चुनौती बनता मानसिक स्वास्थ्य

तनाव होना और गुस्सा आना एक सहज मानवीय स्वभाव है। लेकिन इन पर ध्यान नहीं दिया जाए तो मुश्किलें बढ़ती जाती हैं। आज भारत में अवसाद के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, खासतौर से बच्चों और नौजवानों में, वे इसी का नतीजा है कि हम समय रहते मानसिक व्याधियों को जान नहीं पाते।

Jansatta Editorial
चिंताजनक रूप से, हर साल 800,000 से अधिक लोग आत्महत्या के कारण मर जाते हैं। (रॉयटर्स फोटो)

मनोज निगम

आज के दौर में आबादी का बड़ा हिस्सा किसी न किसी रूप में मानसिक बीमारियों का शिकार होता जा रहा है। चिंता की बात ज्यादा इसलिए है कि अब बच्चे भी मानसिक समस्याओं की गिरफ्त में आते जा रहे हैं। कारण भले कुछ भी हों, लेकिन मानसिक समस्याओं और रोगों का तेजी से बढ़ना समाज और सरकार के लिए गंभीर चिता का विषय तो है ही। अवसाद और खुदकुशी की लगातार बढ़ती घटनाएं हालात की गंभीरता को बताने के लिए काफी हैं। कहने को पिछले कुछ समय में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गहराते संकट को देखते हुए सरकारें जागी तो हैं, पर समस्या के दायरे को देखते हुए लगता है कि लोगों को मानसिक समस्याओं से उबारने और स्वस्थ्य रखने के लिए अभी काफी कुछ करने की जरूरत है।

मानसिक स्वास्थ्य के संकट से निपटने के लिए न केवल सरकारों को बल्कि समाज को भी आगे आना होगा। इसे गंभीरता से लेने की जरूरत इसलिए भी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) पहले ही चेतावनी दे चुका है कि कुछ ही साल में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारी- अवसाद दुनिया की दूसरी बड़ी बीमारी बन जाएगी। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) की दो साल पहले की एक रिपोर्ट बताती है कि हर सात में से एक भारतीय किसी न किसी मानसिक विकार से पीड़ित है। कोविड-19 संक्रमण की दोनों लहरों की भयावहता के बाद ये आंकड़े और भी ज्यादा चौंकानें वाले हो सकते हैं।

तीसरी लहर की आशंका के चलते देश के लगभग सभी राज्यों ने अधिकांश शैक्षणिक संस्थाओं को नियम-शर्तों के साथ खोलने की अनुमति दे दी है और कुछ इसकी तैयारी में हैं। बीते बीस महीनों में समाज ने बहुत कुछ खोया है तो बहुत सारे अनुभव भी लिए हैं, सीख भी मिली हैं। इनमें वे करोड़ों बच्चे भी हैं जो स्कूल-कालेज, पढ़ाई से दूर रहे। साथ रह कर सीखने का मौका भी नहीं मिला। छोटे बच्चे स्कूल में मिलने वाले मध्याह्न भोजन से वंचित रहे। अब जब शैक्षणिक संस्थाएं खुल रही हैं तो यह भी देखने में आ रहा है कि बच्चे, शिक्षक और परिवेश वैसा नहीं रहा, जैसा महामारी से पूर्व था। ऐसे में बच्चों और शिक्षकों को अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत की देखभाल करने में सहानुभूति और सहयोग देना आज पहली जरूरत है।

इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी स्तर से लेकर तमाम संस्थाएं बच्चों, शिक्षकों, शैक्षिक कार्यकर्ताओं और आमजन के मानसिक स्वास्थ्य की उलझनों को दूर करने की दिशा में अग्रसर हो रही हैं। पिछले बीस महीनों में विभिन्न मनोचिकित्सक, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर समाज के विभिन्न तबकों से बातचीत करना और उन्हें जागरूक बनाना जरूरी है। जब तक लोगों को मानसिक बीमारियों के बारे में बताया नहीं जाता, तब तक वे इससे अनजान ही रहेंगे और दिनों-दिन मर्ज बढ़ता चला जाएगा।

मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से निपटने में एक बड़ी बाधा तो यही है कि लोगों को पता ही नहीं चल पाता कि वे किसी मानसिक व्याधि से घिरते जा रहे हैं। जब समस्या बहुत ज्यादा बढ़ जाती है तब वे किसी चिकित्सक के पास पहुंचते हैं। इसलिए आज सबसे पहली जरूरत मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोगों को जागरूक बनाने की है। साथ ही इस बात पर भी विचार होना चाहिए कि इन मुश्किल हालात में उत्साह और सकारात्मकता बनाए रखने के लिए एक दूसरे को कैसे सहयोग किया जा सकता है, स्वयं की देखभाल कैसे की जा सकती है और मानसिक तनाव से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है।

तनाव होना और गुस्सा आना एक सहज मानवीय स्वभाव है। लेकिन इन पर ध्यान नहीं दिया जाए तो मुश्किलें बढ़ती जाती हैं। आज भारत में अवसाद के मामले जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, खासतौर से बच्चों और नौजवानों में, वे इसी का नतीजा है कि हम समय रहते मानसिक व्याधियों को जान नहीं पाते। तनाव के दौरान विभिन्न प्रतिक्रियाओं के बारे में तमाम तरह के अनुभव देखने को मिलते हैं, जैसे कुछ लोग चीजें तोड़ देते हैं, तो कुछ गाली बकने लगते हैं, दरवाजा बंद करके रोते हैं, बोलना बंद कर देते हैं।

दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो तनाव की स्थिति में संगीत सुनते हैं, बाहर घूमने निकल जाते हैं, गुनगुनाते हैं। कई अध्ययनों में सामने आया है कि महामारी के दौरान चिड़चिड़ाहट बढ़ जाती है, घबराहट ज्यादा होती है और कुछ नहीं कर पा सकने की स्थिति में अपराध बोध पैदा होने लगता है। यह सब महामारी के दौरान देखा भी गया। कोरोना महामारी को लेकर लंबे समय से जिस तरह की खबरें, सूचनाएं देखने और पढ़ने को मिलती रही हैं, उससे भी एक डरावना वातावरण बन गया है। शिक्षकों में भी बच्चों में आए शैक्षिक पिछड़ेपन का सामना करने और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की सहायता न कर पाने को लेकर चिंता देखने को मिली। इसलिए महामारी ने सभी को पहला सबक यही सिखाया है कि ऐसी विपरीत परिस्थितियों में अपनी मानसिक सेहत को मजबूत बनाए रखना कितना जरूरी है।

देश-दुनिया में बीते बीस महीनों के दौरान लोगों ने जिस संकट का सामना किया है, उसमें आजीविका, स्वास्थ्य, भविष्य की चिंता, बुरे विचारों का हावी होना, भय के कारण नींद न आने की बामीरी, एकाग्रता की कमी, उम्मीदों का टूट जाना, भावनात्मक रूप से अस्थिरता जैसी समस्याएं प्रमुख रही हैं। इससे लोगों में लोगों में तनाव और तनाव जन्य बीमारियां काफी ज्यादा बढ़ी हैं। इसलिए पहला काम बच्चों से लेकर बड़ों तक को मानसिक सेहत के प्रति जागरूक करने का होना चाहिए। सामाजिक संस्थाएं, गैर-सरकारी संगठन और छोटे-छोटे समूह इस दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। कई जगहों पर ये काम हो भी रहा है।

कहने को सरकारें मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता दिवस, सप्ताह जैसे आयोजन पहले भी करती आई हैं, लेकिन ये कागजी खानापूरी से ज्यादा कुछ नहीं दिखते। इसलिए इसका बीड़ा समाज को स्वयं उठाने की आवश्यकता है। मानसिक स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या बढ़ाने की जरूरत है। लोगों को यह समझाना होगा कि हम परिस्थितियों नहीं बदल सकते, लेकिन विपरीत परिस्थितियों से निपटने की कोशिश कर हालात बदलने की ताकत तो पैदा कर सकते हैं। अगर लोग मानसिक सेहत के प्रति जागरूक हों तो जरा-सी समस्या होने पर भी डाक्टरी सलाह लेने से हिचकेंगे नहीं।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भी यह कहा गया है कि जब बच्चे कुपोषित या अस्वस्थ्य होते हैं तो वे बेहतर रूप से सीखने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिए बच्चों के पोषण और स्वास्थ्य (मानसिक स्वास्थ्य सहित) पर ध्यान दिया जाएगा। इसमें पौष्टिक भोजन, अच्छी तरह से प्रशिक्षित सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्कूली शिक्षा प्रणाली में समुदाय की भागीदारी की बात भी कही गई है। सभी स्कूली बच्चों की स्वास्थ्य जांच होगी और उनके स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जाएंगे। स्वास्थ्य में बुनियादी प्रशिक्षण जिसमें निवारक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, अच्छा पोषण, व्यक्तिगत और सार्वजनिक स्वच्छता, आपदा प्रतिक्रिया और प्राथमिक चिकित्सा को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा।

उम्मीद है कि विभिन्न राज्यों के शिक्षा विभाग नई शिक्षा नीति लागू करते समय मानसिक स्वास्थ्य के मसले पर भी सार्थक और व्यावहारिक योजना बनाएंगे और उन्हें लागू करेंगे। कहा जा रहा है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जीवन प्रत्याशा में कमी सबसे ज्यादा कोरोना महामारी के दौर में आई है। जाहिर है, मौजूदा संकट से निकलने में अभी लंबा वक्त लगेगा। ऐसे में सरकारों से मदद की उम्मीद बढ़ना स्वाभाविक है।

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