इच्छा-मृत्यु बनाम कानून

इच्छा-मृत्यु के विवाद को अंतिम निराकरण तक पहुंचाना इसलिए भी जरूरी है कि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में जीवन रक्षा की ऐसी प्रणालियां विकसित हो चुकी हैं, जो जीवन और मृत्यु की कड़ी को अरसे तक उलझाए रखती हैं। चिकित्सा में निजीकरण ऐसे उपायों को और बढ़ावा दे रहा है।

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34 साल से अपक्षयी बीमारी से पीड़ित 57 वर्षीय एलेन कोक ने कहा था कि वह फेसबुक पर अपनी मौत का लाइवस्ट्रीम करेंगे। (रायटर/गोंजालो फुएंटेस)

प्रमोद भार्गव

पश्चिमी देशों के ज्यादातर नागरिक इच्छा या स्वेच्छा से मृत्यु की सुविधा देने की मांग कर रहे हैं। इसके पक्ष में जनमत भी बनता दिख रहा है। स्पेन में साल 2002 में साठ फीसद लोग चिकित्सा सहायता लेकर मौत के वरण के पक्ष में खड़े हो गए थे। जब 2019 में इसी मुद्दे पर जनमत संग्रह करवाया गया तो इकतीस फीसद लोग समर्थन में आ गए। दरअसल मृत्यु के आसान तरीके उपलब्ध होने से मौत की संस्कृति भी बदल रही है। उपचार के चलते कष्टदायी और खर्चीली मौत की ओर बढ़ने के बजाय लोग अच्छी और त्वरित मौत की अभिलाषा करने लगे हैं। कोरोना काल में ऐसी मौत की मांग और बढ़ गई, जब लोग अस्पतालों में भरा-पूरा परिवार होने के बावजूद अकेले पड़े रहे और मौत के बाद अंतिम संस्कार भी अपनों ने नहीं, परायों ने किया।

इच्छा-मृत्यु के इतिहास में तीस वर्ष पहले तक केवल स्विट्जरलैंड को छोड़ कर पूरी दुनिया में इस पर रोक थी। वर्ष 1997 में अमेरिका के ओरेगन प्रांत में सम्मान से मृत्यु के कानून का अधिकार नागरिकों को हासिल हुआ था। इसमें दो चिकित्सकों को यह प्रमाणित करने का अधिकार दिया गया था कि मरीज इच्छा-मृत्यु चुनने की स्थिति में है और उसका जीवन छह माह से ज्यादा का नहीं है।

अब इस कानून का विस्तार अमेरिका के दस राज्यों में हो गया है। इसी महीने आस्ट्रेलिया और पुर्तगाल में भी इच्छा-मृत्यु के विधेयक को स्वीकृति दे दी गई। इससे पहले अक्तूबर में ब्रिटेन के उच्च सदन हाउस आफ लार्ड्स ने भी इच्छा-मृत्यु का कानून पास कर दिया था। अब इसे हाउस आफ कामंस और सरकार के समर्थन की जरूरत है। ब्रिटेन में तीन चैथाई नागरिक इस कानून के पक्ष में हैं, लेकिन सांसद पैंतीस फीसद ही हैं। इसलिए फिलहाल इस कानून का बनना असंभव है।

यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने 2011 में व्यवस्था दी थी कि लोगों को उनकी मौत के समय और तरीके पर फैसला करने का अधिकार है। जर्मनी के सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले साल कहा था कि मृत्यु के अधिकार पर रोक लगाना असंवैधानिक है। आस्ट्रिया, चिली, आयरलैंड, इटली और उरुग्वे जैसे कैथोलिक देश इसे स्वीकार कर रहे हैं। बेल्जियम, कोलंबिया, नीदरलैंड सरकारों ने इच्छा-मृत्यु की इजाजत में मरणासन्न बच्चों को भी शामिल किया है।

इच्छा-मृत्यु की इजाजत देने पर दुनिया में बरसों से विचार चल रहा है। भारत भी इसमें शामिल है। हमारे सर्वोच्च न्यायालय ने इस परिप्रेक्ष्य में एक ऐतिहासिक फैसले में इस तथ्य को मान्यता दी है कि असाध्य रोग से ग्रस्त रोगी इच्छा-पत्र (वसीयत) लिख सकता है। न्यायालय का यह फैसला चिकित्सकों को लाइलाज मरीजों के जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देता है। अदालत ने कहा है कि जीने की इच्छा नहीं रखने वाले व्यक्ति को निष्क्रिय या मूर्छित अवस्था में शारीरिक पीड़ा सहने नहीं देना चाहिए।

अग्रिम इच्छा-पत्र लिखने की यह अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी गई है। इसमें उल्लेख है कि जब तक संसद से इस बारे में कानून नहीं बन जाता, तब तक फैसले में दिए दिशा-निर्देश प्रभावी रहेंगे। कौन किस तरह से इच्छा-पत्र लिख सकता है और किस आधार पर चिकित्सकों का बोर्ड इच्छा-मृत्यु के लिए सहमति दे सकता है, इनके आधार बिंदु फैसले में दिए गए हैं। हालांकि कुछ चिकित्सा वैज्ञानिक, मानवाधिकार और सामाजिक संगठन आज भी इच्छा-मृत्यु के विरुद्ध हैं।

जब कोई व्यक्ति गंभीर बीमारी या दुर्घटना के चलते ऐसी नीम-बेहोशी की हालत में आ जाए, उसकी स्मृति का लोप होने साथ खाने-पीने व दिनचर्याओं से निवृति की शक्ति का क्षरण हो जाए और वह अपने अस्तित्व का बोध भी न कर पाए, तो कष्टों से मुक्ति के लिए मौत जरूरी लगने लग जाती है। ऐसी स्थिति में रोगी को जीवन रक्षक प्रणाली पर टिकाए रखना उसे यातना देने की तरह है। उसके इस कष्टदायी जीवन से परिजन और शुभचिंतक भी अप्रत्यक्ष रूप से यातना भोगते हैं। परिजनों को आर्थिक बोझ भी उठाना पड़ता है।

भारत में यह मुद्दा तब देशभर में विचार व बहस का विषय बना था, जब मुंबई की नर्स अरुणा शानबाग की दयामृत्यु के लिए शीर्ष न्यायालय में गुहार लगाई गई थी। अरुणा ने बयालीस साल तक जीवन रक्षक प्रणाली पर टिके रहने की यातना भोगी। अरुणा को सामान्य अवस्था में लाने की जब सभी चिकित्सा कोशिशें व्यर्थ हो गई, तब अदालत में उन्हें इच्छा मृत्यु देने की याचिका लगाई गई थी। किंतु तब अदालत ने इसे उचित नहीं ठहराया था। 2011 में सर्वोच्च न्यायालय में इस आशय की अर्जी भी लगाई थी कि अरुणा का इलाज संभव नहीं है, लिहाजा उसे जीवन रक्षक प्रणाली से मुक्त करने की इजाजत दी जाए। लेकिन इच्छा-मृत्यु वैध है या नहीं, इसके अंतिम निष्कर्ष पर अदालत नहीं पहुंच पाई।

लिहाजा उसने निष्क्रिय अवस्था में पड़े व्यक्ति की जीवन रक्षा प्रणाली हटा कर उसे मौत का वरण करने की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देने का सवाल उठाते हुए सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी करके सलाह मांगी। इच्छा-मृत्यु पर विचार आमंत्रण करने के पक्ष में तर्क दिया कि यह मसला संविधान ही नहीं, बल्कि नैतिकता, धर्म और चिकित्सा विज्ञान से भी जुड़ा है, इसलिए इसे विचारना जरूरी है।

इसके उलट केंद्र सरकार कहती रही कि यह एक तरह की आत्महत्या है, जिसकी अनुमति भारत में नहीं दी जा सकती, क्योंकि इच्छा-मृत्यु को कानूनी मान्यता दे दी गई तो इसका दुरुपयोग हो सकता है। इसके जवाब में संविधान पीठ का तर्क था कि इसका दुरुपयोग रोकने के लिए सुरक्षा के उपाय होने चाहिए। अदालत ने कहा था कि कानून का दुरुपयोग इच्छा-मृत्यु को कानूनी दर्जा नहीं देने का आधार नहीं हो सकता है। विधि आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट में इच्छा-मृत्यु को कानूनी मान्यता के विचार का विरोध किया था।

संविधान का अनुच्छेद-21 जीवन को गरिमापूर्ण जीने का अधिकार तो देता है, लेकिन उसमें गरिमापूर्ण मृत्यु के वरण का अधिकार शामिल नहीं है। हमारे यहां असाध्य बीमारी, बेरोजगारी, गरीबी, कर्ज, पारिवारिक समस्याओं और व्यवस्थाजन्य परेशानियों से तंग आकर हर साल हजारों लोग आत्महत्या करते हैं। कई लोग तो इनमें ऐसे भी होते हैं, जो इन परेशानियों से मुक्ति के लिए जिलाधीश से लेकर राष्ट्रपति से इच्छा-मृत्यु की अनुमति मांगते हैं। जबकि इच्छा-मृत्यु और आत्महत्या दो जुदा विषय हैं।

भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) में इच्छा-मृत्यु को धारा 302 और 304 के अंतर्गत माना है। इसे आत्महत्या की धारा 306 के साथ सहभागी अपराध भी माना गया है। लेकिन यह तालमेल केवल उस अवस्था में उचित है, जब एक स्वस्थ्य व्यक्ति निराशा के चरम को प्राप्त होकर इच्छा-मृत्यु की मांग कर रहा हो। आत्महत्या की सहयोगात्मक धाराओं को नीम बेहोशी में पड़े व्यक्ति के लिए इच्छा-मृत्यु की मांग से जोड़ कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि ऐसे व्यक्ति की इलाज की सभी उम्मीदें लगभग खत्म हो चुकी होती हैं।

इच्छा-मृत्यु के विवाद को अंतिम निराकरण तक पहुंचाना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि आधुनिक चिकित्सा प्रणाली में जीवन रक्षा की ऐसी प्रणालियां विकसित हो चुकी हैं, जो जीवन और मृत्यु की कड़ी को अरसे तक उलझाए रखती हैं। चिकित्सा में निजीकरण ऐसे उपायों को और बढ़ावा दे रहा है। देश में यातायात से जुड़ी दुर्घटनाओं में ऐसे घायलों की संख्या लगातार बढ़ रही है जो वर्षों से बेहोशी में हैं।

केवल जीवन रक्षा प्रणाली के जरिए एक हद तक उनमें प्राणवायु का संचार बना रहता है। ऐसे रोगियों के उपचार से परिजन या तो कंगाल हो रहे हैं या फिर मरीजों को अस्पताल में ही छोड़ देने की बेरहमी दिखाने को विवश हो रहे हैं। बढ़ते लघु और एकल परिवारों में यह संकट और गहराता जा रहा है।

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