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राजनीति: विनिर्माण क्षेत्र को चाहिए रियायतें

भारत की श्रमशक्ति का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यहां श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है। भारत के पास पैंतीस साल से कम उम्र की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है। ये सब विशेषताएं भारत को चीन से बाहर जाने वाले निवेश और कारोबार के मद्देनजर दूसरे देशों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण बनाती हैं।

Updated: February 1, 2021 8:37 AM
बजट मेंं वित्‍तमंत्री से नई उम्‍मीदों के साथ नई आशाएं भी जुरी हुई हैं।

जयंतीलाल भंडारी

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आगामी वित्त वर्ष 2021-22 के आम बजट में विनिर्माण क्षेत्र को कई तरह के प्रोत्साहन और रियायतें दे सकती हैं। नए बजट में विनिर्माण क्षेत्र पर खास ध्यान इसलिए भी हो सकता है, क्योंकि सरकार ने भारत को विश्व का दूसरा सबसे बड़ा विनिर्माण केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा है। अगर इस दिशा में प्रयास सफल हुए तो देश में बड़ी संख्या में नए रोजगार भी सृजित हों सकेंगे।

प्रस्तावित बजट में वित्त मंत्री विनिर्माण प्रोत्साहन के लिए उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव) का दायरा बढ़ा सकती हैं। मालूम हो कि सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र के प्रोत्साहन एवं आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाने के लिए चौबीस क्षेत्रों की पहचान की है। इनमें से अब तक बारह क्षेत्रों को पीएलआइ योजना से जोड़ा जा चुका है। अब नए बजट में बचे हुए बाकी बारह क्षेत्रों के साथ-साथ कुछ और नए क्षेत्रों को भी विनिर्माण प्रोत्साहन सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष 11 नवंबर को केंद्र सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत देश को विनिर्माण का बड़ा केंद्र बनाने के मद्देनजर पीएलआइ योजना शुरू की थी। इस योजना के अंतर्गत दस क्षेत्रों के लिए 1.46 लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन दिए गए। जिन क्षेत्रों को पीएलआइ के दायरे में लाया गया है उनमें एडवांस कैमेस्ट्री सेल (एसीसी) बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक एवं तकनीकी उत्पाद, वाहनों के कलपुर्जे, औषधि, दूरसंचार एवं नेटवर्किंग उत्पाद, कपड़ा, खाद्य उत्पाद, सौर उपकरण, एअर कंडीशनर, एलईडी और इस्पात शामिल हैं।

इसके पूर्व पीएलआइ योजना के तहत सरकार ने मोबाइल विनिर्माण और विशेष प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक पुर्जे, दवाइयां और चिकित्सा उपकरणों जैसे क्षेत्रों के लिए 51,311 करोड़ रुपए के प्रोत्साहन दिए थे। इन सभी क्षेत्रों को पांच साल के लिए पीएलआइ योजना का लाभ सुनिश्चित किया गया है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि इस योजना के तहत करीब दो लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहन सुनिश्चित किए जा चुक हैं। पीएलआइ योजना का मकसद देश को वैश्विक आपूर्ति शृंखला का अहम हिस्सा बनाना, देश में विदेशी निवेश आकर्षित करना, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना, निर्यात बढ़ाना और रोजगार पैदा करना है।

वित्त वर्ष 2021-22 के बजट में कोरोना महामारी टीके और दवाइयों के उत्पादन के लिए विशेष धन आवंटित किया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि नौ जनवरी को प्रवासी भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा भी था कि कोरोना महामारी के दौर में दुनिया ने भारत की विनिर्माण सामर्थ्य देखी है। इस समय कोरोना के भारतीय टीकों का दुनिया के कई देशों में सफलतापूर्वक उपयोग किया जा रहा है। भारत न केवल अपने देश के लिए, बल्कि दुनिया के कई देशों के लिए बड़ी मात्रा में टीकों की आपूर्ति की उत्पादन क्षमता हासिल कर चुका है।

कोविड-19 की आपदा भारत के लिए विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनने का अवसर लेकर आई है और भारत ने दवा निर्माण बढ़ा कर दुनिया के डेढ़ सौ से ज्यादा देशों को दवाइयां निर्यात की हैं।

नए बजट में स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने के लिए भी कदम उठाए जा सकते हैं। यह स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत ह्यवोकल फॉर लोकलह्ण के मंत्र को देश की जनता ने हाथों-हाथ लिया है। निमार्ताओं और उद्योग जगत द्वारा भी विश्वस्तरीय उत्पाद बनाना सुनिश्चित किया गया है। इससे आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम बढ़ रहे हैं। देश के लोग अब भारत में ही बने उत्पादों की मांग कर रहे हैं और यहां तक कि दुकानदार भी भारत में बने उत्पादों को बेचने पर जोर दे रहे हैं। ऐसे में विभिन्न क्षेत्रों में विनिर्माण बढ़ा कर जहां विभिन्न उत्पादों के निर्यात बढ़ाए जा सकते हैं, वहीं विनिर्माण क्षेत्र में चीन को टक्कर भी दी जा सकती है।

विनिर्माण, निवेश और निर्यात के मौके चीन से बाहर निकल कर भारत की ओर आ रहे हैं। इसलिए प्रस्तावित बजट में उपयुक्त प्रावधानों और व्यवस्थाओं से बड़ी संख्या में इन अवसरों का लाभ उठाने की रणनीति सुनिश्चित की जा सकती है। दरअसल, कई आर्थिक मानदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और जैव तकनीकी क्षेत्रों में तेजी से उभरता देश है।

भारतीय दवा उद्योग पूरी दुनिया में अहमियत रखता है। भारत अकेला एक ऐसा देश है जिसके पास अमेरिका के खाद्य और दवा मानक (यूएसएफडीए) द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप अमेरिका से बाहर भी सबसे अधिक संख्या में दवाइयां बनाने की इकाइयां हैं। भारत की श्रमशक्ति का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि यहां श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है। भारत के पास पैंतीस साल से कम उम्र की दुनिया की सबसे बड़ी आबादी है। ये सब विशेषताएं भारत को चीन से बाहर जाने वाले निवेश और कारोबार के मद्देनजर दूसरे देशों की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण बनाती हैं।

देश के उद्यमियों का मानना है कि भारत के लिए विनिर्माण केंद्र बनने के जो अवसर हैं, उन्हें वर्ष 2021-22 के बजट से गति दी जा सकती है। पिछले वर्ष सरकार द्वारा विनिर्माण क्षेत्र के लिए उठाए गए कदमों के साथ-साथ भारतीय उत्पादों को अपनाने के प्रचार-प्रसार से देश के उद्योगों को तेजी से आगे बढ़ने का मौका मिला है। ऐसे में यदि उद्योग और सरकार साथ मिल कर काम करें तो भारत सस्ती लागत के विनिर्माण में चीन को पीछे छोड़ सकता है और देश में दुनिया में सर्वश्रेष्ठ गुणवत्ता वाले कम लागत के उत्पाद बनाए जा सकते हैं। विनिर्माण उद्योग जितनी अधिक बिक्री करेंगे, उससे अर्थव्यवस्था में उतने ही अधिक रोजगार सृजित होंगे। भारत की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना देश में विनिर्माण के लिए नए दरवाजे खोलने वाली है।

नए बजट में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए श्रम सुधार कानूनों को लागू किए जाने संबंधी घोषणा भी की जा सकती है। गौरतलब है कि केंद्र सरकार विभिन्न श्रम कानूनों को जिस तरह चार श्रम संहिताओं में तब्दील करने की महत्वाकांक्षी योजना को आकार देने में सफल रही है, उससे भी विनिर्माण क्षेत्र को आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है।

सरकार ने इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड 2020, आॅक्यूपेशनल सेफ्टी, हैल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड 2020, कोड आॅन सोशल सिक्योरिटी, 2020 और वेतन संहिता कोड 2019 के तहत जहां एक ओर मजदूरी सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का दायरा बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर श्रम कानूनों की सख्ती कम करने और अनुपालन की जरूरतों को कम करने जैसी व्यवस्थाओं से उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहन मिलेंगे। इससे रोजगार सृजन में भी मदद मिलेगी।

भारत विनिर्माण केंद्र के रूप में तभी विकसित हो पाएगा जब लागत अन्य देशों के मुकाबले कम होगी। चूंकि कई उत्पादों के निर्माण के लिए अभी भी भारत बहुत कुछ आयात पर निर्भर है, अतएव नए बजट में उत्पादों की गुणवत्ता में बढ़ोतरी के लिए शोध एवं नवाचार पर फोकस किया जा सकता है। आगामी बजट में मेड इन इंडिया वस्तुओं की गुणवत्ता सुधारने व भारतीय उत्पादों को शोध एवं नवाचार के बल पर आगे बढ़ाने के लिए बड़ी राशि आबंटित की जा सकती है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि 2021-22 के बजट में देश को दुनिया का दूसरा विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए ठोस प्रावधान सुनिश्चित किए जाएंगे। लेकिन ये प्रयास सफल तभी होंगे जब केंद्र एवं राज्य सरकारें उद्योगों के रास्ते में जमीन, परिवहन, बिजली, कर संबंधी प्रावधान जैसी आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए कदम उठाएंगे।

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