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अफगानिस्तान की नई चुनौती

तालिबान और पाकिस्तान दोनों को लग रहा है अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अफगान सेना कमजोर पड़ जाएगी। पाकिस्तान रणनीतिक तौर पर काबुल में मजबूत होकर भारत को पूरी तरह वहां से बाहर कर और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संतुलन बना कर अफगानिस्तान को नियंत्रित करना चाहता है।

Americanअफगानिस्‍तान में तैनात अमेरिकी सैनिक। फाइल फोटो।

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को बुलाने की समय सीमा तय कर दी है। अब इस साल 11 सितंबर तक अमेरिकी सैनिक पूरी तरह से अफगानिस्तान छोड़ देंगे। इस वक्त अफगानिस्तान में साढ़े तीन हजार अमेरिकी सैनिक हैं। हालांकि बाइडेन प्रशासन ने यह वादा किया है कि अमेरिका जरूरत पड़ने पर अफगान सेना को मदद देता रहेगा। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में भी तालिबान और अमेरिका के बीच हुए समझौते में मई 2021 तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की पूर्ण वापसी पर सहमति बनी थी।

जो भी हो, अमेरिका के इस फैसले से अफगानिस्तान में एक बार फिर संकट का नया दौर शुरू होने जा रहा है। अफगान आबादी का बड़ा हिस्सा, खासतौर से महिलाएं अमेरिकी सैनिकों की पूर्ण वापसी नहीं चाहतीं। अफगान महिलाओं को डर है कि अब तालिबान उन्हें मिले अधिकार छीन सकता है। वहीं ताजिक, हजारा और उज्बेक जनजातियां भी इस फैसले से निराश हैं। अमेरिकी सैनिकों की वापसी की खबर भारत के लिए भी चिंता का विषय है।

अफगानिस्तान में भारत के अपने आर्थिक हित हैं। तालिबान के मजबूत होने के बाद अफगानिस्तान में पाकिस्तान मजबूत होने लगेगा। चीन ने भी अफगानिस्तान में भारी निवेश कर रखा है। ऐसे में वह चाहेगा कि भारत की स्थिति वहां कमजोर हो। रूस, अफगानिस्तान के खनिज संसाधनों पर नजरें गड़ाए हुए है। गौरतलब है कि अफगानिस्तान में तांबा, लोहा, लिथियम जैसे महत्त्वपूर्ण खनिज तत्वों का प्रचुर भंडार है।

इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिकी सेना की वापसी के बाद अफगानिस्तान में तालिबान मजबूत होगा और इसका फायदा पाकिस्तान को मिलेगा। तालिबान और पाकिस्तान के संबंध जगजाहिर हैं। तालिबान के ज्यादातर कमांडर पाकिस्तान के देवबंदी मदरसों से ही निकले हैं। आइएसआइ भी इन्हें प्रशिक्षण देती है। दो दशक पहले अफगानिस्तान पर अमेरिकी हमले के बाद तालिबान के ज्यादातर कमांडर भाग कर पाकिस्तान ही पहुंचे थे। तालिबान शीर्ष कमेटी शूरा भी क्वेटा से ही संचालित होती है।

इस समय अफगानिस्तान के कुल तीन सौ पच्चीस जिलों में से छिहत्तर जिलों पर तालिबान का कब्जा है और एक सौ सत्ताईस जिले अफगानिस्तान की निर्वाचित सरकार के नियंत्रण में हैं। बाकी के बचे जिलों पर नियंत्रण के लिए अफगान सेना और तालिबान के बीच लंबे समय से संघर्ष चल रहा है। तालिबान और पाकिस्तान दोनों को लग रहा है अमेरिकी सेना की पूर्ण वापसी के बाद अफगान सेना कमजोर पड़ जाएगी। पाकिस्तान रणनीतिक तौर पर काबुल में मजबूत होकर भारत को पूरी तरह से वहां से बाहर कर और क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संतुलन बना कर अफगानिस्तान को नियंत्रित करना चाहता है।

हाल में रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान पाक हुक्मरानों ने अफगानिस्तान के भविष्य पर उनसे विस्तृत चर्चा की। अफगानिस्तान में रूस की मौजूदगी का मतलब पाकिस्तान अच्छी तरह समझता है। बेशक रूस तीन दशक पहले अफगानिस्तान छोड़ गया हो, लेकिन रूसी खुफिया एजेंसियों की मजबूत मौजूदगी आज भी वहां है। यही नहीं अफगानिस्तान से लगने वाले मध्य एशियाई देशों में रूसी की भारी दखल है। इसलिए पाकिस्तान रूस से तालमेल बना कर अफगानिस्तान में अपने को मजबूत करने की फिराक में है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान के लिए यह सब इतना आसान होगा। अमेरिकी फौज की वापसी के बाद भी पाकिस्तान को लाभ के साथ-साथ नुकसान की संभावना है। दरअसल तालिबान की मौजूदगी को अफगानिस्तान की तीन दूसरी सशक्त जनजातियां स्वीकार करेंगी, इसकी संभावना कम है। ताजिक, उज्बेक और हजारा जनजातियों की पश्तून जनजातियों के वर्चस्व वाले संगठन तालिबान से कट्टर दुश्मनी है।

अफगान सेना में भी इन तीनों जनजातियों की खासी तादाद है। ये तीनों जनजातियां पाकिस्तान को नापसंद करती हैं और लंबे समय से आइएसआइ-तालिबान गठजोड़ का मुकाबला कर रही हैं। ऐसे में अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद तालिबान और आक्रामक होगा और अफगानिस्तान में गृह युद्ध भड़केगा। अगर यह गृह युद्ध लंबा खिंच गया तो इसका सीधा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा। अफगान शरणार्थियों की भीड़ फिर से पाकिस्तान में पहुंचेगी। पाकिस्तान के सीमावर्ती खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अफगान शरणार्थियों की खासी तादाद पहले से ही है। आज भी पाकिस्तान में चौदह लाख से ज्यादा अफगान शरणार्थी हैं।

सवाल और भी हैं। पहला तो यही कि क्या तालिबान पूरी तरह से पाकिस्तान के इशारे पर चलेगा? पिछले कुछ सालों में तालिबान ने कई बार पाकिस्तान के प्रभाव से बाहर निकल कर और स्वतंत्र व्यवहार कर उसे नाराज किया है। तालिबान ने ईरान और रूस से अपने संबंध विकसित कर लिए हैं। ईरान और तालिबान के बीच गहरे रिश्तों का खुलासा तब हुआ था, जब मई 2016 में ईरान से पाकिस्तान लौटते हुए तालिबान कमांडर मुल्ला अख्तर मंसूर अमेरिकी ड्रोन हमले में मारा गया था।

पिछले साल जनवरी में अमेरिकी हमले में मारे गए ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी और तालिबान के बीच गहरे संबंध थे। अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टों में भी खुलासा हो चुका है कि ईरान तालिबान को हथियार और प्रशिक्षण उपलब्ध कराता है। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद अफगानिस्तान को लेकर ईरान क्या रुख अख्तियार करता है, इस पर भी नजरें हैं।

अफगानिस्तान की सीमा ईरान से मिलती है और यहीं से एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक रास्ता पाकिस्तान से मध्य एशिया के लिए जाता है। यह रास्ता कराची से शुरू होकर क्वेटा के रास्ते कंधार, हेरात होते हुए तुकेर्मेनिस्तान में निकलता है और फिर यहां से मध्य एशियाई देशों तक। तालिबान शासन के दौरान इस व्यापारिक मार्ग पर पाकिस्तान ने कब्जे की कोशिश की थी, लेकिन तब ईरान ने उसकी इस योजना को विफल कर दिया था।

अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद दुनिया की चिंता अफगानिस्तान में होने वाली अफीम की खेती को लेकर भी है। तालिबान का प्रभाव बढ़ने के साथ अफगानिस्तान में अफीम की खेती तेजी से बढ़ेगी। यह तालिबान की आय का सबसे बड़ा जरिया है। तालिबान अपनी आय का साठ प्रतिशत अफीम की खेती से हासिल करता है।

पूरी दुनिया में अफीम के कारोबार में नब्बे फीसद हिस्सेदारी अफगानिस्तान की ही है। हालांकि एक गलतफहमी यह है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी से अफीम की खेती पर लगाम लगा। आंकड़े बताते हैं कि अफीम की खेती को नियंत्रित करने में पश्चिमी देशों की फौजें नकारा साबित हुई। 2001 में जब अमेरिका ने अफगानिस्तान पर हमला किया, तब वहां चौहत्तर हजार हेक्टेयर में अफीम की खेती हो रही थी और उस साल अठारह सौ मीट्रिक टन अफीम हुई थी।

अमेरिकी फौजों की मौजूदगी के दौरान पिछले बीस वर्षों में अफीम की खेती तेजी से बढ़ी। 2002 में ही अफीम का उत्पादन बढ कर चौंतीस सौ मीट्रिक टन हो गया। वर्ष 2017 में तीन लाख अठाइस हजार हेक्टेयर में अफीम पैदा की गई और छह हजार चार सौ मीट्रिक टन पैदावार हुई। 2019 में भी यहीं आंकड़ा रहा। तालिबान के प्रभाव वाले हेलमंद, कंधार सहित कई प्रांत अफीम पैदावार के बड़े केंद्र हैं।

दिलचस्प बात है कि पश्चिमी ताकतों ने अफीम विरोधी सैन्य अभियान में अब तक नौ अरब डालर फूंक दिए, इसके बावजूद वहां अफीम पैदावार बढ़ती गई। आज अफगानिस्तान में यह रोजगार का बड़ा जरिया है। छह लाख अफगानियों को अफीम के कारोबार में पूर्ण रोजगार मिला हुआ है। लगभग तीस लाख अफगानी अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रुप से अफीम की खेती और कारोबार से जुड़े हैं। जाहिर है, आने वाला समय अफगानिस्तान के लिए चुनौती भरा होगा, जिसका प्रभाव पूरे दक्षिण एशिया पर पड़ेगा।

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