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राजनीति: पक्षियों की सुरक्षा पर सवाल

प्रवासी पक्षी अपनी लंबी यात्रा से विभिन्न संस्कृतियों और परिवेशों को जोड़ने का कार्य करते हैं। ये पक्षी रेगिस्तान, समुद्र और पहाड़ों को पार करके एक देश से दूसरे देश का सफर करते हैं। पक्षियों की ज्ञात प्रजातियों में उन्नीस फीसद नियमित रूप से प्रवास करते हैं। गौरतलब है कि प्रवासी पक्षी जैव विविधिता का हिस्सा हैं। अगर इनका संरक्षण पूरी तरह से सुनिश्चित नहीं किया गया तो, कुछ ही सालों में बचे प्रवासी और देशी पक्षी हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे।

Safety of Birdsपटना में गंगा नदी के ऊपर उड़ता है पक्षियों का झुंड। (फोटो- पीटीआई)

बर्ड फ्लू के बढ़ते संक्रमण के बीच प्रवासी पक्षियों की हिफाजत सरकार के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। यह कोई आसान काम नहीं है। गौरतलब है कि वन्य प्राणियों पर बढ़ते खतरों का असर जैव विविधता पर साफ नजर आने लगा है। ऐसे में जैव विविधता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभाने वाले पक्षियों पर बढ़ते खतरे पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है।

पिछले साल जब देश में लोग कोरोना की दहशत में थे, तब भी प्रवासी पक्षी देश के कई अभयारण्यों और तालाबों में बेखौफ पहुंच रहे थे। यह पहली दफा था, जब प्रवासी पक्षियों के लिए हवा और हरीतिमा सबसे अनुकूल मिली। मगर इसका नाजायज फायदा शिकारियों ने उठाया। पूर्णबंदी और आंशिक बंदी के बावजूद प्रवासी पक्षियों का शिकार और व्यापार जारी रहा।

सैकड़ों ग्रीष्म कालीन प्रवासी पक्षी लौट कर अपने घर नहीं जा सके। अभयारण्यों में शीत कालीन प्रवासी पक्षियों का आना और जलविहार जारी है, साथ में उनके शिकार और व्यापार की खबरें भी आ रही हैं। गौरतलब है पक्षियों के शिकार की वजह से पिछले तीस सालों में पक्षियों की दुर्लभ इक्कीस प्रजातियां लुप्त हो गई हैं, जबकि सौ साल में इसके पहले औसतन एक प्रजाति लुप्त होती थी। कुछ खास तरह के भारतीय पक्षियों का शिकार पिछले तीस सालों में काफी तेज हुआ है। इसी तरह प्रवासी पक्षियों में कॉमन कूट, ब्लैक बिंग्ड स्टिल्ट, नदन फावडे, रूडी शेल्डक, लेसर व्हिस्लिं गडक, वाइड एवोसेट और कैस्पियन मूल, जो भारत में हर साल प्रवास के लिए आते हैं, के शिकार की खबरें भी आती रही हैं।

पिछले वर्ष जलवायु सम्मेलन में एक सौ तीस देशों ने जलवायु परिवर्तन के चलते प्रवासी पक्षियों की घटती संख्या और लुप्त हो रही प्रजातियों को लेकर चिंता व्यक्त की गई। गौरतलब है इंटर नेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन आफ नेचर (आईयूसीएन) के अनुसार शिकार और पारिस्थितिकी प्रणाली के कारण देश में निवास करने वाली एक सौ अस्सी पक्षी प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर या खतरे में हैं। प्रवासी और देशी पक्षियों के संरक्षण के लिए और उन्हें स्वतंत्रता देने के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन उन कानूनों का कड़ाई से पालन नहीं हो पा रहा है। जैव विविधता को संरक्षित करने और पक्षियों को इंसान की तरह जीने का अधिकार देने सालिम अली की तरह पक्षियों के लिए जीवन समर्पित करने वाले लोग बहुत कम हैं।

प्रवासी पक्षी अपनी लंबी यात्रा से विभिन्न संस्कृतियों और परिवेशों को जोड़ने का कार्य करते हैं। ये पक्षी रेगिस्तान, समुद्र और पहाड़ों को पार करके एक देश से दूसरे देश का सफर करते हैं। पक्षियों की ज्ञात प्रजातियों में उन्नीस फीसद नियमित रूप से प्रवास करते हैं। गौरतलब है कि प्रवासी पक्षी जैव विविधिता का हिस्सा हैं। अगर इनका संरक्षण पूरी तरह से सुनिश्चित नहीं किया गया तो, कुछ ही सालों में बचे प्रवासी और देशी पक्षी हमेशा के लिए लुप्त हो जाएंगे।

विश्व प्रसिद्ध सांभर झील हो या गिरिडीह (झारखंड) और भरतपुर (राजस्थान) के प्रसिद्ध केवलानंद अभयारण्य में पहले से बहुत कम प्रवासी पक्षी अब आते हैं। वहीं पर डूंगरपुर, बांसवाड़ा और उदयपुर में पहले से ज्यादा प्रवासी पक्षी आते हैं। इसी तरह राजस्थान के छोटे से गांव मेनार में ग्रामीण पर्यावरण संरक्षण की एक नई इबारत लिखने लगे हैं। भारत में पक्षियों की बारह सौ से ज्यादा प्रजातियों तथा उपप्रजातियों के लगभग इक्कीस सौ प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। इनमें से लगभग साढ़े तीन सौ प्रजातियां प्रवासी हैं, जो देश के अलग-अलग क्षेत्रों में शीत और ग्रीष्म ऋतु में आते हैं।

कुछ प्रजातियां जैसे पाइड क्रेस्टेड कक्कु (चातक) भारत में बरसात के समय प्रवास पर आते हैं। स्थानीय स्तर के प्रवासी पक्षी भी बड़ी संख्या में देश के एक कोने से दूसरे कोने का सफर करते हैं। बिहार में पैंतीस से चालीस प्रतिशत प्रजातियां प्रवासी पक्षियों की हैं। इनकी सुरक्षा और संरक्षण करना एक बड़ी चुनौती है। जानकारी के मुताबिक यों तो देश में जहां भी प्रवासी पक्षी प्रवास करते हैं, वहां उनका शिकार आम बात है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इनका शिकार तेजी से हो रहा है। जिन अभयारण्यों में प्रवासियों का शिकार सबसे ज्यादा हो रहा है, उनमें भरतपुर के केवलानंद, बिहार के फतुहा, बेगूसराय, कुशेश्वरस्थान, पटना सिटी जैसे इलाके शामिल हैं।

प्रवासी पक्षियों का संरक्षण कई स्तरों पर चुनौती बना हुआ है। भारत एक गर्म जलवायु का क्षेत्र है। इसलिए यहां उन क्षेत्रों के पक्षी प्रवास में लाखों की संख्या में आते हैं, जहां की जलवायु अत्यंत ठंठी है। लेकिन जलवायु परिवर्तन हमारे यहां भी बड़ी समस्या बनती जा रही है। इसका असर उन प्रवासी पक्षियों पर देखा जा रहा है, जो अनुकूलता के लिए यहां चार से छह महीने रहते हैं। ठंडे देशों के ये पक्षी कई ऐसी प्रजातियों के हैं, जिनका शरीर काफी वजनी है। यही कारण है कि इनका शिकार होता है।

भारत में एक समय चिड़ियों की बारह सौ प्रजातियां पाई जाती थीं। अब इसमें से पचास से अधिक प्रजातियां लुप्त हो गई हैं। गिद्धों की कुछ प्रजातियां, कठफोड़़वा, ग्रेट इंडियन बस्टैर्ड जैसे पक्षियों की प्रजातियां लुप्त हो गई या लुप्त होने के कगार पर हैं। विकास संबंधी अस्थायी नीतियों और प्रकृति के प्रति बढ़ती असंवेदशीलता के कारण भी भारत के कई पक्षी वास खतरे में हैं। इससे पक्षियों के लुप्त होने का खतरा और बढ़ गया है। इस बात की पुष्टि ‘बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के ताजा अध्ययन से होती है, जिसमें भारत के कम से कम दस जैव विविधता वाले इलाकों पर हमेशा के लिए लुप्त हो जाने का खतरा पैदा हो गया है।

भारत में जिन पक्षी वास स्थानों का खतरा बढ़ गया है, उसमें गुजरात में कच्छ के ‘फ्लेमिंगो सिटी’ महाराष्ट्र का सोलापुर, मुंबई का सीवडी-माहुल क्रीक, अहमदनगर का ग्रेट इंडियन बस्टैर्ड अभयारण्य शामिल हैं। इसके अलावा हरियाणा स्थित बसई, मध्यप्रदेश स्थित सैलाना खरगोर अभयारण्य, अंडमान निकोबार का मिल्लांगचोंग, कर्नाटक का रानेबेन्नूर अभयारण्य, मध्यप्रदेश का करेरा वन्यजीव अभयारण्य भी हरियाली की कमी के कारण पक्षियों के लिए प्रतिकूल साबित हो रहे हैं।

कांजीरंगा असम का प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान है। यह यूनस्को घोषित विश्व धरोहरों में शामिल है। इसमें पक्षियों की चार सौ पचास प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें बंगाल फ्लोरिकन, हार्नबिल और उल्लू की कुछ प्रजातियां लुप्त होने के कगार पर हैं। बदलते मौसम, अति वर्षा, बढ़ते प्रदूषण, शिकार के कारण पक्षियों के लिए अब यह उद्यान सुरक्षित नहीं रह गया है। इसी तरह राजस्थान के भरतपुर का केवलादेव उद्यान 1985 से विश्व धरोहरों में शामिल है। यहां पक्षियों की तीन सौ पैंसठ प्रजातियां तीन शताब्दी पहले पाई जाती थीं। जो चीन, अफगानिस्तान, साइबेरिया से बड़ी तादाद में यहां आए थे। आजादी के पहले यहां पक्षियों के शिकार के लिए शाही परिवार के अलावा अन्य मांसभक्षी पक्षियों का शिकार करते थे, जिससे अनेक तरह के पक्षी हमेशा के लिए विलुप्त हो गए। कुछ लुप्त होने के कगार पर हैं, जिसमें तीतर, बटेर, मुर्गाबियां शामिल हैं।

पक्षियों के संरक्षण और सुरक्षा का लेकर 1873 में वन्यजीव संरक्षण कानून बनाए गए थे, लेकिन उन कानूनों से भी वन्य जीवों के शिकार पर अंकुश नहीं लगता था। स्वतंत्र भारत में सर्वप्रथम 1952 में वन्यजीव बोर्ड की स्थापना की गई, जिसका पुनर्गठन 1991 में हुआ। इस बोर्ड की स्थापना पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अंतर्गत की गई है। जीव-जंतुओं के कल्याण की योजनाओं और उनके क्रियान्वयन के अलावा वन्य जीवों पर अत्याचार को रोकना भी इसका काम है।

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