शिक्षा व्यवस्था और बाल मनोभाव

आज बच्चों के मनोभावों की अभिव्यक्ति दम तोड़ रही है। आज स्कूल में यदि हमारा बच्चा चिंताग्रस्त है, ऊब का शिकार है, आक्रामक बन रहा है या उसका शैक्षिक प्रदर्शन कमजोर पड़ता दिख रहा है, तो हमें अपने बच्चे के दमित मनोभावों का सम्मान करते हुए उससे सीधा संवाद बनाना पड़ेगा।

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कोरोना के कारण बच्चों की शिक्षा में आया व्यवधान चुनौतियों को कई गुना बढ़ा चुका है। इसमें आई कमी को नए सोच, अधिक प्रयास और नवाचारों द्वारा ही पूरा किया जा सकेगा। (Photo- PTI file)

विशेष गुप्ता

कोरोना की दूसरी लहर के बाद अब आंशिक पूर्णबंदी और अन्य प्रतिबंध लगभग खत्म हो चुके हैं। ज्यादातर राज्यों में स्कूल भी खुल गए हैं। महामारी के इस कालखंड में बच्चे अपने परिवार के साथ अधिक रहे हैं। अभी तक बच्चों से ठीक से संवाद न होने को लेकर हम उन पर ही दोषारोपण करते रहे हैं। परंतु महामारी के दौरान अभिभावकों ने बच्चों को ठीक से समझ कर उनके साथ परिवार और स्कूल दोनों की भूमिकाएं एक साथ निभाई हैं। साथ ही बच्चों के मनोभावों को भी ठीक से समझा होगा। मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि शुरुआती दौर में बच्चे मनोभावों से परिपूर्ण होते हैं। मगर बच्चों की स्कूली शिक्षा शुरू होने और भारी भरकम पाठ्यक्रम के सामने बच्चे के मनोभाव स्कूल से स्वत: ही गायब होने लगते हैं।

आज इस बारे में चिंतन करने की आवश्यकता है कि पाठ्यक्रम से जुड़े बच्चे और उनके मनोभाव शिक्षा व्यवस्था से क्यों गायब हो रहे हैं। आज कक्षा है, पाठ्यक्रम है, गृह कार्य है, परीक्षा और उसका तनाव है, साथ में परीक्षा परिणाम से जुड़ी अभिभावकों की अपेक्षाएं भी हैं। मगर क्या कभी यह सोचा गया है कि यह संपूर्ण शिक्षा का ढांचा जिसके लिए बना है, उसकी मनोभावनाओं की भी इस शिक्षा व्यवस्था में कोई जगह है?

यही वजह है कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में बच्चे के स्वभाव अथवा उसकी आंतरिक मनोभावनाओं को जाने बिना इस तोता रटंत शिक्षा के स्वरूप से बालकों का व्यक्तित्व अनेक विसंगतियों से भर रहा है। इसलिए आज की इस चहुंमुखी वैश्विक प्रतिस्पर्धा के माहौल में बच्चों के वर्तमान शैक्षिक पाठ्यक्रम में उनके मनोभावी कौशल विकास यानी उनकी चिंता, निराशा, विरोध, तनाव व शैक्षिक उदासीनता जैसे ज्वलंत तत्वों को बिना देरी किए जोड़े जाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

हाल में आस्ट्रेलिया के सिडनी विश्वविद्यालय में 1998 से लेकर 2020 तक के शिक्षा और बाल मनोविज्ञान से जुड़े एक सौ साठ शोध अध्ययनों के विश्लेषण के साथ-साथ सत्ताईस देशों के बयालीस हजार छात्रों पर एक शोध हुआ। इस शोध के निष्कर्ष से यह सामने आया कि जिन छात्रों ने अपने मनोभावों अर्थात मन में उपजती चिंता, तनाव व निराशा इत्यादि को समझ कर और उनका प्रबंधन करते हुए अपनी तनावमुक्त पढ़ाई-लिखाई की, वे बेहतर शैक्षिक परिणाम देने में कामयाब रहे। इसके उलट जिन छा़त्रों ने अपने शैक्षिक कार्य के दौरान अपनी भावनाओं को न तो काबू किया, न ही उनका प्रबंधन किया, वे अपने शैक्षिक प्रदर्शन और हासिल में कमतर रहे।

इस शोध में स्पष्ट किया गया है कि शिक्षा में अकादमिक सफलता के लिए मनोभावी बुद्धि एक बहुत ही अहम लक्षण है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि काम का परिणाम देने के समय हमें चारों ओर से घेरने वाले अपने मनोभावों को काबू करना अथवा उनका प्रबंधन करना बहुत जरूरी है। इसी शोध से जुड़े अन्य निष्कर्ष बताते हैं कि जिन छात्रों का मनोभावों से जुड़ा बौद्धिक स्तर उच्च रहा, वे अपने शैक्षिक अध्ययन में उच्च ग्रेड पाने में पूर्ण सफल रहे।

वर्तमान शैक्षिक ढांचे की चकाचौंध में अभिभावक और बच्चे ऐसे उलझ गए हैं कि वे यह भूल ही गए कि किताबी दुनिया के अलावा भावनाओं की भी एक सतरंगी दुनिया होती है। आज का बच्चा छोटी-सी उम्र से ही अनौपचारिक पढ़ाई के पांच चरणों मसलन प्री-नर्सरी, नर्सरी, केजी (किंडरगार्डन), एलकेजी, यूकेजी जैसे स्तरों से जूझ रहा है। देखा जाए तो अनौपचाारिक शिक्षा का यह प्रतिमान पश्चिम से भारत आया है। सच यह है कि प्री-नर्सरी से यूकेजी तक की शिक्षा का यह प्रतिमान एक तरह से बच्चे को परिवार द्वारा दी जाने वाली शिक्षा का स्थानापन्न ही है।

दरअसल इस शिक्षा का प्रादुर्भाव अठारहवीं शताब्दी में औद्योगिक व्यवस्था से जन्मी फैक्ट्री व्यवस्था के आने से शुरू हुआ था और इंग्लैंड, जर्मनी, कनाडा जैसे देश इसके मुख्य केंद्र रहे। इससे जुड़ा इतिहास यह भी बताता है कि ऐसे माता-पिता जो फैक्ट्रियों में कार्यरत थे, उनके परिवार बिल्कुल एकल थे। ऐसे परिवारों में जन्मे बच्चों के लिए न तो पालन पोषण और न ही प्राथमिक शिक्षा का कोई प्रबंध था। इस प्रकार के एकल परिवारों के बच्चों के शारीरिक विकास, खेलकूद, दिमागी विकास के साथ उनके शरीर को गतिशील बनाने और उन्हें अनौपचारिक पारिवारिक माहौल देने के लिए इस प्रकार की शिक्षा का प्रबंध वहां के उद्योपतियों ने किया।

वह इसलिए ताकि ऐसे कामकाजी परिवारों के बच्चों को इन स्कूलों में परिवार जैसा माहौल मिल सके और ये कामगार बच्चों की तरफ से निश्चिंत होकर अपना कार्य कर सकें। आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम के अनेक देशों में जनसंख्या वृद्धि लगभग शून्य हो गई है। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि वहां युवाओं के मुकाबले वृद्धों की संख्या बढ़ने लगी और वरिष्ठ नागरिकों को वृद्धाश्रम में जाने को मजबूर होना पड़ा।

लिहाजा बच्चों के सामाजीकरण और उन्हें दुनियावी जिंदगी से रूबरू कराने वाला और उनके मनोभावों को समझने वाला कोई बचा ही नहीं। इस सामाजिक टूटन का फायदा इस अंग्रेजी शिक्षा ने खूब उठाया।

सच यह है कि आज एकल परिवारों में कोई बड़ा-बुजुर्ग न होने से बच्चों को शुरुआती जिंदगी का ज्ञान न मिलने की बड़ी समस्या खड़ी हो गई है। इससे जुड़ा कड़वा सच यह भी है कि परिवारों के एकल होने व उच्च मध्यम वर्ग की आमदनी में तीव्र बढ़ोत्तरी होने से ये तमाम स्कूल बाजार की तर्ज पर ऐसे परिवारों से अनौपचारिक शिक्षा देने के बदले भारी कीमत बसूलने को तत्पर हुए हैं।

परंतु बच्चों को भावनात्मक माहौल उपलब्ध कराने में ये स्कूल असफल रहे हैं। भारत जैसे देश में भी अब संयुक्त परिवार व्यवस्था तेजी से एकल परिवार में बदलती जा रही है। ऐसे में इन परिवारों के पास बच्चों को इन प्री-स्कूलों में पढ़ाने के अलावा कोई चारा नहीं रह गया है। ऐसे स्कूल बच्चों को किताबी दुनिया से अलग रख कर उन्हें मित्र बनाने, बड़ों से दूर रहने, आपसी मनमुटाव को पारस्परिक आधार पर दूर करने, अपनी भावनाओं को संप्रेषित करने के साथ-साथ अपने बारे में निर्णय करना सिखाने का दंभ भरते हैं। लेकिन असल में ऐसा दिखाई देता नहीं है।

बाल मनोविज्ञान बताता है कि पांच साल की उम्र बच्चों के विकास की सबसे संवेदनशील अवधि होती है। यह वह अवस्था है जब बच्चा परिवार और दुनियावी जिंदगी के बीच तालमेल बैठाता है। शायद यही वह समय है जब परिवार, समाज, प्रकृति, मूल्य, सामाजिक संबंध इत्यादि उसके भविष्य की दिशा तय करते हैं। निसंदेह ये संस्थाएं कामकाजी परिवारों के लिए पैसे के बलबूते स्थानापन्न बन तो गई हैं, परंतु ऐसे माहौल में पलने वाले बच्चों की सामाजिक, सांस्कृतिक व भावनात्मक नींव कमजोर हो रही है।

आज यह सामाजिक अलगाव हमें मौका दे रहा है कि हम बच्चों के साथ को साथ रखें, उनके साथ संवाद करें और उन्हें जानने की कोशिश करें। आधुनिक डे-बोर्डिंग अथवा प्री-स्कूल हमारी निजी व्यस्तम जिंदगी का सुरक्षा कवच तो हो सकते हैं, परंतु नैसर्गिक माता-पिता और परिवारों के भावनात्मक माहौल का विकल्प ये संस्थाएं कदापि नहीं हो सकतीं। आज बच्चों के मनोभावों की अभिव्यक्ति दम तोड़ रही है।

आज स्कूल में यदि हमारा बच्चा चिंताग्रस्त है, ऊब का शिकार है अथवा आक्रामक बन रहा है अथवा उसका शैक्षिक प्रदर्शन कमजोर पड़ता दिख रहा है तो इसके पीछे हमें अपने बच्चे के दमित मनोभावों का सम्मान करते हुए उससे सीधा संवाद बनाना पड़ेगा। सही मायनों में आज अभिभावकों के साथ-साथ बाल शिक्षा से जुड़े, मनोवैज्ञानिकों और नीति निर्धारकों के सामने भी यह एक बड़ी चुनौती है।

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