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अर्थव्यवस्था का ईंधन संकट

महामारी की पहली लहर के दौरान वैश्विक बंदी के कारण जब सारी आर्थिक गतिविधियां बंद थीं, तब कच्चे तेल की कीमत भी एकदम नीचे आ गई थी। परिणामस्वरूप 2020 में कच्चा तेल 39.68 डॉलर प्रति बैरल था और बंदी की अवधि के दौरान तो यह 11 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था। लेकिन तेल की कीमत में इस गिरावट का लाभ आम जनता को नहीं दिया गया।

महंगे होते ईंधन से जो हालात बन रहे हैं, वे अर्थव्यवस्था को किसी भी हाल में ऊंचाई पर ले जाने वाले नहीं हैं। (Photo source- Financial Express)

सरोज कुमार
आज के समय में अर्थव्यवस्था और ईंधन का संबंध कुछ उसी तरह है, जिस तरह मानव जीवन का संबंध आक्सीजन से है। भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है और दुनिया का तीसरा सर्वाधिक ईंधन खपत करने वाला देश भी। चूंकि भारत अपनी खपत का ज्यादातर हिस्सा आयात करता है, लिहाजा ईंधन की कीमत अर्थव्यवस्था को सीधे तौर पर प्रभावित करती हैं। ईंधन की कीमत बढ़ने से परिवहन और विनिर्माण लागत बढ़ती है और इसका नतीजा महंगाई के रूप में देखने को मिलता है। वाहनों की बिक्री घटती है तो अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्र भी प्रभावित होते हैं, क्योंकि वाहन उद्योग रोजगार मुहैया कराने वाला एक प्रमुख क्षेत्र है। इस स्थिति का बड़ा नुकसान आम जनता को भुगतना पड़ता है।

पिछले महीने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होने के बाद पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि का सिलसिला फिर से शुरू हो गया। मई में ही अब तक दर्जन भर से अधिक बार पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ चुकी हैं और कई शहरों में पेट्रोल सौ रुपए के पार जा चुका है। फिलहाल इसकी वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि बताई जा रही है। बेशक, कच्चे तेल की कीमत में इस समय तेजी का रुख है, लेकिन जब कीमत बिल्कुल नीचे आ गई थीं, तब भी उसका लाभ आम उपभोक्ताओं को देने के बजाय सरकार ने उत्पाद शुल्क बढ़ा कर मुनाफा अपनी जेब में रख लिया था। अब कच्चे तेल की कीमत बढ़ने पर भी सरकार उत्पाद शुल्क घटाने को तैयार नहीं है। जबकि चालू वित वर्ष के शुरुआत में यदि सरकार उत्पाद शुल्क साढ़े आठ रुपए प्रति लीटर घटा देती, तो भी 2021-22 के तीन लाख बीस हजार करोड़ रुपए के बजट अनुमान का लक्ष्य पूरा हो जाता। उत्पाद शुल्क की मौजूदा दर से सरकार को चार लाख पैंतीस हजार करोड़ रुपए की कमाई हो सकती है।

पेट्रोल और डीजल पर केंद्र के साथ ही राज्य सरकारें भी कर वसूलती हैं। मौजूदा समय में पेट्रोल की कुल कीमत का लगभग तिरसठ फीसद हिस्सा केंद्र और राज्य के कर का है। इसी तरह डीजल पर दोनों कर का हिस्सा कीमत का लगभग साठ फीसद है। महामारी के कारण लोगों की कमाई घट गई है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार देश की तेईस करोड़ आबादी गरीबी रेखा के नीचे चली गई है, जिसकी कमाई तीन सौ पचहत्तर रुपए की न्यूनतम दैनिक दिहाड़ी से भी कम रह गई है। ऐसे में पेट्रोल-डीजल की ऊंची कीमतें लोगों की जेब के साथ उनके दिल भी जला रही हैं। महंगे होते ईंधन से जो हालात बन रहे हैं, वे अर्थव्यवस्था को किसी भी हाल में ऊंचाई पर ले जाने वाले नहीं हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगातार बढ़ रही है। दुनिया के प्रमुख तेल आयातक देशों में कोरोना का टीका आ जाने और टीकाकरण शुरू हो जाने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। इससे मांग निकलने का सिलसिला बनना शुरू हुआ है। दूसरी ओर सऊदी अरब ने अमेरिका और एशिया के लिए कच्चे तेल की कीमत बढ़ा दी है। ओपेक देशों ने भी बाजार में तेजी के मकसद से तेल का उत्पादन थाम रखा है। इसके अलावा ईरान पर से अमेरिकी प्रतिबंध उठाए जाने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इन सब कारणों से कच्चे तेल की कीमत में तेजी का रुख है और इसके आगे भी बने रहने का अनुमान है।

कच्चे तेल की कीमत यदि मांग के कारण बढ़ती है, तो इसे अर्थव्यवस्था के लिए बुरा नहीं माना जाता। लेकिन कीमत में वृद्धि यदि आपूर्ति की बाधाओं के कारण होती है, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। फिलहाल कच्चे तेल की कीमत बढ़ने के पीछे दोनों ही कारण हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति अच्छी नहीं है। कच्चे तेल की कीमत बढ़ने से आयात बिल बढ़ता है और इससे राजकोषीय घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ता है। भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत के लिए चूंकि ज्यादातर आयात पर निर्भर है, लिहाजा कीमत में मामूली वृद्धि भी खजाने पर बड़ा असर डालती है।

भारत एक विकासशील अर्थव्यवस्था है। साथ ही अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे अधिक ईंधन खपत करने वाला देश भी है। लेकिन यहां ईंधन के स्रोत नहीं हैं। खपत का लगभग छियासी फीसद हिस्सा आयात होता है। वर्ष 2013 और 2015 के बीच कच्चे तेल की कीमत में भारी गिरावट का भारत को भारी लाभ हुआ था। परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2014 और 2016 के बीच राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.6 फीसद घट गया था। वर्ष 2015 में कच्चे तेल की कीमत 2014 के 93.17 डॉलर प्रति बैरल से घट कर 48.66 डॉलर प्रति बैरल हो गई थी। साल 2016 में यह और नीचे गई और कीमत 43.29 डॉलर प्रति बैरल हो गई। लेकिन 2017 में कच्चे तेल में फिर तेजी का रुख शुरू हुआ और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 50.80 डॉलर प्रति बैरल तक चली गई।

उसके बाद से ही इसमें वृद्धि का रुझान बना हुआ है। साल 2018 में कच्चा तेल 65.23 डॉलर प्रति बैरल हो गया और इसी साल एक समय कीमत 2014 से अब तक के सर्वोच्च स्तर 77.41 डॉलर तक चढ़ गई। हालांकि 2019 में थोड़ा सुधार हुआ और कीमत 56.99 डॉलर प्रति बैरल रही। महामारी की पहली लहर के दौरान वैश्विक बंदी के कारण जब सारी आर्थिक गतिविधियां बंद थीं, तब कच्चे तेल की कीमत भी एकदम नीचे आ गई थी। परिणामस्वरूप 2020 में कच्चा तेल 39.68 डॉलर प्रति बैरल था और बंदी की अवधि के दौरान तो यह 11 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया था। लेकिन तेल की कीमत में इस गिरावट का लाभ आम जनता को नहीं दिया गया।

सरकार ने उस दौरान मार्च से मई के बीच दो बार में पेट्रोल पर तेरह रुपए और डीजल पर सोलह रुपए उत्पाद शुल्क बढ़ाकर पूरा लाभ अपनी जेब में रख लिए थे। यदि उत्पाद शुल्क नहीं बढ़ाया गया होता तो आज आम उपभोक्ता थोड़ी राहत में होता। अभी भी सरकार का इरादा उत्पाद शुल्क घटाने का लगता नहीं है। मौजूदा समय में पेट्रोल पर 32.90 रुपए और डीजल पर 31.80 रुपए प्रति लीटर उत्पाद शुल्क है। राज्यों का कर अलग से है।

अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (ईआईए) के ताजा अल्पकालिक ऊर्जा परिदृश्य के अनुमान बताते हैं कि 2021 में कच्चे तेल की कीमत औसतन 60.67 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। इस लिहाज से 2021 में भारत को कच्चे तेल के लिए प्रति बैरल लगभग इक्कीस डॉलर अतिरिक्त खर्च करने होंगे। इससे चालू खाते के घाटे में बीस अरब डॉलर से अधिक की वृद्धि हो जाएगी और जीडीपी लगभग एक फीसदी से अधिक घट जाएगा। यह देश की आर्थिक सेहत के लिए ठीक नहीं है। जीडीपी में गिरावट का सबसे ज्यादा खमियाजा गरीबों को भुगतना पड़ता है, क्योंकि भारत एक ऐसा समाज है, जहां असमानता की खाई आज भी बहुत चौड़ी है।

वार्षिक जीडीपी दर में एक फीसद गिरावट का अर्थ होता है प्रति व्यक्ति मासिक आय में एक सौ पांच रुपए की कमी। जिस देश में किसानों को पांच सौ रुपए देना भी सम्मान की बात है, और जहां अतिरिक्त तेईस करोड़ लोगों की कमाई घट कर 375 रुपए की न्यूनतम दिहाड़ी से भी नीचे चली गई है, वहां मासिक आमदनी में अब और एक सौ पांच रुपए की कमी का क्या अर्थ है, इसकी गवाही आने वाले समय में अर्थव्यवस्था ही देगी। ईंधन कीमतों में उछाल अर्थव्यवस्था के लिए किसी भूचाल से कम नहीं है और रुपए का अवमूल्यन उसमें नए अर्थ जोड़ेगा।

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