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महामारी और गांवों का संकट

राजनीतिक दल भी अपने फायदे के लिए देहाती व्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में गांवों की भागीदारी है, पर उसका वास्तविक लाभ राजनीतिक नेताओं-कार्यकतार्ओं को ही मिलता है, न कि सामान्य ग्रामीण जन को। स्थानीय निकाय तो बने हैं किंतु वे कुछेक असरदार लोगों को लाभ पहुंचाने के सिवाय आमजन के लिए कुछ नहीं कर सके हैं। इलाज, रोजगार या शिक्षा की समुचित व्यवस्था करने में असमर्थ रहे हैं।

ओडिशा के नुआपाड़ा जिले के एक गांव में स्वास्थ्य कार्यकर्ता। (इंडियन एक्सप्रेस फोटो)

रीतारानी पालीवाल
दुनिया को तबाह करती महामारी नए-नए रूप बदल कर हमला कर रही है। शुरुआती दौर में इसका प्रकोप संपन्न देशों पर हुआ और भारी जान-माल के नुकसान के बाद उन्होंने अपने को संभाल लिया। बचाव के पुख्ता इंतजाम भी कर लिए हैं। हमारे देश में भी जैसे ही कोरोना ने दस्तक दी। बड़ी तेजी और सख्ती के साथ इसे हराने के प्रयास किए गए। काफी लोगों ने जीवन खोया, लेकिन जल्दी ही कोरोना पर काबू पाया जा सका। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया में गरीब प्रवासियों को अपार संत्रास और अपूरणीय क्षति झेलनी पड़ी।

कोरोना से जल्दी ही मिली इस जीत से पनपे अति आत्मविश्वास के चलते हम भारतीय यह जानी-मानी कहावत भूल गए कि रोग और शत्रु को कभी कम नहीं आंकना चाहिए। जिस कोरोना-व्यवहार को अपना कर हमने महामारी को हराया था, उसे स्वयं ही उठा कर ताख पर रख दिया। नेता, प्रशासन, जनता सब भूल गए कि महामारी अभी गई नहीं है। जब मौका देखेगी फिर हमला कर देगी। आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक सभी प्रकार की गतिविधियां सब ऐसे आयोजित होने लगीं, मानो महामारी नाम की विपदा को हमने हमेशा के लिए जमीन में गाड़ दिया है। टीकाकरण की व्यवस्था की शुरुआत ने हमारे इस हौसले को और बुलंद कर दिया। हमारा ध्यान देश में स्वास्थ्य सेवाओं की खामियों का पता लगाने और उन्हें सुधार कर सुदृढ़ बनाने की बजाय अन्य-अन्य कार्यों पर लगा रहा।

इस बार महामारी ने कई गुनी ताकत से हमला बोला है। हालांकि पिछले वर्ष जैसी तुरत-फुरत पूर्णबंदी लागू नहीं की गई, क्योंकि चुनाव, कुंभ, शादी-ब्याह, सैर-सपाटे आदि अनेक तरह की गतिविधियां चालू थीं। उन्हें रोकना आसान नहीं था। इसके अलावा पिछली बार की पूर्णबंदी के दुष्परिणामों को लेकर सरकार की खूब निंदा भी हुई थी। इस बार केंद्र्र ने राज्य सरकारों को अपने यहां की स्थिति देखते हुए व्यवस्था करने का जिम्मा सौंप दिया ताकि अर्थव्यवस्था को एकदम झटका न लगे। पर इस बार कोरोना का हमला इतना जबरदस्त था कि देखते-देखते सारी स्वास्थ्य-व्यवस्था चरमरा गई है। अचानक लौटी विपदा ने बड़े से बड़े शहरों के बड़े-बड़े अस्पतालों की पोल खोल दी। सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह हुई है कि महामारी ने गांवों को अपनी चपेट में ले लिया है।

टेलीविजन खोलते ही दिखाई देता है कि बड़ी तादात में लोग जुकाम, बुखार, खांसी से पीड़ित हैं। उनकी कोरोना की जांच की समुचित व्यवस्था नहीं है। लोगों को जानकारी ही नहीं थी कि वे किसी घातक बीमारी के शिकार हैं। वे मान रहे थे कि मौसम बदलने की वजह से सामान्य जुकाम-खांसी है, दो-चार दिन में ठीक हो जाएगी। लेकिन जब एक के बाद एक घरों में मौतें होने लगीं तो समझ में आया कि वे किसी विकट महामारी के चक्रव्यूह में फंस गए हैं। इलाज की छोटी-मोटी जो भी सुविधा गावं में उपलब्ध थी, उसके सहारे कोरोना से जंग लड़ते ग्रामीण समाज की खबरें मीडिया में आने पर राज्य प्रशासन हरकत में आया। स्वास्थ्य कर्मियों की थोड़ी-बहुत टीमों ने गांव की ओर रुख किया।

मगर बुनियादी सवाल यह है कि पिछले साल-सवा साल के दौरान गांव की जनता के लिए क्या व्यवस्था की गई? स्वास्थ्य-सुविधा या जागरूकता के प्रसार को लेकर कोई व्यापक प्रयास नहीं किया गया। पिछले वर्ष जब प्रवासी मजदूर अपार यातनाएं सहते हुए, जान की बाजी लगा कर घर वापस पहुंचे तब तो स्थानीय लोगों को संक्रमण से बचाने के लिए कई जगह गांव के बाहर रहने की व्यवस्था की गई थी। चूंकि पहुंच वही सके थे जो स्वस्थ थे, इसलिए गांव बीमारी से बचे रहे। नवंबर तक आते-आते कोरोना उतार पर था। लगभग सब लोग निश्चिंत हो गए थे। महामारियों के इतिहास और विशेषज्ञों की राय से कोई भी सबक लिए बगैर मान बैठे कि हमने कोरोना को हरा दिया है। इस बात की तैयारी ही नहीं की गई कि अगर दूसरी लहर आई तो लोगों को कैसे बचाया जाएगा। और अगर यह गांवों में फैली तो उससे कैसे संभाला जाएगा।

अब जब महामारी गांवों में तेजी से फैल रही है, तब न तो बीमारी के उपचार की समुचित व्यवस्था हो पा रही है, न मृतकों के अंतिम संस्कार की। मोक्षदायिनी गंगा अपने तटों की बालू में दबी लाशों को संभाल नहीं पा रही है। प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? वास्तव में ऐसा नहीं है कि गंगा किनारे रहने वाले ग्रामवासी अपने स्वजनों की सम्मानपूर्वक अंत्येष्टि नहीं करना चाहते। मगर उनमें से बहुत से तो इतने विपन्न हैं कि स्वजनों के इलाज के लिए ही पैसा नहीं जुटा पाते, दाह-संस्कार के लिए कहां से जुटाएंगे। चूंकि मरने वालों की तादात बहुत बढ़ गई है, तो मामला पुलिस और प्रशासन को संभालना पड़ रहा है। हालांकि वे भी जगह-जगह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार करते नजर आ रहे हैं।

गांवों में चिकित्सा सुविधा का हमेशा से अभाव रहा है। महामारी की दूसरी लहर आ जाने के बावजूद गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रति शासन तंत्र के पूरी तरह से उदासीन रवैए ने स्थिति को और बदतर बना दिया है। दरअसल, पिछले कई दशकों से गांवों में कोई चिकित्सा सुविधा उपलब्ध रही ही नहीं। आजादी के बाद पचास के दशक में ही गांवों में सरकारी अस्पताल तो बनाए गए, किंतु डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी और दवाओं का सदा टोटा ही बना रहा। ग्रामीण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा पिछले सत्तर वर्षों से चरमराई हुई ही रही है। सरकारें बदलती रहीं, किंतु निष्ठा और इच्छाशक्ति के अभाव और राजनीतिक स्वार्थों के चलते इन बुनियादी सेवाओं को कारगर ढंग से सुधारा नहीं जा सका। सरकारी सेवा में तैनात डॉक्टर या शिक्षक गांवों में जाने से कतराते हैं। निजी चिकित्सा सुविधा के नाम पर गांव में वही डॉक्टर उपलब्ध होते हैं जिन्हें क्षमता के अभाव में शहर में कोई नहीं पूछता।

नतीजा, बीमारी का कोई भी संकट आने पर गांव के आदमी को शहर की ओर रुख करना पड़ता है। और शहर में इलाज के लिए मरीज को वही ले जा सकता है जिसकी जेब में चार पैसे हैं। गरीब ग्रामीण जन तो ‘गोदान’ के होरी की तरह भगवान भरोसे है। आज भी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतों पर ताले जड़े मिल जाएंगे। हाल में दिल्ली के पास ग्रेटर नोएडा के जेवर नामक स्थान पर वर्षों से बंद पड़े एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को कोविड केंद्र बनाने के लिए खोला गया। यह स्वास्थ्य केंद्र 2011 में बना था और तभी से बंद पड़ा था। यह हाल जेवर जैसी जगह का है जहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा बनने जा रहा है। बाकी ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की हालत का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

दरअसल हमारे यहां ग्रामीण जन और शहरी जन के जीवन के बीच बहुत बड़ी दूरी है। इसे सिलसिलेवार ढंग से कायम रखा गया है। शहरी आदमी ग्रामीण का अपनी जरूरतों के लिए इस्तेमाल तो करना चाहता है, करता भी है, लेकिन उसे अपना नहीं मानता। अगर ऐसा न होता तो मजदूर-कामगार वर्ग को पिछले वर्ष अपने ही देश में भूखे-प्यासे हजारों किलोमीटर पैदल यात्रा क्यों करनी पड़ती? राजनीतिक दल भी अपने फायदे के लिए देहाती व्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं।

लोकतांत्रिक व्यवस्था में गांवों की भागीदारी है, पर उसका वास्तविक लाभ राजनीतिक नेताओं-कार्यकतार्ओं को ही मिलता है, न कि सामान्य ग्रामीण जन को। स्थानीय निकाय तो बने हैं किंतु वे कुछेक असरदार लोगों को लाभ पहुंचाने के सिवाय आमजन के लिए कुछ नहीं कर सके हैं। इलाज, रोजगार या शिक्षा की समुचित व्यवस्था करने में असमर्थ रहे हैं। आज जरूरत है शहरी और ग्रामीण जीवन के बीच टूटे हुए प्रेम के धागे को पुन: जोड़ने की, ग्रामीण जन को वह सब सुविधाएं वास्तव में (केवल कागज पर नहीं) प्रदान करने की जिनका वह अधिकारी है इस देश का नागरिक होने के नाते।

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