टिकी हो या खुद के लाभ के लिए दूसरों का नुकसान करने से भी नहीं चूकती, वह आस्था मनुष्य और समाज को विनाश की ओर ही ले जाती है।

धर्म का अंधविश्वास से कोई संबंध नहीं होता, क्योंकि धर्म आस्था व विश्वास पर टिका होता है और अंधविश्वास बेबुनियाद भय और तर्कहीनता पर। अंधविश्वासों की निरंतरता को बनाए रखने के लिए ह्यभय का मनोविज्ञानह्ण गढ़ा जाता है और जब तक इस भय के मनोविज्ञान को ‘वैज्ञानिक दृष्टिकोण’ से विस्थापित नहीं किया जाएगा, तब तक इन घटनाओं की पुनरावृत्ति होने से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए आवश्यकता है कि शिक्षा के माध्यम से इस तरह के अंधविश्वासों पर कुठाराघात किया जाए और संविधान में शामिल वैज्ञानिक सोच को नागरिकों की चेतना और व्यक्तित्व का हिस्सा बनाया जाए।

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