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अटकी सांसों की संजीवनी

महामारी के शुरुआती दौर में भी चिकित्सा क्षेत्र के लिए महज पंद्रह फीसद ऑक्सीजन का उत्पादन हो रहा था, जबकि बाकी ऑक्सीजन स्टील व ऑटोमोबाइल के क्षेत्र के लिए बनाई जा रही थी। लेकिन अब हालात पलट चुके हैं। गंभीर मरीजों को बचाने के लिए अस्पतालों को भारी मात्रा में ऑक्सीजन चाहिए। पर चिकित्सकीय उद्देश्यों से मांग बढ़ने पर आॅक्सीजन का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। इसके लिए काफी ज्यादा पूंजी और उन्नत तकनीक की जरूरत होती है।

कानपुर में ऑक्सीजन की आपूर्ति और रिफिलिंग स्टेशनों के बाहर लंबी लाइनें हैं। (फोटो-अवनीश मिश्रा- इंडियन एक्सप्रेस)

अभिषेक कुमार सिंह
बीते डेढ़ साल में पहला मौका है जब पूरी दुनिया भारत को कोरोना महामारी से देश को कांपते-हांफते देख रही है। जब अमेरिका, ब्राजील, ब्रिटेन जैसे देशों में महामारी चरम पर थी, तब भारत में हालात काबू में आते दिख रहे थे। लेकिन इस साल अप्रैल का महीना आते और बीतते-बीतते लगने लगा कि संसाधन कम पड़ गए हैं, समूचा तंत्र चरमरा गया है और जनता के सामने बेबस होकर संक्रमण से लड़ते हुए मरने के सिवा कोई और रास्ता नहीं बचा है। ऐसा क्यों हुआ, कैसे हुआ- इन सवालों को जवाब मुश्किल नहीं हैं। मरीजों की दी जाने वाली अहम दवाओं की किल्लत, अस्पतालों में कम पड़ते बिस्तर और फेफड़ों के संग उम्मीदों को जिलाए रखने वाली ऑक्सीजन का टोटा- इन सबने हालात इतने बदतर कर दिए कि लाशों के ढेर के आगे श्मशान छोटे पड़ रहे हैं।

देश की राजधानी दिल्ली तक में हालात इतने भयावह हैं कि यहां मरीजों को बचाने से बड़ा सवाल यह बन गया कि मृतकों का अंतिम संस्कार भी समय पर कैसे हो। इसके लिए भी मृतकों के परिजनों को बीस-बीस घंटे इंतजार करना पड़ रहा है। जहां तक कोरोना पीड़ितों को बचाने की बात है, तो टीका, दवाओं और उनके असर का इंतजार फिर भी किया जा सकता था, लेकिन जब मरीजों को अस्पतालों में भर्ती होने को जगह न मिले, उसमें भी बिस्तर पर पड़े बीमारों की ऑक्सीजन आपूर्ति रुक जाए, तो हताशा और बेबसी के स्तर का अंदाजा लगाया जा सकता है। सार यह है कि दूसरी लहर ने मरीजों के इलाज से जुड़े हर संसाधन का गला घोंट डाला।

सवाल है कि अचानक ऐसा क्या हुआ कि विश्व में सबसे पहले कोरोना टीका बना लेने और टीका मैत्री जैसे अभियानों से दुनिया के दर्जनों देशों की मदद के लिए हाथ बढ़ाने वाले भारत को अब अपनी मदद के लिए दूसरे मुल्कों की तरफ देखना पड़ रहा है। सिर्फ गूगल के सुंदर पिचाई का दिल ही भारत की दशा देख कर नहीं टूट गया है, बल्कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख टेड्रॉस एडहॉनम गैब्रिएसस भी यह कहने को मजबूर हुए हैं कि भारत की स्थिति दिल तोड़ने से भी कहीं अधिक बुरी है।

एक के बाद बीतता हर हफ्ता कोई उम्मीद जगाने और ढांढ़स बंधाने की बजाय और बड़ी अनहोनियों की आशंका जगा रहा है। हर शख्स यह कहता नजर आ रहा है कि कुंभ मेले, चुनावी रैलियों के अलावा शादियों, त्योहारों, पार्टियों में शिरकत के रूप में सरकार, तंत्र और आम जनता के स्तर पर जो गंभीर लापरवाहियां पिछले कुछ महीनों में हुईं, उसने दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देशों में से एक भारत का आत्मविश्वास डगमगा दिया। खासतौर से प्राणवायु ऑक्सीजन का संकट ऐसा है, जिसकी मांग और आपूर्ति में कायम भारी अंतर ने शायद असंख्य लोगों को असमय मौत के मुंह में धकेल दिया।

ऑक्सीजन के मौजूदा संकट की कई परतें हैं। इसमें प्राणवायु का फैक्ट्रियों में निर्माण, कारखानों और अस्पतालों में इसका इस्तेमाल, ढुलाई और महामारी में अचानक बढ़ी जरूरत जैसे मुद्दे शामिल हैं। मोटे तौर पर फैक्ट्री से लेकर अस्पताल तक हर जरूरत के लिए देश में आॅक्सीजन की उत्पादन क्षमता सात हजार दो सौ सत्तासी मीट्रिक टन प्रतिदिन है। यह मात्रा सामान्य दिनों में चिकित्सा व औद्योगिक दोनों उपयोग के लिए पर्याप्त रहती है। लेकिन महामारी के दूसरे दौर के चंद दिनों में ही चिकित्सा उपयोग में मांग चार गुना से भी ज्यादा बढ़ गई।

यहां तक कि 12 अप्रैल, 2021 तक ऑक्सीजन की जो मांग सिर्फ तीन हजार आठ सौ बयालीस मीट्रिक टन रोजाना थी, वह 22 अप्रैल को बढ़ कर ठह हजार सात सौ पिच्यासी मीट्रिक टन जा पहुंची और इसके बाद हर दिन इसमें और इजाफा होता रहा। महामारी के शुरुआती दौर में भी चिकित्सा क्षेत्र के लिए महज पंद्रह फीसद आॅक्सीजन का उत्पादन हो रहा था, जबकि बाकी आॅक्सीजन स्टील व
ऑटोमोबाइल के क्षेत्र के लिए बनाई जा रही थी। लेकिन अब हालात पलट चुके हैं। गंभीर मरीजों को बचाने के लिए अस्पतालों को भारी मात्रा में आॅक्सीजन चाहिए। पर चिकित्सकीय उद्देश्यों से मांग बढ़ने पर आॅक्सीजन का उत्पादन बढ़ाना आसान नहीं होता। इसके लिए काफी ज्यादा पूंजी और उन्नत तकनीक की जरूरत होती है।

फिर समस्या यह भी है कि कोरोना काल में देश में सैनेटाइजर, मास्क और पीपीई किट उत्पादन के क्षेत्र में तो नए उद्यमी उतरे हैं, मगर आॅक्सीजन उत्पादन नहीं बढ़ सका है। हालांकि सरकार ने अब हालात बेकाबू होते देख उत्पादन बढ़ाने के प्रयास शुरू किए हैं और तूतीकोरिन स्थित वेदांता जैसी कंपनियों के बंद पड़े संयंत्र चालू करवा कर उसमें फिलहाल ऑक्सीजन निर्माण की इजाजत दे दी है। पर्यावरणीय कारणों से इस संयंत्र को बंद करवा दिया गया था। फिलहाल भारत में आॅक्सीजन का उत्पादन करने वाली सिर्फ पांच सौ फैक्ट्रियां हैं। पर इनमें रातों-रात उत्पादन बढ़ा पाना संभव नहीं है।

आॅक्सीजन का उत्पादन कैसे बढ़े, इसके लिए आॅक्सीजन उत्पादन का गणित समझना जरूरी है। पृथ्वी की संरचना, वायुमंडल और यहां तक कि प्राणियों के शरीर के दो-तिहाई हिस्से में आॅक्सीजन रहती है। हमारे वायुमंडल में आॅक्सीजन की मात्रा तकरीबन इक्कीस फीसद है। ज्यादातर पेड़-पौधे कार्बन डाई-आॅक्साइड सोख कर आॅक्सीजन प्रदान करते हैं। लेकिन औद्योगिक और चिकित्सकीय इस्तेमाल के लिए आॅक्सीजन हासिल करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया जटिल होती है। सरल शब्दों में कहें तो दबाव डाल कर हवा को तरल बनाया जाता है और फिर तरल हवा के घटकों को अलग करते हुए नीली रंग की तरल आॅक्सीजन प्राप्त की जाती है।

यह आॅक्सीन बेहद ठंडी होती है, इसका तापमान शून्य से एक सौ तिरासी डिग्री सेल्सियस कम होता है। आॅक्सीजन को द्रव रूप में कायम रखने के लिए इस तापमान को बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होता है। ध्यान रहे कि भंडारण और आसानी से ढोने के उद्देश्य से गैसों को तरल रूप में ही रखा जाता है।

फिर समस्या इसकी ढुलाई और भंडारण की भी है। फैक्ट्री से अस्पतालों तक आॅक्सीजन की आपूर्ति और फिर वहां सिलेंडरों को बदलने व भरने का काम आसान नहीं है। तरल आॅक्सीजन ज्वलनशील होती है, इसलिए टैंकर दुर्घटनाग्रस्त न हो, इसे लेकर काफी सावधानी बरती जाती है। आॅक्सीजन फैक्ट्री में एक टैंकर भरने में तीन घंटे का समय लगता है। ऐसे में अस्पताल तक आॅक्सीजन लाने और फिर उससे सिलेंडरों को भरने-बदलने का काम जोखिमभरा होता है। यही वजह है कि जब किसी अस्पताल में कमी पड़ने पर आॅक्सीजन आपूर्ति का दबाव घट जाता है, तो अस्पताल प्रशासन चाह कर भी कोई फौरी इंतजाम नहीं कर पाता। ऐसे में कुछ ही अंतराल पर वेंटिलेटर और आॅक्सीजन पर निर्भर मरीज काल के गाल में समा जाते हैं।

आॅक्सीजन ढोने में खास तरह के क्रायोजेनिक टैंकरों का इस्तेमाल होता है। आॅल इंडिया इंडस्ट्रियल गैस मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन के आंकड़े बताते हैं कि भारत में फिलहाल आॅक्सीजन ढोने वाले टैंकरों की संख्या डेढ़ हजार के आसपास ही है। यही वजह है कि आपात स्थिति में ग्लोब मास्टर जैसे विमान और रेलवे की आॅक्सीजन एक्सप्रेस चलाने जैसे उपायों को आजमाया जा रहा है। मौजूदा हालात और कोरोना की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए देश में मेडिकल आॅक्सीजन की मांग और बढ़ सकती है। कोरोना से निपटने को लेकर स्वास्थ्य तंत्र में अभी तक जिस किस्म की लापरवाही और अनदेखी का आलम रहा है, उसमें आॅक्सीजन उत्पादन और मांग के मुताबिक आपूर्ति के परिदृश्य में किसी तब्दीली की गुंजाइश तभी दिखती है जब देश की ज्यादातर आबादी का टीकाकरण हो जाए। यही वजह है कि सरकार ने अब पहली मई से अठारह साल पूरी कर चुके हर व्यक्ति को कोविड-वैक्सीनें लगाने की छूट दी है। उम्मीद है कि इससे आबादी के बड़े हिस्से को राहत की आॅक्सीजन मिल सकेगी।

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