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आर्थिक असमानता से बढ़ती मुश्किलें

ऐसी भीषण आर्थिक विषमता किसी भी सभ्य और संतुलित व्यवस्था के अनुकूल नहीं होती। लोकतंत्र में तो कदापि नहीं; क्योंकि ऐसे समाज में सत्ता के शीर्ष पर पूंजीपति वर्ग का आधिपत्य होना अवश्यंभावी होता है। चूंकि इस स्थिति में पूंजीपति और पूंजीहीनों के मध्य टकराव स्वाभाविक हो जाता है और बहुसंख्यक के हितों को दरकिनार कर लोकतंत्र के स्थायित्व की उम्मीद बेमानी हो जाती है।

कृष्ण जांगिड़

गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ती खाई आज भारत के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है। आक्सफैम इंटरनेशनल द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट ‘इनक्वालिटी किल्स’ के मुताबिक कोविड-19 के बाद जहां दुनिया की एक बड़ी आबादी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी जद्दोजहद कर रही है, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के दस सबसे अमीर लोगों की संपत्ति बीते दो वर्षों में दोगुनी हो चुकी है।

यानी करीब बावन लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर एक सौ ग्यारह लाख करोड़ को पार कर चुकी है। इसका मतलब है कि हर दिन उनकी संपत्ति में लगभग 9656 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ। इस रिपोर्ट का दूसरा पहलू बड़ा चिंताजनक है, जो बताता है कि इन्हीं दो वर्षों में दुनिया की निन्यानबे फीसद आबादी की आमदनी में कमी दर्ज की गई है। कोविड महामारी के चलते दुनिया में करीब सोलह करोड़ लोग गरीबी की मार झेलने को मजबूर हुए हैं। आक्सफैम इंटरनेशनल की कार्यकारी निदेशक गैब्रिएला बुचर ने कहा था कि अगर ये दस लोग कल अपनी संपत्ति का निन्यानबे फीसद हिस्सा खो भी देते हैं, तो वे धरती के निन्यानबे फीसद लोगों से ज्यादा अमीर होंगे।

आर्थिक असामानता को लेकर भारत के मामले में आंकड़े कहते हैं कि 2021 में देश के चौरासी फीसद परिवारों की आय घटी है, लेकिन भारतीय अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़ कर 142 हो चुकी है। कोविड महामारी के दौरान भारतीय अरबपतियों की संपदा 23.14 लाख करोड़ रुपए से बढ़ कर 53.16 लाख करोड़ रुपए हो गई है। वैश्विक स्तर पर देखें तो चीन और अमेरिका के बाद भारत में अरबपतियों की तीसरी सबसे बड़ी संख्या है। वहीं एक ओर संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार दुनिया में पैदा होने वाली नई गरीबी में लगभग आधी भारत में सृजित हो रही है।

आर्थिक विषमता जीवन के हर पहलू पर प्रभाव डालती है। एक बड़े वर्ग के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, सुरक्षा जैसी मूलभूत जरूरतें पूरी कर पाना असंभव होता है तो एक छोटे समूह के पास साधन-संसाधन विलासिता की तरह रहते हैं। नतीजतन, शोषित और गरीब जन में क्षोभ पनपता और ऐसी गतिविधियां बढ़ती हैं, जिन्हें मोटे तौर पर अपराध में वर्गीकृत किया गया है।

आर्थिक तौर पर यह गैर-बराबरी सबसे गरीब लोगों, महिलाओं और लड़कियों को अधिक प्रभावित करती है। गरीबी के चलते उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और अन्य मूलभूत साधनों से पहुंच दूर होती है। 2021 के नवंबर माह में भारत के नीति आयोग ने देश में पहला बहुआयामी गरीबी सूचकांक जारी किया था। इसके अनुसार गरीबी स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवनस्तर के अनेक पहलुओं से जुड़ी होती है। इस रिपोर्ट के अनुसार 37.6 प्रतिशत भारतीय परिवार पर्याप्त पोषणयुक्त भोजन नहीं कर पाते और करीब चौदह प्रतिशत परिवार ऐसे हैं, जहां दस या इससे अधिक उम्र के बच्चे स्कूलों में छह वर्ष तक पढ़ाई नहीं कर पाते हैं।

यह रिपोर्ट बताती है कि बिहार में गरीबी का अनुपात सबसे अधिक है, इसके बाद झारखंड और उत्तर प्रदेश का स्थान है। सर्वाधिक कुपोषण के मामले में क्रमश: बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश हैं। इसका सीधा अर्थ है कि गरीबी पोषण से सीधे तौर पर संबंधित है।

इस रिपोर्ट के मुताबिक पंद्रह से उनचास आयु वर्ग की आधी से अधिक भारतीय महिलाएं शरीर में खून की कमी से पीड़ित हैं और पिछले कुछ वर्षों में ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ी है। हमारे देश में पांच वर्ष से कम उम्र के सत्रह फीसद से अधिक बच्चों का वजन उनकी लंबाई और उम्र के मुताबिक कम है। बीते वर्ष ही संसद में दिए गए एक जवाब में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने बताया कि नवंबर 2020 तक भारत में 9.2 लाख से अधिक बच्चे ‘गंभीर रूप से कुपोषित’ थे।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और आक्सफोर्ड पावर्टी ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इनीशिएटिव द्वारा पिछले ही वर्ष जारी किए गए वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक को देखें तो गरीबी के मामले में दुनिया के 109 देशों में भारत 66वें स्थान पर है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों का दूसरा लक्ष्य गरीबी उन्मूलन करना है। भारत ने भी इन लक्ष्यों को अपनाया है, लेकिन हमारे देश में गरीबी के ये भीषण आंकड़े इस लक्ष्य को असंभव-सा बना रहे हैं।

भारत दुनिया में चौथा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार वाला राष्ट्र है। हमने पांच खरब डालर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य निर्धारित किया है और मानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अगले तीन वर्ष तक दुनिया की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था बनी रहेगी। इस सबके साथ ही हमारे यहां कारपोरेट घरानों की संपदा बढ़ रही है और गरीबी का विस्तार हो रहा है। इस दौर में गाड़ी चलाने से लेकर चूल्हा जलाने के महंगे ईंधन से धनिक वर्ग पर शायद ही खास प्रभाव पड़े, मगर निम्न और मध्यवर्ग के लिए यह गंभीर संकट की तरह है।

देश की एक बड़ी आबादी, जो पहले मध्य या निम्न मध्यवर्ग में शामिल थी, महामारी और पूर्णबंदी के चलते गरीबी रेखा से नीचे खिसक चुकी है। वहीं बंदी के चलते आनलाइन कार्य संस्कृति के विस्तार में साधन-संसाधन युक्त एक वर्ग सहजता से फिट हुआ और कई सफल बिजनेस माडल इस दौर में फले-फूले हैं। ऐसी भीषण आर्थिक विषमता किसी भी सभ्य और संतुलित व्यवस्था के अनुकूल नहीं होती।

लोकतंत्र में तो कदापि नहीं; क्योंकि ऐसे समाज में सत्ता के शीर्ष पर पूंजीपति वर्ग का आधिपत्य होना अवश्यंभावी होता है। चूंकि इस स्थिति में पूंजीपति और पूंजीहीनों के मध्य टकराव स्वाभाविक हो जाता है और बहुसंख्यक के हितों को दरकिनार कर लोकतंत्र के स्थायित्व की उम्मीद बेमानी हो जाती है।

गौरतलब है कि सत्तर वर्ष पहले हमारे देश में शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति के आधार पर शिक्षा और रोजगार में आरक्षण दिया गया था। पर इन दशकों में हमने गैर-बराबरी के एक और पैमाने को विकसित किया है और वह है आर्थिक आधार। भारत में तेजी से बढ़ती गरीबी और असमानता ने हमारे कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है। देश में गरीबी उन्मूलन के लिए जो नीतियां-कार्यक्रम और योजनाएं तैयार की गर्इं, आर्थिक विषमता के चलते उनकी सफलता पर भी सवाल उठते हैं।

देश में अमीरी-गरीबी की गहराती खाई को पाटने के लिए आज आवश्यकता है कि सरकारें पारदर्शी प्रशासन के साथ अपनी कल्याणकारी भूमिका का विस्तार करें। भ्रष्टाचार पर शून्य सहिष्णुता की नीति के साथ नागरिकों को स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा, आवास और भोजन का मौलिक अधिकार दें। सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार के साथ ही रोजगार सृजन, क्षमता निर्माण, ग्राम सशक्तिकरण, लघु और कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन और संपत्ति के पुनर्वितरण जैसे उपायों पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। साथ ही प्रगतिशील कर यानी अधिक धनिक पर अधिक करारोपण की व्यवस्था सख्ती से लागू कर देश में आर्थिक गतिशीलता पैदा करें।

महात्मा गांधी का आर्थिक दर्शन न्यासिता की अवधारणा देता है। यानी समाज का संसाधन संपन्न तबका अपनी आवश्यकताएं पूर्ण कर उन लोगों को धन वितरित करे, जिन्हें जरूरत है। यह कार्ल मार्क्स की वर्ग संघर्ष अवधारणा से सर्वथा विपरीत है, जिसमें मार्क्स कहते हैं कि सर्वहारा वर्ग हिंसा के जरिए बुर्जुआ वर्ग को सत्ता और संसाधनों से बेदखल कर देगा। विनोबा भावे ने संपन्न भूमिपतियों से भूमिहीनों के हित में भूदान लिया था। हमारा संविधान भी नीति निर्देशक तत्त्वों में समाजवाद के दर्शन पर बल देता है, आर्थिक समानता पर बल देता है। एक सौ पैंतीस करोड़ भारतीयों के विकास के लिए साधन-संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण वर्तमान भारत की एक महती आवश्यकता है।

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