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संकट में हिमालय

पिछले कुछ दशकों में हिमालय के विभिन्न हिस्सों में हजारों हिमनद झीलें बनी हैं, जो अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ सकती हैं। अगर ये फटीं तो भारी तबाही मच सकती है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल ने कहा कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण वर्षा और बर्फबारी का चक्र बहुत ज्यादा गड़बड़ा गया है। खासकर दक्षिण एशियाई देशों में यह समस्या ज्यादा गंभीर हो रही है, जो अब लगातार ज्यादा घातक गर्मी का सामना कर रहे हैं।

फरवरी में हुए हादसे में भी नंदादेवी जल प्रवाह क्षेत्र में हिमनद का एक बड़ा हिस्सा गंगा नदी की सहायक नदियों में से एक धौलीगंगा में गिर गया था।

वेंकटेश दत्ता
उत्तराखंड में जोशीमठ के पास भारत-चीन सीमा से सटी नीती घाटी के सुमना में एक हिमनद के टूटने की घटना ने एक फिर सबको हिला दिया। इस साल सात फरवरी की सुबह भी इसी क्षेत्र में विशाल हिमनद टूटने से भारी तबाही मची थी। चमोली में भयंकर बाढ़ आ गई थी और सत्तर से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। एक सौ तीस लोगों का तो आज तक पता नहीं चल पाया। इन भीषण आपदाओं ने 2013 की केदारनाथ त्रासदी की यादें ताजा करा दीं।

फरवरी में हुए हादसे में भी नंदादेवी जल प्रवाह क्षेत्र में हिमनद का एक बड़ा हिस्सा गंगा नदी की सहायक नदियों में से एक धौलीगंगा में गिर गया था। धौलीगंगा नदी विष्णु प्रयाग तक बहती है, जहां धौलीगंगा और अलकनंदा नदियां मिलती हैं। इससे धौलीगंगा की सहायक नदियों में अचानक जलस्तर काफी बढ़ गया था। जब भी अचानक नदियों में हिमनद गिरते हैं तो जलस्तर बढ़ने से नदियां मिनटों में ही विकराल रूप धारण कर जाती हैं और जो भी रास्ते में आता है उसे अपने साथ बहा ले जाती हैं। धौलीगंगा में आए उफान में एक जलबिजली परियोजना तो पूरी तरह बह गई थी और पांच सौ बीस मेगावाट की तपोवन-विष्णुगढ़ जलविद्युत परियोजना को भी भारी नुकसान पहुंचा था।

उपग्रहों से मिली तस्वीरों और आंकड़ों के विश्लेषण से पता चला है कि इस क्षेत्र में हिमस्खलन की गतिविधियां बनी हुई हैं। आने वाले दिनों में ऐसी ही और घटनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। इस तरह की आपदाएं हिमनद झील के फटने (ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड- ग्लोफ) के कारण होती हैं। सामान्य झीलों के विपरीत, हिमनद झीलें ढीली चट्टानों और मलबे से बनी होती हैं। वे बहुत ही ज्यादा अस्थिर होती हैं, क्योंकि ये अक्सर बर्फ के विशालकाय पिंडों से घिरी होती हैं। विशाल हिमनद झीलों में पानी जमा होता रहता है और बड़े पैमाने पर पिघलता हुआ पानी निचले हिस्सों में अचानक भयावह बाढ़ ला देता है। ऐसी आपदाओं का पिछले कई दशकों का इतिहास देखें तो पता चलता है कि कई बार हिमनदों के टूटने से हजारों लोग मारे गए हैं और गांव के गांव बह गए।

हिमालय लगातार भारी बदलावों के दौर से गुजर रहा है। हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। पिछले साल जनवरी में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने अनुमान लगाया था कि हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में तीन हजार से अधिक हिमनद झीलें बन गई हैं। इनमें तैंतीस झीलें काफी खतरनाक स्थिति में हैं। अगर ये फटीं तो सत्तर लाख लोगों को प्रभावित कर सकती हैं। उत्तराखंड में दस वर्ग किलोमीटर से अधिक के एक हजार चार सौ चौहत्तर हिमनद हैं, जो दो हजार एक सौ अड़तालीस वर्ग किलोमीटर के बर्फ से ढके क्षेत्र में आते हैं। इन हिमनदों का भार तेजी से घट रहा है। उपग्रहों से मिली तस्वीरों से पता चलता है कि ऊपरी ऋषि गंगा जलग्रहण क्षेत्र के आठ हिमनद- उत्तरी नंदादेवी, चांगबंग, रमनी बैंक, बेथरटोली, त्रिशूल, दक्षिणी नंदा देवी, दक्षिणी ऋषि बैंक और रौंथी बैंक तेजी से पिघल रहे हैं। पिछले तीन दशकों से भी कम समय में ही ये पंद्रह फीसद तक पिघल गए हैं। उत्तराखंड में पिछले चार दशकों में तापमान में लगातार वृद्धि हुई है। अचानक आने वाली बाढ़ की तीव्रता भी बढ़ी है। बढ़ते वैश्विक तापमान से छोटे हिमनद तेजी से पिघल रहे हैं। इससे कई स्थानों पर हिमनद लटकने जैसी स्थिति में आते जा रहे हैं। साथ ही तापमान बढ़ने से इनमें दरारें भी आ रही हैं।

फरवरी में उत्तराखंड के चमोली जिले की पहाड़ियों में तापमान शून्य से नीचे रहने के बावजूद हिमनद अब क्यों टूट रहे हैं, यह सवाल मन में जिज्ञासा पैदा करता है। यह एक विसंगति है। ठंड में हिमनद मजबूती से जमे रहते हैं। यहां तक कि हिमनद झीलों की दीवारें भी कस कर बंधी रहती हैं। इस मौसम में इस तरह की बाढ़ आमतौर पर बर्फ के धंसने या फिर जमीन के धंसने के कारण होती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में ऐसी आपदाओं की संख्या तेजी से बढ़ सकती है। पूरे हिमालय के लगभग डेढ़ हजार हिमनदों में से केवल पैंतीस हिमनदों की ही ठीक से निगरानी की जा रही है। पिछले कुछ दशकों में हिमालय के विभिन्न हिस्सों में हजारों हिमनद झीलें बनी हैं, जो अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ सकती हैं। अगर ये फटीं तो भारी तबाही मच सकती है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के अंतर सरकारी पैनल ने कहा कि बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण वर्षा और बर्फबारी का चक्र बहुत ज्यादा गड़बड़ा गया है। खासकर दक्षिण एशियाई देशों में यह समस्या ज्यादा गंभीर हो रही है, जो अब लगातार ज्यादा घातक गर्मी का सामना कर रहे हैं।

चमोली आपदा स्पष्ट रूप से हिमालय पर जलवायु परिवर्तन और अनियोजित विकास के प्रतिकूल प्रभाव का परिणाम है। दो बातें स्पष्ट हैं। पहली तो यह कि जलवायु परिवर्तन ने विनाशकारी भूमिका निभाई है और अब हमें हिमालय जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में पनबिजली परियोजनाएं लगाने पर फिर से सोचना होगा। फरवरी में आई चमोली की आपदा में दो जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान को देखते हुए हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी में पनबिजली परियोजनाओं को सावधानी के साथ देखा जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन और जल प्रवाह परिवर्तनशीलता के जोखिम को कम करना महत्त्वपूर्ण मुद्दा है।

इसके लिए भविष्य के जलवायु अनुमानों की बेहतर समझ जरूरी है। ग्रामीणों ने ऋषिगंगा बिजली परियोजना को एक आसन्न आपदा के रूप में चिह्नित किया था। उत्तराखंड हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी। इसमें कहा गया था कि पर्यावरणीय मानदंडों का उल्लंघन करते हुए निर्माण संबंधी गतिविधियों के लिए विस्फोटकों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है और खनन के लिए पहाड़ों को तोड़ा जा रहा है। अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी नदी पर कोई बड़े बांध नहीं बनाए जाने चाहिए थे, क्योंकि इस क्षेत्र में बहुत खड़ी ढलानें हैं और इस कारण यह एक अत्यंत संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्र है।

हालांकि, यहां अभी भी बड़े पैमाने पर निर्माण जारी है। आज जोशीमठ और आसपास के अन्य शहरों में हजारों होटल और लोकप्रिय पर्यटन स्थल बन गए हैं। क्षेत्र की संवेदनशील पारिस्थितिकी को दरकिनार करते हुए लगातार विस्फोटकों से पहाड़ तोड़े जा रहे हैं और बांध, सुरंगें और राजमार्ग बनाए जा रहे हैं। उत्तराखंड में अस्सी से अधिक छोटे और बड़े जलविद्युत संयंत्र हैं। राज्य ने पिछले बीस वर्षों में पचास हजार हेक्टेयर से अधिक जंगल खो दिया है। चमोली सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों में से है, जहां खनन, सड़क निर्माण और बिजली-वितरण लाइनों से लगभग चार हजार हेक्टेयर जंगल नष्ट हो गए हैं।

पर्यावरण को बचाने के लिए जरूरी है कि शोध अध्ययनों की रिपोर्टों को नजरअंदाज न किया जाए। उत्तराखंड ने हाल ही में एक बाढ़ क्षेत्र मानचित्र तैयार किया है और बाढ़ के मैदानों को नियंत्रित करने के लिए ‘आपदा जोखिम मूल्यांकन’ और ‘राज्य आपदा प्रबंधन योजना’ का मसौदा तैयार किया है। जोशीमठ और बद्रीनाथ के लिए जिला आपदा प्रबंधन कार्रवाई योजना, चमोली के लिए आपदा जोखिम करने के लिए योजना और राज्य में जोखिम कम करने वाली गतिविधियों और योजनाओं के लिए नक्शों और दस्तावेजों का एक ‘उत्तराखंड रिस्क डेटाबेस’ तैयार किया है। अब जरूरी है इन सभी योजनाओं को जमीन पर उतारने की, ताकि भविष्य में किसी भी आपदा की स्थिति में जनहानि को कम से कम स्तर पर लाया जा सके।

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