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भुखमरी की चुनौती के बरक्स अन्न की बर्बादी

जो खाना हम बड़ी आसानी से थाली में छोड़ देते हैं या कूड़ेदान में फेंक देते हैं, उससे केवल अनाज की ही बर्बादी नहीं होती, अपितु उसे तैयार करने में खर्च हुई ऊर्जा, कार्बन, जल और पोषक तत्त्वों की भी बर्बादी होती है।

UN report, Food wastageसंयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के भोजन बर्बादी सूचकांक के मुताबिक 2019 में तिरानबे करोड़ टन खाना फेंक दिया गया। (Photo: Getty Images/Thinkstock)

सुधीर कुमार
हाल में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने भोजन बर्बादी सूचकांक जारी किया। इसमें भोजन की बर्बादी के संबंध में जो आंकड़े पेश किए गए, वे चिंताजनक हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2019 में दुनियाभर में कुल तिरानबे करोड़ दस लाख टन खाना बर्बाद हुआ, जिसमें से इकसठ फीसद खाना घरों से, छब्बीस फीसद रेस्तराओं और तेरह फीसद खुदरा क्षेत्र से बर्बाद हुआ, यानी वैश्विक खाद्य उत्पादन का करीबन सत्रह फीसद हिस्सा उपभोग के बजाय बर्बादी की भेंट चढ़ गया। हैरत की बात है कि वैश्विक स्तर पर एक व्यक्ति एक साल में एक सौ इक्कीस किलो भोजन बर्बाद कर देता है। भोजन की बर्बादी के मामले में भारत की स्थिति अन्य दक्षिणी एशियाई देशों के मुकाबले थोड़ी ठीक है, लेकिन अपने यहां एक व्यक्ति साल भर में तकरीबन पचास किलो भोजन बर्बाद कर देता है। जबकि पड़ोसी देश अफगानिस्तान में एक व्यक्ति साल भर में औसतन बयासी, नेपाल और भूटान में उनासी, श्रीलंका में छिहत्तर, पाकिस्तान में चौहत्तर, बांग्लादेश में पैंसठ और मालदीव में इकहत्तर किलो भोजन बर्बाद करता है।

दरअसल, अन्न फेंकने की आदत पूरी दुनिया में एक अपसंस्कृति का रूप ले चुकी है। विकसित, विकासशील और अविकसित सभी देशों में भोजन की बर्बादी एक गंभीर समस्या और बुराई का रूप धारण करती जा रही है। अगर इसी तरह अन्न की बर्बादी होती रही तो 2030 तक दुनियाभर में भुखमरी उन्मूलन के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा लक्षित ‘जीरो हंगर’ का लक्ष्य हासिल करना और भी मुश्किल हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया में हर एक नौ में से एक व्यक्ति पर्याप्त मात्रा में भोजन और जरूरी पोषक तत्वों से वंचित रह जाता है। आंकड़े बताते हैं कि पूरी दुनिया में एड्स, मलेरिया और टीबी जैसी बीमारियों से जितने लोग नहीं मरते, उससे कहीं अधिक लोग भूख से मर जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनियाभर में अभी गरीबों की संख्या करीब एक सौ तीस करोड़ है। विश्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में सर्वाधिक गरीब भारत में हैं।

दरअसल दिनोंदिन बढ़ती आबादी, घटती कृषि पैदावार और अन्न की बर्बादी की वजह से दुनियाभर में भूख जनित समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में करीबन पचास हजार करोड़ रुपए का अन्न हर साल बर्बाद होता है। इतना अन्न बिहार जैसे राज्य की कुल आबादी को एक साल तक भोजन उपलब्ध करवा सकता है! दिलचस्प बात यह है कि हर साल इंग्लैंड में भोजन की जितनी खपत होती है, उतना हम बर्बाद कर देते हैं! अन्न की बर्बादी से जुड़े ये आंकड़े भयावह तस्वीर पेश करते हैं। बेशक भारत दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा अनाज उत्पादक देश है, लेकिन वैश्विक भूख सूचकांक (2020) में दुनिया के सबसे ज्यादा भूख पीड़ित देशों की सूची में हम चौरानबे वें स्थान पर हैं, जबकि 2019 में एक सौ दो वें स्थान पर थे। देश में भोजन की बर्बादी रोकने के संबंध में कोई कानून नहीं है और न ही इसे रोकने को लेकर नागरिकों में पर्याप्त सजगता का भाव है। इसीलिए यह सवाल उठता है कि क्या भोजन की बर्बादी पर अंकुश लगाए बिना और कुपोषण व भुखमरी जैसी समस्याओं से निपटे बिना भारत विकसित व ताकतवर देशों की श्रेणी में शामिल हो पाएगा?

दरअसल, भोजन बर्बाद करने की प्रवृत्ति सामाजिक अपसंस्कृति का रूप ले चुकी है। शादियों, उत्सवों आदि मौकों पर आवश्यकता से अधिक भोजन थाली में ले लेना और उसे आधा-अधूरा खाकर छोड़ना फैशन बन चुका है। भोजन की बर्बादी सामाजिक और नैतिक अपराध है, लेकिन ऐसा करते वक्त हम उसके पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक प्रभावों के बारे में जरा नहीं सोचते। जो खाना हम बड़ी आसानी से थाली में छोड़ देते हैं या कूड़ेदान में फेंक देते हैं, उससे केवल अनाज की ही बर्बादी नहीं होती, अपितु उसे तैयार करने में खर्च हुई ऊर्जा, कार्बन, जल और पोषक तत्त्वों की भी बर्बादी होती है।

अनाज उपजाने के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। सूखाग्रस्त इलाकों में जहां वर्षा जल दुर्लभ होता है, वहां खेती के लिए विभिन्न जल स्रोतों से पानी जुटाया जाता है। ऐसे में अन्न की बर्बादी रोक कर हम भूमि और जल स्रोतों पर पड़ रहे अनावश्यक दबाव को कम कर सकते हैं। अन्न की बर्बादी से पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। एक शोध के मुताबिक खाने की बर्बादी की वजह से ग्रीन हाउस गैसों में आठ से दस फीसद तक का इजाफा होता है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन से जहां वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, वहीं इससे अनाज उत्पादन पर भी प्रभावित हो रहा है। इसी से जलस्रोत भी दूषित होते हैं और वे पुन: पेयजल के माध्यम से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को जन्म देते हैं।

भोजन की बर्बादी रोकने की दिशा में दुनिया के कई हिस्सों में सरकारी नीतियों और जागरूकता के जरिए अनुकरणीय पहल की जा रही हैं। दुनिया के कई देशों ने 2030 (सहस्राब्दि विकास लक्ष्य का निर्धारित वर्ष) तक भोजन की बर्बादी को आधा करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इस मुहिम में सबसे पहले आस्ट्रेलिया आगे आया। आस्ट्रेलिया में भोजन की बर्बादी से वहां की अर्थव्यवस्था को हर साल दो करोड़ डॉलर की चपत लगती है। आस्ट्रेलिया सरकार ने भोजन की बर्बादी रोकने वाली संस्थाओं को प्रोत्साहन देने के लिए अच्छा खासा निवेश किया है, ताकि अन्न की बर्बादी कम से कम हो।

इसी तरह नार्वे में जहां हर साल साढ़े तीन लाख टन भोजन कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है, आस्ट्रेलिया की राह पर चलते हुए उसने भी 2030 तक भोजन की बर्बादी को आधा घटाने का निर्णय लिया है। चीन ने भोजन की बर्बादी पर अंकुश लगाने के लिए ‘आॅपरेशन इंप्टी प्लेट’ की नीति लागू की। मालूम हो कि चीन में एक व्यक्ति एक साल में औसतन चौंसठ किलो भोजन व्यर्थ कर देता है। लेकिन इस नीति के तहत थाली में खाना छोड़ने वाले लोगों और रेस्तरांओं पर जुर्माना लगाया जा रहा है। वर्ष 2016 में फ्रांस दुनिया का पहला देश बना जिसने सुपर मार्केट को बिना बिके भोजन को बाहर फेंकने को प्रतिबंधित कर दिया था।

फ्रांस और इटली जैसे देशों में बिना बिके भोजन को दान करने पर जोर दिया जाता है। इसी तरह कोपनहेगन, लंदन, स्टॉकहोम, ऑकलैंड और मिलान जैसे बड़े शहरों में अतिरिक्त भोज्य पदार्थों का अलग से संकलन कर उन्हें जरूरतमंदों के बीच से वितरित किया जाता है। भारत में भी कई संस्थाओं ने आगे आकर ‘रोटी बैंक’ की शुरुआत की है। यह बैंक शहरों में भोजन को जरूरतमंदों के बीच बांटने का काम करता है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण खाना बर्बाद करने वाले होटल, रेस्तरांओं और शादी घरों पर पांच लाख रुपए तक जुमार्ना लगाने पर विचार कर रही है।

इस बीच अलीगढ़ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन की एक अनोखी पहल ने सबका ध्यान खींचा है। वहां के होटलों और रेस्तराओं में थोड़ा भी भोजन न छोड़ने वाले ग्राहक को बिल पर पांच फीसद की छूट दी जा रही है। वहीं, तेलंगाना के एक होटल में थाली में जूठन छोड़ने वालों से पचास रुपए जुर्माना लगाने की शुरुआत की है।

भोजन की बर्बादी पर अंकुश लगाने के लिए किए जा रहे इस तरह के प्रयोग व प्रयास सराहनीय हैं। हालांकि नागरिकों में सामाजिक चेतना जागृत करके ही इस बुराई से मुक्ति पाई जा सकती है। भोजन की बर्बादी रोकना कोई कठिन कार्य नहीं है। हम अपने विचार को विस्तृत कर तथा आदतों में बदलाव लाकर इसे रोक सकते हैं।

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