भारतीय भाषाओं का सेतु

भारत में भाषाओं के विकास के लिए बड़े-बड़े काम करने की बात तो हमेशा होती रही, लेकिन आश्चर्यजनक है कि देश में भाषाओं से संबंधित दर्जनों विभाग, विश्वविद्यालय और संस्थान होने के बावजूद संस्कृत की स्थिति दयनीय बनी हुई है। इसी तरह कई संस्थानों और हिंदी विश्वविद्यालयों का अस्तित्व राष्ट्रभाषा हिंदी को भी आज तक उसका उचित सम्मान नहीं दिला सका।

language and dialect
भारतीय भाषाओं को लेकर शोध और चिंतन जितना ज्यादा होगा, भाषाओं का विकास भी उतना ही होगा।

राजकुमार भारद्वाज
शिक्षा मंत्रालय और केंद्र सरकार ने भारतीय भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना करने का निर्णय लिया है। इस तरह के विश्वविद्यालय की स्थापना का संकल्प फलीभूत होने पर दूरगामी परिणाम आएंगे। सरकार के इस निर्णय से संस्कृत सहित कन्नड़, उड़िया, तमिल, असमी जैसी दर्जनों भारतीय भाषाओं का मान स्थापित होगा। इन क्षेत्रीय भाषाओं के ज्ञान का अनुवाद होगा और देश ही नहीं, संपूर्ण मानवता, विशेष रूप से नई पीढ़ी को साहित्य और गवेषणाओं का भरपूर लाभ मिलेगा।

भारतीय भाषा विश्वविद्यालय भारत के विलुप्त ज्ञान के शोध और क्षेत्रीय भाषाओं के लिए संजीवनी का काम करेगा। यह आंचलिक भाषाओं का सेतु बनेगा। इससे भावी पीढ़ी को ज्ञान-विज्ञान, समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र आदि की पुस्तकें अपनी मातृ भाषा में उपलब्ध हो सकेंगी और वह उन विषयों के ज्ञान को आसानी से आत्मसात कर लेगी। पश्चिम बंगाल में एक परंपरा है कि बांग्ला का विद्वान किसी भी भाषा में लिखे, लेकिन बांग्ला में अवश्य लिखेगा। यह परंपरा अन्य भाषाओं के समृद्ध होने पर अन्य क्षेत्रों में भी दिखेगी। इससे सभी भाषाओं के विद्वानों और उसके छात्रों का स्वाभिमान जगेगा। अंग्रेजी के प्रति अनावश्यक मोह का भाव कम होगा। हमें एक साथ सब भाषाओं में सभी प्रकार के ग्रंथों को पढ़ने और ज्ञान के विस्तार का मौका मिलेगा। संस्कृत के साथ तेलुगु, तमिल, उड़िया, कन्नड़ और मलयालम जैसी शास्त्रीय भाषाओं का उत्तरोत्तर विकास होगा, उनका स्वरूप निखरेगा और इन भाषाओं में हुए अदभुत और गहन अध्ययन का संपूर्ण मानवता को लाभ मिलेगा।

मातृभाषा में ही व्यक्ति ज्ञान को आसानी से व्यवहार और संस्कार में ला सकता है। वर्ष 2013 में हुए भारत के लोक भाषा सर्वेक्षण के अनुसार देश में सात सौ अस्सी भाषाएं हैं। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से एक सौ सत्तानबे लुप्त होने के कगार पर हैं और दो सौ बीस भाषाएं लुप्त हो चुकी हैं। भारत में भाषाओं के विकास के लिए बड़े-बड़े काम करने की बात तो हमेशा कही जाती रही, लेकिन आश्चर्यजनक है कि देश में भाषाओं से संबंधित दर्जनों विभाग, विश्वविद्यालय और संस्थान होने के बावजूद संस्कृत की स्थिति बहुत दयनीय बनी हुई है। इसी तरह कई संस्थानों और हिंदी विश्वविद्यालयों का अस्तित्व राष्ट्रभाषा हिंदी को भी आज तक उसका उचित सम्मान नहीं दिला सका।

देश के दो दर्जन केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से केवल एक धर्मशाला विश्वविद्यालय में ही सारे विषयों की पढ़ाई हिंदी में कराने की पहल हो पाई है और इसका हिंदी भाषी हिमाचल प्रदेश के छात्रों को स्पष्ट लाभ भी मिल रहा है। वर्ष 2011 की जनगणना में सामने आया कि भाषा मानक के स्तर पर केवल एक हजार तीन सौ उनहत्तर भाषाएं ही खरी उतरीं और इनमें से एक सौ इक्कीस भाषाएं ऐसी हैं, जिनके बोलने वालों की संख्या महज लगभग दस हजार है।

विचार का क्रम और प्रक्रिया सहज रूप से अपनी मातृ भाषा में ही प्रकट होती है। अपनी भाषा में ही रचनात्मकता पैदा होती है। ऐसे में इस भारतीय भाषा विश्विद्यालय में अनुवाद की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण होगी। यांत्रिकी, चिकित्सा और प्रबंधन जैसे विषयों की पुस्तकें भारतीय भाषाओं में अनूदित होंगी, तो स्थानीय भाषाओं का खाद-पानी भी उन्हें मिलेगा। हमें यह हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि नागार्जुन, चाणक्य, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट सब तक्षशिला से संस्कृत पढ़ कर ही अपने-अपने विषयों के प्रामाणिक विद्वान बने थे। ऐसे में संस्कृत को केवल एक भाषा मान लेना बड़ी भूल होगी।

इसी प्रकार से मातृ भाषाओं का भी व्यापक महत्त्व है। संस्कृत में अर्थ तंत्र, राजतंत्र, सैन्य तंत्र, नीति, कूटनीति, विदेश नीति सब कुछ है। केंद्रीय साहित्य अकादमी के पास बाईस भाषाओं के विभाग और ग्रंथ हैं। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, केंद्रीय हिंदी संस्थान, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, केंद्रीय भाषा संस्थान, वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली केंद्र, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, तीन केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, राष्ट्रीय सिंधी संवर्धन संस्थान और एक केंद्रीय हिंदी विश्वविद्यालय है। सभी राज्यों में उनकी स्थानीय भाषाओं की अकादमियां भी हैं। कई राज्यों में संस्कृत विश्वविद्यालय हैं। इन सबकी सामूहिक शक्ति देश की सभी भाषाओं के स्वास्थ्य को पुष्ट करेंगी और मृत भाषाएं अपने योगदान के अनुवाद के कारण पुनर्जीवित होंगी।

भाषाएं जोड़ने का काम करती हैं। देश में और यहां तक कि विदेश में ज्ञान-विज्ञान, समाज, धर्म और राजनीति के क्षेत्र में जो कुछ अपने लिए उपयोगी हो रहा है, चाहे शोध हो या नया-पुराना उपयोगी काम, उसका अनुवाद होना ही चाहिए। नव शास्त्रीय और पूर्ण शास्त्रीय पुस्तकों का अनुवाद हर हाल में होना चाहिए। पिछले दिनों एक राज्य के न्यायालय ने विद्यालयों में पठन-पाठन में अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को लेकर टिप्पणी की, ‘राज्य मातृ भाषा परिभाषित नहीं कर सकता।’ इसको लेकर अकादमिक क्षेत्रों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन ने कहा था, ‘भारतीय साहित्य एक है, यद्यपि वह अलग-अलग भाषाओं में लिखा जा रहा है।’
भर्तृहरि ने एक हजार वर्ष पूर्व कहा था, ‘मातृ भाषा में ही मूल विचार आता है और स्वाभाविक विकास होता है।’ मातृ भाषा से हम अगर विच्छेदन करते हैं, तो हम संस्कृति से विच्छेदित होते हैं।

भाषा एक विषय नहीं थी, यह व्यक्ति विकास के समग्र स्वरूप का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग थी। यह सर्वमान्य तथ्य है कि बहुभाषाओं का ज्ञाता अधिक विद्वान होता है। फिर भारतीय भाषाओं का आपस में कहीं संघर्ष नहीं है, जो यह बात कहते हैं उन्हें समझना चाहिए कि भारतीय भाषाओं का संघर्ष तो अंग्रेजी से है। ऐसे में हमें भारतीय भाषाओं को वैश्विक भाषाएं बनाने का प्रयास करना चाहिए। भारत तेजी से विश्व पटल पर आगे आ रहा है। इसमें भाषाओं का सबसे अधिक योगदान है। भारत से बाहर विश्व के एक सौ तेरह विश्वविद्यालयों में हिंदी और दर्जनों विश्वविद्यालयों में पंजाबी, मलयालम, बांग्ला, तेलुगु, तमिल आदि भाषाएं पढ़ाई जाती हैं।

अनेक देशों में संस्कृत भाषा और संस्कृत में गणित, अर्थ तंत्र, राजतंत्र, कूटनीति और अंतरिक्ष विज्ञान आदि पर शोध हो रहे हैं। भारत में गत सौ वर्षों से अधिक समय में नवाचार इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हम विज्ञान, गणित, प्रबंधन की शिक्षा विदेशी भाषा में सीख रहे हैं। वस्तुत: नवाचार का विचार मूल रूप मातृ भाषा में आता है और उसी में उसका विकास होता है। हमें इस बात पर एकमत होने की जरूरत है कि सब भारतीय भाषाओं को उनके उत्थान के लिए उन सबकी पोषक संस्कृत के गर्भनाल से जोड़ना होगा।

भारतीय भाषा विश्वविद्यालय बनाने की सोच के पीछे भारतीय संविधान की मूल भावना थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-343 से लेकर 351 तक भाषाओं के बारे में विस्तृत रूप में कहा गया है। इसका मसौदा बनाते समय अनुछेद-343 व 351 पर समिति ने खासा विमर्श किया था। भारतीय भाषा विश्वविद्यालय में संस्कृत महाकाव्य में महाभारत, रघुवंश, रामायण, पद्मगुप्त, भट्टिकाव्य सहित ज्योतिष विज्ञान, परमाणु शास्त्र, शुल्ब सूत्र, ग्रा‘ सूत्र, सिद्धांतशिरोमणि, चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और चाणक्य का नीति एवं अर्थशास्त्र आदि महान ग्रंथों, पांडुलिपियों, साहित्य और ज्ञान-सागर का पुन: मंथन किया जा सकेगा।

हमें आशा करनी चाहिए कि भारतीय भाषा विश्वविद्यालय भारत को पुन: विश्व गुरु बनाने का मार्ग प्रशस्त करने में सहयोगी साबित होगा। आज देश में कई बड़े गैर सरकारी सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक संगठन हैं, जो इस काम को गति देने और प्रचार-प्रसार में सहयोग दे सकते हैं। सरकार को सांस्कृतिक एकता, समरसता और राष्ट्र गौरव के काम को बढ़ाने के लिए ऐसे विश्वविद्यालय को पूर्ण स्वायत्ता देनी चाहिए, तभी यह वक्त की कसौटी पर खरा उतर पाएगा।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

अपडेट
X