परीक्षा में धांधली का दंश

पर्चे लीक होने का सिलसिला हाल के वर्षों में इतना बढ़ा है कि शायद ही कोई प्रतिष्ठित परीक्षा इसकी चपेट में आने से बच पाई हो। पता चला है कि पचास हजार से पांच लाख रुपए तक में बिके प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर मुहैया कराए गए। यह भी संभव है कि जिन मामलों का खुलासा नहीं हुआ, वहां ऐसे चोर रास्तों से शायद सैकड़ों लोग नौकरी या प्रतिष्ठित पाठ्यक्रमों में दाखिला पा गए हों। ऐसे में यह सवाल बना रहेगा कि क्या कभी हमारी प्रतियोगी परीक्षाएं इस बीमारी से निजात पा सकेंगी।

UPTET 2021 Exam
यूपी सरकार ने ये फैसला किया है कि ये परीक्षा दोबारा ली जाएगी। (Express photo by Jasbir Malhi)

संजय वर्मा

परीक्षाएं काबिलियत की परख के लिए जरूरी हैं। पुराने वक्त में शासकों की सेनाओं में भर्ती का पैमाना शारीरिक सौष्ठव हुआ करता था। आधुनिक समय में पढ़ाई-लिखाई और दिमागी समझ इसका आधार बनी। मगर योग्यता तय करने के लिए जिस परीक्षा की जरूरत होती है, अगर उसमें नकल और पर्चा बाहर होने जैसे घुन लग जाएं, तो क्या होगा। यह एक ऐसा मुश्किल सवाल है, जिससे इधर उत्तर प्रदेश में पर्चा लीक के कारण रद्द की गई शिक्षक भर्ती परीक्षा (यूपी टीईटी) से जुड़ा तंत्र, सरकार और सबसे ज्यादा वे परीक्षार्थी जूझ रहे हैं, जिन्हें परीक्षा केंद्रों पर जाकर पता चला कि पर्चा लीक की वजह से वे एक त्रासद अनिश्चय में घिर गए हैं।

भले यूपी सरकार ने एक महीने में इस परीक्षा को दुबारा आयोजित करने का आश्वासन दिया है, लेकिन चुनावी माहौल में आचार संहिता लागू होने की संभावनाओं के मद्देजर कोई नहीं जानता कि एक बार टली ये परीक्षाएं फिर कब होंगी। पर अनिश्चय इतना भर नहीं है। यह भी है कि क्या आगे होने वाली परीक्षाओं का पर्चा लीक नहीं होगा।

देश की तकरीबन हर प्रतियोगी परीक्षा के पर्चे लीक करा चुके गिरोहों, तंत्र में गहरे पैठे भ्रष्टाचारियों और हर बार सरकार के बड़े-बड़े दावों के खोखले निकल जाने की घटनाओं ने अतीत की ज्यादातर परीक्षाओं की सत्यता को संदेह के घेरे में ला दिया है। यही नहीं, जिन परीक्षाओं को हर योग्यता का मानक बनाया गया है, वे अब बेमानी प्रतीत होने लगी हैं।

ऐसे ज्यादातर मामलों में किसी जांच को नतीजे तक ले जाने में नाकाम रहने वाली सरकारें अपने तंत्र और निकम्मे अधिकारियों और पर्चा लीक कराने वाले अपराधियों पर कोई अंकुश लगा पाएंगी, यह उम्मीद तो अब कोई नहीं करता। हालांकि वे अगर ऐसा करना चाहें और राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं, तो इसमें कोई समस्या नहीं है।

यहां सबसे बड़ा सवाल प्रतियोगी या प्रवेश परीक्षाओं में बैठने वाले उम्मीदवारों की हताशा का है। अहम प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रतिष्ठित पाठ्यक्रमों की प्रवेश परीक्षा के पर्चे अगर पहले से लीक हो जाएं, भर्तियों में पैसे लेकर धांधली की जाए या सांठगांठ कर नकल कराते हुए परीक्षार्थियों को उत्तीर्ण करा लिया जाए, तो सबसे ज्यादा कष्ट उन मेहनती परीक्षार्थियों और उम्मीदवारों को होता है जो प्रतिभा के बल पर किसी परीक्षा में अपनी योग्यता साबित करने का जतन करते हैं।

पर्चा लीक कांडों का यह अनवरत सिलसिला परीक्षार्थियों को परीक्षा के लिए दुबारा तैयारी करने से लेकर आने-जाने और तमाम खर्चे उठाने का विकल्प छोड़ता है, जिसकी भरपाई कोई सरकार नहीं करती। इस बार यूपी की योगी सरकार ने परीक्षा की फीस दुबारा भरने से छूट और अभ्यर्थियों को यूपी रोडवेड की बसों में वापसी की मुफ्त यात्रा का विकल्प दिया है, लेकिन इन हादसों से लगे घाव इतने गहरे हैं कि ऐसे मरहम ज्यादा राहत नहीं देते।

ये घटनाएं लाखों बेरोजगारों को कैसे आक्रोश से भर देती हैं, उसका एक उदाहरण तीन साल पहले कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) के तहत 17-21 फरवरी, 2018 को हुई संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा है। आनलाइन परीक्षा के दौरान ही सोशल मीडिया पर इसका प्रश्नपत्र लीक हो गया था। फिर परीक्षा रोक दी गई। इस पर छात्रों का आक्रोशित होना स्वाभाविक था, क्योंकि इससे उन्हें परीक्षा के लिए दुबारा मेहनत करने और पैसा खर्च करने की जरूरत थी। इस पर हजारों छात्र धरने-प्रदर्शन पर उतर आए थे।

समाजसेवी अण्णा हजारे समेत कुछ राजनीति दलों ने भी उसकी सीबीआई जांच की मांग करते हुए आंदोलन का समर्थन किया था। आखिर सरकार पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच को राजी हो गई थी। इस घटना और इसके आगे-पीछे हुई तमाम घटनाओं ने साबित किया है कि अब छात्रों को यह बर्दाश्त नहीं कि व्यवस्था की खामियों का नतीजा वे भुगतें। उत्तर प्रदेश शिक्षक भर्ती की ताजा परीक्षा में पेपर लीक ने फिर साबित कर दिया कि इस मर्ज का कोई इलाज सरकारों के पास नहीं है।

पर्चे लीक होने का सिलसिला हाल के वर्षों में इतना बढ़ा है कि शायद ही कोई प्रतिष्ठित परीक्षा इसकी चपेट में आने से बच पाई हो। शिक्षक भर्ती के अलावा यूपी-पीसीएस, यूपी कंबाइड प्री-मेडिकल टेस्ट, यूपी-सीपीएमटी, एसएससी, ओएनजीसी और रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षाओं के पेपर हाल के कुछ वर्षों में लीक हुए हैं। यह भी पता चला है कि पचास हजार रुपए से पांच लाख रुपए तक में बिके प्रश्नपत्र सोशल मीडिया पर मुहैया कराए गए। यह भी संभव है कि जिन मामलों का खुलासा नहीं हुआ, वहां ऐसे चोर रास्तों से शायद सैकड़ों लोग नौकरी या प्रतिष्ठित पाठ्यक्रमों में दाखिला पा गए हों। ऐसे में यह सवाल बना रहेगा कि क्या कभी हमारी प्रतियोगी परीक्षाएं इस बीमारी से निजात पा सकेंगी।

असल में, आज देश का शायद ही कोई ऐसा कोना बचा हो, जहां पर्चा लीक कराने वाले गिरोहों ने अपना कारनामा न किया हो। यहां तक कि सीबीएसई जैसे विश्वसनीय शैक्षणिक संगठन में भी पर्चा लीक गिरोह सेंध लगा चुका है। पेपर लीक कराने के लिए कुख्यात रहे कई अपराधियों की गिरफ्तारी भी हुई है। लेकिन इसका न रुक पाना साबित करता है कि योग्यता का मापदंड तय करने वाली परीक्षा प्रणाली की व्यवस्था पूरी तरह लुंजपुंज हो गई है। सरकारें पर्चे की लीकेज को बहुत हल्के में लेती हैं, ऐसे में यह मर्ज लाइलाज बनता जा रहा है।

इसका एक पहलू बेरोजगारी और सरकारी नौकरी की चाह से भी जुड़ा है। ऐसी ज्यादातर परीक्षाओं में कुछ सौ या हजार पदों के लिए आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। शिक्षक भर्ती जैसी नौकरियों के लिए योग्यता हासिल करने वाली टीईटी और सीटीईटी जैसी प्रतियोगी परीक्षाएं एक कदम आगे बढ़ गई हैं। ये परीक्षाएं न तो कोई शैक्षिक योग्यता प्रदान करती हैं और न ही नौकरी दिलाती हैं, लेकिन नौकरी के लिए योग्य होने की ऐसी सीढ़ी बन गई हैं, जिसके माध्यम से नौकरी का सिर्फ आश्वासन मिलता है।

फिर भी आलम यह है कि इसके आवेदकों की संख्या लाखों में होती है। इसी तरह अन्य सरकारी नौकरियों और मेडिकल और इंजीनियरिंग कालेजों की प्रवेश परीक्षाओं में तो आठ-दस लाख परीक्षार्थियों का शामिल होना अब आम बात है। इस सबका कुल अर्थ यह है कि चाहे प्रोफेशनल कोर्स की बात हो या नौकरी की, हर जगह स्थिति एक अनार-सौ बीमार वाली है। मांग ज्यादा है, आपूर्ति कम। जहां भी ऐसे हालात पैदा होते हैं, वहां पैसे और अवैध हथकंडों की भूमिका स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।

यहां हमारे समाज का एक विद्रूप सामने आता है। बहुतेरे अभिभावक पैसे के बल पर अपने बच्चों, नाते-रिश्तेदारों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने वाली कोई भी सरकारी नौकरी दिलाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि किसी भी वैध-अवैध तरीके से अगर एक बार सरकारी नौकरी मिल गई, तो पूरा जीवन संवर जाएगा। ऐसे ही लोगों में से एक बड़ी संख्या उनकी है, जो डोनेशन देकर अच्छे संस्थानों की सीटें खरीदते हैं और मौका मिल जाए तो किसी भी प्रवेश या भर्ती परीक्षा का पर्चा हासिल करने की कोशिश करते हैं।

पर इन कुछ सौ या हजार लोगों की वजह से उन लाखों युवाओं की मेहनत और प्रतिभा व्यर्थ हो जाती है, जो अपनी काबिलियत के बल पर अपना भविष्य बनाना चाहते हैं। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। समझना होगा कि परीक्षाओं को आनलाइन कर देने या पर्चों को अंदर बंद कर देने भर से इंसानी अवगुणों पर पहरा नहीं बैठ जाता है। उसके लिए दोषियों की धरपकड़ कर उन्हें सख्त सजा देने की जरूरत होती है।

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