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नई पाठ्यचर्या और चुनौतियां

अनेक अवसरों पर यह प्रश्न उठता रहा है कि परीक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन तभी हो सकते हैं जब पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम निर्माण के समय व्यक्तित्व विकास के सभी पक्षों का ध्यान रखा जाए। इसमें अभी तक केवल सीमित सफलता ही मिली है। अब उम्मीद है कि पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार होगा जो बच्चों पर बोझ नहीं बनेगा।

Indiaसांकेतिक फोटो।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू करने के विभिन्न पक्षों पर देश में गहन चर्चा हो रही है। यह शिक्षा नीति एक विस्तृत विचार-विमर्श के बाद अस्तित्व में आई। इसका सबसे उत्साजनक पक्ष यह है कि देश ने इसे सकारात्मक दृष्टि से देखा है। शिक्षा नीतियों के क्रियान्वयन के सात दशकों के अनुभवों का भविष्य-संदर्भित विवेचन इस नीति निर्माण का आधार बना है।

इसमें यह स्वीकार गया है कि रोजगार और कौशलों के बदलते परिप्रेक्ष्य में वही युवा अपना स्थान बना सकेगा, जिसने अपने प्रारंभिक अध्ययन काल में समस्या-समाधान का कौशल तार्किक व रचनात्मक रूप से सीखा हो। तार्किक और विश्लेषणात्मक मेधा का विकास तभी संभव होगा, जब सभी शिक्षक उस विधा में आवश्यक प्रवीणता प्राप्त कर चुके हों। इसके लिए आवश्यक है कि देश के सारे शिक्षक प्रशिक्षक संसथान और उनमें नियुक्त शिक्षक-प्रशिक्षक इस नीतिगत आशय को आत्मसात करें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से देश में शैक्षिक सुधारों का जो वातावरण बना है, उसे बनाए रखने के लिए यह भी जरूरी होगा कि पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम निर्माता और पाठ्यपुस्तकों व अन्य पाठ्यसामग्री के लेखक नए हालात से ही नहीं, नई अपेक्षाओं और जरूरतों से भी परिचित हों। नई नीति की सफलता इसी पर निर्भर होगी कि बच्चे वही पढ़ें जो उनके लिए उपयोगी हो सके, जिसमें उनकी रुचि हो, जो उनके व्यक्तित्व के हर पक्ष का विकास करने में सहायक हो, जो उन पर बोझ न बने और बचपन को तनाव से न भर दे! पहले से चली आ रही वह प्रथा अब उपयोगी नहीं रहेगी जिसमें नई विषय-वस्तु को प्रमुखता से जोड़ा जाता था, लेकिन पुराना बहुत कम हटाया जाता था।

इससे बस्ते का बोझ इतना ज्यादा बढ़ गया कि 1990-91 में इस पर एक राष्ट्रीय समिति बनानी पड़ी। बोझ फिर भी कम नहीं हो पाया। अपेक्षा है कि इक्कीसवीं सदी की पाठ्यचर्या बच्चों, किशोरों और युवाओं के समक्ष एक ऐसा क्षितिज उद्धृत करेगी जिसमें उनके पास अपनी सोच, रुचि और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने का उत्साह और मनोबल उनकी सफलता का आधार बनें।

पाठ्य पुस्तकों व अन्य अध्ययन सामग्री के निर्माण के बीच दो अत्यंत महत्त्वपूर्ण पड़ाव पाठ्यचर्या (करिकुलम) और पाठ्यक्रम (सिलेबस) निर्माण के होते हैं। इन्हीं दो पर शिक्षा की उत्कृष्टता, उपयोगिता और परिपूर्णता निर्भर करती है। अनेक अवसरों पर यह प्रश्न उठता रहा है कि परीक्षा पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन तभी हो सकते हैं जब पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम निर्माण के समय व्यक्तित्व विकास के सभी पक्षों का ध्यान रखा जाए। इसमें अभी तक केवल सीमित सफलता ही मिली है।

अब उम्मीद है कि पाठ्यक्रम इस प्रकार तैयार होगा जो बच्चों पर बोझ नहीं बनेगा। पाठ्य सामग्री में शामिल होने वाली विषयवस्तु अब मुख्य अवधारणाओं, विचारों, अनुप्रयोगों और समस्या-समाधान पर केंग्पित होगी। यह अत्यंत आवश्यक है कि पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम, पाठ्य पुस्तक व शिक्षक प्रशिक्षण में हर स्तर पर यह ध्यान में रखा जाए कि अपेक्षित परिवर्तन का मूल आधार संवाद को अधिकाधिक बढ़ावा देने में ही निहित है। प्रश्न-प्रतिप्रश्न-परिप्रश्न की स्वीकार्यता ही कक्षाओं को रुचिकर, रचनात्मक, सहयोगात्मक और खोजपूर्ण गतिविधियों से परिपूर्ण बना सकती है। इसी से बच्चों में कल्पना शक्ति, वैचारिक क्षमता, जिज्ञासा और सर्जनात्मकता प्रस्फुटित हो सकेगी। यह अपने आप में बड़ी चुनौती है।

लेकिन कुछ चुनौतियां इससे भी बड़ी हैं, जिनके कारण अध्ययन-अध्यापन-मूल्यांकन की सम्मिलित त्रयी में अनेक व्यवधान उपस्थित हो जाते हैं। घोर प्रतिस्पर्धा के इस वक्त में हर परिवार अपने बच्चे के जीविकोपार्जन को लेकर चिंतित रहता है। उसे लगता है कि समाधान ट्यूशन, कोचिंग और अधिक से अधिक पुस्तकें खरीदकर देने में ही है। इन सबका भी बच्चों पर चिंताजनक दबाव और तनाव बढ़ता है। इसमें जीवन के सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक पक्ष पीछे छूट गए हैं और शिक्षा की संपूर्ण उपलब्धि केवल परीक्षा के प्राप्तांकों के प्रतिशत तक सीमित रह गई है।

इसकी ओर विद्वानों का और समाज का ध्यान पहले भी गया है। स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में, जिनमें तकनीकी, मेडिकल और प्रबंधन भी शामिल हैं, सामाजिकता, नैतिकता और संस्कृति से संबंधित पाठ्यचर्या के प्रावधान मिल जाएंगे। लेकिन इनका महत्त्व केवल खानापूरी तक सीमित हो जाता है। दशकों से यह हो रहा है कि देश के अधिकांश स्कूलों में विज्ञान की प्रयोगशालाओं में केवल नाम मात्र के लिए प्रयोग करने के अवसर बच्चों को मिल पाते हैं।

यह एक सजग और सतर्क पाठ्यचर्या से ही संभव होगा कि इन पक्षों को अध्यापक और प्राध्यापक अपनी अध्यापन विधा का सजग अंग बना लें! हर स्तर पर प्रत्येक अध्यापक व्यक्तित्व विकास का कार्यभार भी संभालता है। पाठ्यचर्या ही यह प्रेरणा दे सकती है कि ज्ञान के साथ उसके उपयोग की चर्चा ‘सर्व भूत हिते रत:’ के संदर्भ में की जाए। परमाणु, परमाणु बम और हिरोशिमा-नागासाकी केवल भौतिकी और एक भयंकर त्रासदी के रूप में ही पाठ्यचर्या, पाठ्यपुस्तक और कक्षा में निर्धारित पाठ के प्रस्तुतीकरण तक सीमित न रहें, इसके अध्ययन और अध्यापन के दौरान उन सभी सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों को भी लाया जाए जो इससे उभरते हैं।

पाठ्यचर्या को लेकर समय-समय पर सर्वेक्षण और विश्लेषण होते रहते हैं। कई बार यहां तक कहा जाता है कि शिक्षा की वर्तमान व्यवस्थाएं जब से प्रारंभ हुई हैं, पाठ्यचर्या निर्माण के उद्देश्य और लक्ष्य लगभग अपरिवर्तित ही रहे हैं। जानकारी, कौशल और ज्ञान की सीमाओं के आसपास ही इसको शब्दों में समेटा जाता रहा है। यदि इसे विस्तार दिया भी गया है, तो वह क्रियान्वयन के स्तर पर पीछे छूट जाता है।

भारत के नए पाठ्यचर्या निमार्ताओं के समक्ष चुनौती बहुत बड़ी है जो नीतिगत प्रावधान में पूरी तरह स्पष्ट है-‘विषयवस्तु को बढ़ाने की जगह जोर इस बात पर अधिक होने की जरुरत है कि बच्चे समस्या-समाधान और तार्किक व रचनात्मक रूप से सोचना सीखें, विविध विषयों के बीच अंतर्संबंधों को देख पाएं और नई जानकारी को बदलती परिस्थितियों में उपयोग में ला पाएं। जरूरत है कि शिक्षण प्रक्रिया विद्यार्थी केंद्रित हो, जिज्ञासा, खोज, अनुभव और संवाद के आधार पर संचालित हो, लचीली हो, समग्रता और समन्वित रूप से देखने-समझने में सक्षम बनाने वाली और रुचिपूर्ण हो।

शिक्षा विद्यार्थियों के जीवन के सभी पक्षों और क्षमताओं का संतुलित विकास करे, इसके लिए पाठ्यक्रम में विज्ञान और गणित के अलावा बुनियादी कला, शिल्प, मानविकी, खेल और स्वास्थ्य, भाषाओं, साहित्य, संस्कृति और मूल्य का अवश्य ही समावेश किया जाए। शिक्षा से चरित्र निर्माण होना चाहिए, विद्यार्थियों में नैतिकता, तार्किकता और संवेदनशीलता विकसित करनी चाहिए और साथ ही रोजगार के लिए सक्षम बनाना चाहिए।’ जो दिशा यहां पर वर्णित की गई है, उसके क्रियान्वयन के लिए पहल कदम तो यही होगा कि नई पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम आलोचनात्मक चिंतन, खोज आधारित, चर्चा आधारित और विश्लेषण आधारित ज्ञान पर विषयवस्तु और विधा को समग्र रूप से संयोजित करें।

गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ने कहा था कि हर बच्चे को दो प्रकृति प्रदत्त वरदान मिलते हैं: पहला संकल्पना की शक्ति और दूसरा विचारों की शक्ति! यदि शिक्षा व्यवस्था इन दोनों के नैसर्गिक प्रस्फुटन में अवरोधक खड़े न करे और इनका पोषण करे, तो राष्ट्र की बौद्धिक संपदा में आशातीत वृद्धि को कोई रोक नहीं सकता है।

लेकिन दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान पद्धति बच्चों को इतने बंधनों में जकड़ देती है कि वे केवल परीक्षा के लिए अध्ययन करते हैं। मनन, चिंतन के लिए उन्हें न तो अवसर मिलता है और न ही प्रोत्साहन! यदि नीतिगत अपेक्षाओं को साकार स्वरूप देना है, तो इन्हें बदलना होगा। हर बड़ा बदलाव व्यवस्था से सजगता, कर्मठता और लगनशीलता की अपेक्ष करता है। इसके लिए सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था को अध्यापक और आचार्य के अंतर को समझना होगा।

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