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समान शिक्षा का सपना

समतामूलक संसाधनों के बंटवारे के क्रम में सम्मानजनक जीवन-यापन के लिए पहली आवश्यकता शिक्षा तक पहुंच है। गुणात्मक शिक्षा के विमर्श पर पहुंचने से पहले शिक्षा के संख्यात्मक विकास और प्रसार को सार्वभौमिक बनाना होगा। सबको शिक्षा और समान शिक्षा के लिए अनगिनत आयोगों, रिपोर्ट और दस्तावेजों की वकालत के बावजूद स्कूलीकरण के आंकड़े प्रोत्साहनजनक नहीं हैं।

Ambedkarसांकेतिक फोटो।

नवनीत शर्मा

बाबा साहेब आंबेडकर की स्मृति और इतिहास हमें भविष्य की ओर प्रशस्त करते हैं। साथ ही, यह दुनिया कैसी हो, इसका स्वरूप कैसा हो, मनुष्य में कितनी और कैसी मनुजता हो, इसे भी रूपांकित करते हैं। बराबरी का समाज बने, जहां धर्म, जाति, नस्ल, लैंगिकता, भाषा, राष्ट्रीयता, वर्ण जैसे भेदभाव न हों, यह कल्पनीय जरूर लगता है, पर असंभाव्य नहीं।

बाबा साहेब का समाज-दर्शन ऐसे आदर्शवादी समाज का न केवल बिंब रचता है, वरन उसकी बुनियाद और संरचना भी उकेरता है। समता और समानता के भेद को चिह्नित करते हुए बाबा साहेब ने माना कि केवल सबको एक समान मान लेने भर से बात नहीं बनेगी, संसाधनों का बंटवारा समतामूलक होना चाहिए। समतामूलक संसाधनों के बंटवारे के क्रम में सम्मानजनक जीवन-यापन के लिए पहली आवश्यकता शिक्षा तक पहुंच है। गुणात्मक शिक्षा के विमर्श पर पहुंचने से पहले शिक्षा के संख्यात्मक विकास और प्रसार को सार्वभौमिक बनाना होगा। सबको शिक्षा और समान शिक्षा के लिए अनगिनत आयोगों, रिपोर्ट और दस्तावेजों की वकालत के बावजूद स्कूलीकरण के आंकड़े प्रोत्साहनजनक नहीं हैं।

वर्गभेद से परे वर्णभेद और जातिगत भेदभाव आज भी दलितों को स्कूल की दहलीज से बहिष्कृत करते हैं। दलित शिक्षा का इतिहास तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहला चरण, स्वतंत्रता पूर्व दलित शिक्षा के आंदोलन का प्रयास उन्हें स्कूल तक लाने के लिए था। दूसरे चरण में उन्हें कक्षा के भीतर तक लाने की कोशिशें हुर्इं। हालांकि आज भी दलित छात्रों से भेदभाव या मध्याह्न भोजन के दौरान भेदभाव जैसी खबरें मिलती ही रहती हैं।

तीसरा चरण दलितों को कक्षाई विमर्श में भागीदार बनाने या दलित ज्ञानमीमांसा रचने के सवाल पर पहुंचाता है। ‘प्रथम’ के ‘असर’ रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार आज भी इक्यावन फीसद दलित विद्यार्थी स्कूल को बीच में ही छोड़ देते हैं। यह एक और भिन्न विमर्श को जन्म देता है कि विद्यार्थी स्कूल ‘छोड़’ देते हैं, अथवा स्कूलीकरण की प्रक्रिया में कुछ ऐसा है कि शत-फीसद नामांकन के बाद पाठ्यक्रम, शिक्षायी माध्यम, अध्यापकों और सहपाठियों का व्यवहार और शिक्षा व्यवस्था की ढांचागत कमियों की वजह से विद्यार्थी स्कूल छोड़ देने को मजबूर हो जाते हैं।

आंकड़ों के अनुसार सरकारी स्कूलों में उनतालीस फीसद दलित अध्यापकों के रिक्त पद हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित भागीदारी की एक भिन्न दारुण कथा है जिसकी बानगी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के इस खुलासे में मिलती है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में कुल मिला कर 38.42 फीसद आरक्षित पद खाली हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों में मात्र पंद्रह फीसद दलित विद्यार्थी नामांकित हैं। इन संस्थानों में आइआइटी और आइआइएम जैसे विशिष्ट संस्थानों में दलित पहुंच के आंकड़ों की नगण्यता भयावह है।

आर्थिक वर्गभेद की सैद्धांतिक अवधारणा में कम से कम शिक्षा से ‘पढ़ोगे, लिखोगे बनोगे नवाब’ जैसी संभावना तो बनती है, परंतु वर्ण या जाति भेद में किसी भी प्रकार की गतिशीलता संभव नहीं है। हम धर्म बदल सकते हैं, परंतु जाति नहीं और भारतीय उपमहाद्वीप में ‘जाति’ अस्तित्व की प्राथमिक परिचायक है। व्यक्ति जाति में जन्म ही नहीं लेता, बल्कि मरता भी उसी में है।

जाति से मुक्ति का शास्त्रगत एक ही मार्ग है कि जिस जाति में जन्म हुआ हो उसी के अनुसार शिक्षा, व्यवस्था, विवाह और अंतिम संस्कार हो। शायद इसीलिए बाबा साहेब आंबेडकर ने लिखा कि ‘जाति श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है’। वर्ष 2012 में हुए एक अध्ययन के अनुसार सभी कंपनियों के बोर्ड में तिरानवे फीसद सवर्ण सदस्य हैं। संख्याबल के आधार पर दलितों की ‘बाजारी क्षमता’ अधिक होने के बावजूद शायद ही किसी भारतीय कॉरपोरेट घराने ने जातिगत भेदभाव मिटाने के लिए कोई मुहिम छेड़ी हो, याद नहीं पड़ता।

आर्थिक स्तर पर दलित हिस्सेदारी की बात की जाए तो कुल कृषि योग्य भूमि में से मात्र साढ़े आठ फीसद भूमि पर दलितों का मालिकाना हक है और यह कथित जमींदारी उन्मूलन और भूदान आंदोलन के नतीजे हैं। इस मालिकाना हक में भी इकसठ फीसद दो हेक्टेयर से भी कम भूमि पर है और बाकी तो एक हेक्टयर भूमि भी नहीं रखते। इसी अवस्था के कारण दिहाड़ी मजदूरों में तिरसठ फीसद दलित आबादी है और बेरोजगारी के आंकड़ों में ‘सामान्य’ से डेढ़ फीसद से अधिक का फासला है, परंतु डिप्लोमाधारी बेरोजगारों के आंकड़े में यह सामान्य वर्ग से दोगुना है।

डिप्लोमाधारी सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी यदि सात फीसद बेरोजगारी का दंश झेल रहें हैं तो 14.7 फीसद डिप्लोमाधारी दलित बेरोजगार हैं। एक और अध्ययन के अनुसार भारत सरकार के सचिव के पद स्तर पर फिलहाल एक भी दलित नहीं है और सबसे ऊपरी पायदान के पांच सौ अधिकारियों में से मात्र तीन ही दलित हैं। ये आंकड़े उस आर्थिक असमानता और विषमता को दशार्ते हैं जिसके अनुसार एक सौ दस दलित सीवर और सेप्टिक टैंक को साफ करने के दौरान 2019 में मारे गए और सरकारी गिनती के अनुसार अभी भी बयालीस हजार लोग सर पर मैला ढोने के काम में लगे हैं।

अवसरों की समानता की इन गहरी विषमताओं में शिक्षा, भूमि, रोजगार से परे दिहाड़ी मजदूरी, बेगारी, अस्पृश्य कामगारी के बीच न्याय और अन्याय की संकल्पनाओं में कोई भी विभाज्य रेखा नहीं बचती। न्याय व्यवस्था को यदि समतामूलक समाज बनाने के लिए अवश्यंभावी मान कर देखा जाए तो भारतीय अदालतों में लंबित चार करोड़ मामलों में सुप्रीम कोर्ट के प्रत्येक न्यायाधीश को दो हजार, हाईकोर्ट के प्रत्येक न्यायाधीश को साढ़े-चार हजार और सत्र न्यायालयों में प्रति न्यायाधीश को डेढ़ हजार मुकदमे सुनने की जिम्मेदारी है और प्रत्येक वर्ष लगभग चार करोड़ ही नए मुकदमे दाखिल होते हैं।

ऐसी अवस्था में न्याय व्यवस्था में दलित भागीदारी और दलितों के प्रति जातिगत हिंसा और अपराध की सुनवाई के आंकड़े अलग ही दास्तान कहते हैं। वर्ष 2019 में जातिगत हिंसा और अपराध के छियालीस हजार मामले दर्ज हुए, औसतन एक सौ छब्बीस मामले प्रतिदिन और प्रतिघंटे पांच दलित उत्पीड़न के मामले दर्ज हुए हैं, जिनमें प्रत्येक सोलह में से केवल एक का ही निपटारा प्रतिवर्ष हो पाता है, जैसा कि आंकड़े बताते हैं।

महिलाओं और दलित बच्चों के साथ प्रतिदिन दस दुष्कर्म के मामले दर्ज होते हैं। इन आंकड़ों के संदर्भ में पुलिस व्यवस्था में दलित हिस्सेदारी को देखा जाए तो दलित उत्पीड़न के सर्वाधिक मामले दर्ज होने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में अड़सठ फीसद दलित पद पुलिस विभाग में रिक्त हैं, जबकि हरियाणा में उनसठ फीसद, बिहार में अड़तालीस फीसद और राजस्थान में बयालीस फीसद पुलिस विभाग में दलित पद नियुक्तियों की बाट जोह रहे हैं। न्याय के समतामूलक होने में और उस तक पहुंच के लिए पुलिस बल और न्याय तंत्र में दलित भागीदारी का बढ़ना अनिवार्य है, वरना प्रतिदिन छह दलित महिलाओं से बलात्कार और दर्ज मामलों में मात्र दो फीसद के निपटारे, समाज को किसी आतंरिक अराजकता के कगार पर ला सकते हैं।

बाबा साहेब आजीवन मजदूरों, स्त्रियों, दलितों और सभी शोषितों और वंचितों के लिए प्रयास करते रहे। संविधान के निरूपण से लेकर उसमें परिवर्तन के भी पक्षधर रहे। उनका मानना था कि जो समाज ‘रुक’ जाता है वह सड़ने लगता है। आंबेडकरवाद निरंतर प्रगति और मनुजता के उत्थान का वाद है। वे तमाम संघर्ष जो बाबा साहेब ने किए, इसी बात को लेकर केंद्रित थे कि आने वाली पीढियां अत्याचार से मुक्त हों। बाबा साहेब ने चेताया था कि बुद्धवाद की तरह किसी भी एक व्यक्ति में देवत्व का निहित होना निरंकुशवाद को भी जन्म दे सकता है। शिक्षा, समता और न्याय की कोई भी प्रगतिशील अवधारणा का विमर्श अभी तक आंबेडकरवाद से परे नहीं जा सका है।

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