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बचाना होगा वनों को

देश में वन क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी लाने और मौजूद वनों के विकास, संरक्षण व संवर्द्धन की दिशा में कुछ उपायों पर विचार किया जाना महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। इसके लिए देश व प्रदेश की सरकारों को वन क्षेत्र की न्यूनता निर्धारित करने और लक्ष्य प्राप्ति के लिए कारगर योजनाएं बना कर काम करने की आवश्यकता है।

jansatta opinionवन के लगातार दोहन और खत्म होने से जैव पारिस्थितकीय पर बुरा असर पड़ रहा है। (फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

चंद्रशेखर तिवारी
पृथ्वी पर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों में वनों का महत्त्व सबसे अधिक है। प्रकृति के जलवायु नियमन में वनों की भूमिका सर्वोपरि रहती है। वनों से जहां वर्षा होती है, वहीं एक अच्छा वन क्षेत्र भूमिगत जल स्तर बढ़ाने में सहायक होता है। वनों में गिरने वाली सूखी पत्तियां सड़ने के बाद जमीन को उर्वर बनाती हैं। विविध वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों और जीव-जंतुओं को शरण वनों में ही मिलती है। वनों की विविधता व हरियाली प्राकृतिक सौंदर्य में वृद्धि करती है। इससे वन पर्यटन को बढ़ावा मिलता है। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि जहां वन पर्यावरण के मुख्य आधार होते हैं, वहीं ये मानव आजीविका के प्रमुख स्रोत भी हैं। भोजन बनाने के लिए ईंधन की लकड़ी से लेकर खेती व पशुपालन के लिए चारा-पत्ती व अनेक वस्तुओं की प्राप्ति वनों से ही होती हैं।

सामान्य तौर पर हमारे देश में दो सौ सेंटीमीटर से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सदाबहार चौड़ी पत्ती वाले वन और सौ से दो सौ सेंटीमीटर वर्षा वाले भागों में पर्णपाती मानसूनी वन पाए जाते हैं। इन वनों में रोजवुड, सागवान, चीड़ व साल के वृक्ष पाए जाते हैं। जिन वनों में पचास से सौ सेंटीमीटर वर्षा होती है, वे शुष्क वन कहे जाते हैं और इनमें बबूल, खेजड़ा जैसी कंटीली प्रजाति के वृक्ष पाए जाते हैं। पचास सेंटीमीटर से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में प्राय: अर्द्ध मरुस्थलीय वन पाए जाते हैं। भारत के कुल वन क्षेत्रों में तिरानवे फीसद उष्ण कटिबंधीय वन और सत्तासी फीसद शीतोष्ण वन पाए जाते हैं। इसमें से 95.7 फीसद वन राज्य सरकारों, 2.8 फीसद निगमों और शेष डेढ़ फीसद निजी संस्थानों के अधिकार में आते हैं।

आंकड़ों के मुताबिक भारत में कुल भू-भाग का आठ लाख सात हजार दो सौ छिहत्तर वर्ग किलोमीटर अर्थात 24.56 फीसद भाग वनों व वृक्षों से आच्छादित है। जबकि वास्तविक तौर पर यह वन क्षेत्र इससे कहीं कम बैठता है। भारतीय वन सर्वेक्षण के वर्ष 2019 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में वनावरण क्षेत्र सात लाख बारह हजार दो सौ उनचास वर्ग किलोमीटर है जो कुल भौगोलिक भू-भाग का 21.67 फीसद है। भारत के राज्यों में वनों की स्थिति देखें, तो इनका वितरण समान रूप से दिखाई नहीं देता। इसके मूल में कई कारण हैं। राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और गुजरात जैसे क्षेत्रों में अल्प वर्षा होने के कारण वन क्षेत्र बहुत कम है। हरियाणा व पंजाब में कृषि भूमि के विस्तार के लिए वनों का सफाया करने से वहां वन क्षेत्रों में कमी आ गई।

पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश व बिहार में भी यही स्थिति है। कम वर्षा, तीव्र बंजर ढलान और हिमाच्छादित भाग की अधिकता के कारण से जम्मू कश्मीर में भी कम वन पाए जाते हैं। महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु का अधिकांश भाग वृष्टिछाया में आता है, इसलिए यहां भी वनों की कमी है। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के समुद्र तटीय क्षेत्रों में जिन क्षेत्रों में सघन वर्षा होती है, वहां जंगलों को साफ करके खेती की जमीन तैयार कर ली गई है। सघन वर्षा, उच्च भौगोलिक स्थिति और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण हिमालयी और मध्य पठारी भाग वाले राज्यों जैसे मिजोरम, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, उत्तराखंड, सिक्किम, त्रिपुरा, असम, हिमाचल प्रदेश और मध्यप्रदेश व ओड़िशा में वनों का प्रतिशत देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक मिलता है।

वनों का स्थानीय समुदाय से हमेशा से घनिष्ठ नाता रहा है। देखा जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के मुख्य आधार खेती-बाड़ी व पशुपालन सीधे तौर पर वनों से ही जुड़े हैं। वनों से ही ग्रामीणों को पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है। पत्तों की बिछावन से खेतों को खाद मिलती है। गैस की सुविधा गांवो में पंहुचने के बाद भी कई परिवार खाना बनाने में आज भी जलावन लकड़ी का उपयोग करते हैं। वन उपज से हर साल प्रदेशों को बड़ी मात्रा में राजस्व मिलता है। इमारती लकड़ी, लीसा, विरोजा, जलावन लकड़ी, वन भूमि व नदी किनारों में मौजूद उप खनिजों के क्षेत्र, जंगली जड़ी-बूटियां व घास आदि राजस्व प्राप्ति के बहुत बड़े स्रोत हैं। ग्रामीण व आदिवासी समुदाय की अधिसंख्य आजीविका वनों पर ही निर्भर रहती है।

वनों से जहां इन्हें अपने दैनिक खानपान के लिए विविध कंदमूल व फल आदि प्राप्त होते हैं, वहीं दूसरी तरफ वनों से मिलने वाले उत्पाद यथा जड़ी-बूटी, शहद, गोंद, बिरोजा, तेंदू पत्ता और जलावन लकड़ी को इकट्ठा करने के कार्य अथवा उनके विक्रय आदि से स्थानीय ग्रामीण जनों को आय प्राप्ति होती है। इसके अलावा ग्रामीण स्तर पर चलाए जाने वाले अनेक हस्तशिल्प, दस्तकारी, चर्म उत्पाद, मिट्टी के बरतन निर्माण जैसे तमाम कुटीर उद्योग प्रत्यक्ष तौर से वनों पर ही निर्भर रहते हैं। साथ ही वनों की लकड़ी से आरामशीन व फर्नीचर उद्योग से भी कई लोगों को रोजगार मिला हुआ है। हिमाचल व उत्तराखंड में चीड़ के वन हर साल हजारों की संख्या में श्रमिकों को आजीविका प्रदान करते हैं। पर्वतीय कृषि व्यवस्था में बांज (जिसे अंग्रेजी में ओक कहा जाता है) के वनों की अहम भूमिका रहती है। इसकी हरी पत्तियां पशुओं के लिये पौष्टिक चारा प्रदान करती हैं। मुख्य बात यह भी है कि इसकी सूखी पत्तियां पशुओं के बिछावन लिए उपयोग में लाई जाती हैं, जो बाद में अच्छी प्राकृतिक खाद बन कर खेती की पैदावार बढ़ाने में अपना योगदान देती हैं।

बांज की लकड़ी से अन्य काष्ठ ईंधन की तुलना में अधिक मात्रा में ताप और ऊर्जा मिलती है। ग्रामीण काश्तकार बांज की लकड़ी का उपयोग खेती के काम में आने वाले विविध औजारों के निर्माण में भी करते हैं। इसके अलावा वनों में पाई जाने वाली जैव-विविधता, जीव-जंतुओं की प्रजातियां व नैसर्गिक सौंदर्य वन पर्यटन व पारिस्थितिकीय-पर्यटन के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करते हैं। वन क्षेत्रों में पर्यटन विकसित होने से स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिलता है। पर्यटन की दृष्टि से भारत में राष्ट्रीय उद्यानों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। पूरे भारत में इस समय सौ से अधिक राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव विहार व संरक्षण आरक्षित क्षेत्र हैं जिनमें हर साल हजारों की संख्या में देशी व विदेशी पर्यटक आते हैं। उत्तराखण्ड के जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान का उदाहरण लें तो यहां वर्ष 2017-18 में करीब ढाई लाख पर्यटक आए थे और इससे सरकार को खासा राजस्व मिला।

देश में वन क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी लाने और मौजूद वनों के विकास, संरक्षण व संवर्द्धन की दिशा में कुछ उपायों पर विचार किया जाना महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। इसके लिए देश व प्रदेश की सरकारों को वन क्षेत्र की न्यूनता निर्धारित करने और लक्ष्य प्राप्ति के लिए कारगर योजनाएं बना कर काम करने की आवश्यकता है। देश में आम जनमानस में वनों के प्रति विशेष रुचि पैदा करने और उनमें वनों के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करने की जरूरत है। इसके साथ ही वन कर्मचारियों को समय-समय पर प्रशिक्षित किए जाने, वनोपज व वन दोहन के तकनीकी ज्ञान संबंधी शोध कार्य को बढ़ावा देने आदि से भी वन क्षेत्रों में वृद्धि के प्रयास किए जा सकते हैं। कई स्थानों पर बेकार पड़ी व खेती के अयोग्य भूमि में वृक्षों का रोपण किया जा सकता है। वन क्षेत्र की उस भूमि पर जहां अब वन नहीं है, उन स्थानों पर भी वन लगाए जा सकते हैं। वन अनुसंधान संस्थान, वन विभाग, वन निगम, भारतीय वन सर्वेक्षण, रिमोट, सेंसिंग सेंटर इत्यादि संस्थानों के माध्यम से वनों की जांच-पड़ताल, अनुसंधान व विकास हेतु सतत अध्ययन के कार्य भी प्रभावी साबित हो सकते हैं। यही नहीं स्थानीय स्वैच्छिक संस्थाओं द्वारा ग्राम स्तर पर वनों को आग से बचाने में सामूहिक भागीदारी के प्रयास, वन संरक्षण व विकास हेतु किए जाने वाले नवीन प्रयोगात्मक कार्य भी लोगों में एक नया दृष्टिकोण पैदा कर सकते हैं।

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