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कैसे दुरुस्त हो स्वास्थ्य क्षेत्र

यह हैरानी की बात है कि हम अपनी कुल जीडीपी का दो फीसद भी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करते। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के सामान है। स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का वैश्विक स्तर छह फीसद माना गया है। लेकिन, नई स्वास्थ्य नीति 2017 के अनुसार भारत ने 2025 तक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च जीडीपी का ढाई फीसद करने का लक्ष्य रखा है। छह फीसद का आंकड़ा कब भारत हासिल करेगा, यह कोई नहीं जानता।

Covid, Vaccinationमुंबई में गुरुवार को बीकेसी जंबो कोविड -19 टीकाकरण केंद्र के सामने लंबी लाइन में खड़े लोग। (एक्सप्रेस फोटो: प्रदीप दास)

कोरोना एक गंभीर वैश्विक महामारी बन चुकी है। इस आपदा के आने के बाद पिछले एक साल में दुनिया के तमाम देशों की स्वास्थ्य सुविधाओं की असलियत भी सामने आ गई और इसने यह अनुभव करा दिया कि अगर कोई ऐसी गंभीर आपदा आती है तो उसका सामना करने के लिए हम कितने तैयार हैं। अचानक हुए कोरोना विस्फोट से दुनिया के संपन्न और विकसित कहे जाने वाले देशों तक के पसीने छूट गए। इसलिए सबसे पहली प्राथमिकता स्वास्थ्य क्षेत्र को दुरुस्त बनाने की महसूस की गई। भारत भी उन देशों में है जिन्होंने आपदा आने के बाद अपनी स्वास्थ्य सेवाओं के ढांचे में सुधार को प्राथमिकता देने का फैसला किया है।

आज भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं की जो स्थिति है, वह संतोषजनक तो क्या पर्याप्त भी नहीं है। ऐसे में यही सवाल है कि क्या हम मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं के बूते कोरोना महामारी या भविष्य कती ऐसी ही चुनौतियों से से जंग लड़ पाएंगे? भले सरकार ने कोरोना से लड़ने के लिए अस्पताल तैयार किए हैं, बड़ा निगरानी तंत्र बनाने की दिशा में तैयारियां चल रही हैं, पर फिर भी गुणवत्ता और खर्च के आधार पर देखा जाए तो भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर कमतर ही है। यही वजह है कि आज स्वस्थ भारत का निर्माण बड़ी चुनौती बन गई है। अगर कुछेक शहरों को छोड़ दें तो बाकी शहरों और ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं केवल नाम की हैं। फिर भी पिछले एक साल में इतना बदलाव तो आया है कि देश में कोरोना संक्रमितों की जांच और उपचार में सरकारी अस्पतालों ने बड़ी भूमिका निभाई है।

वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक 2019 के अनुसार गंभीर संक्रामक रोगों और महामारी से लड़ने की क्षमता के पैमाने पर भारत विश्व के एक सौ पनचानवे देशों में सत्तावनवें स्थान पर आता है। नेशनल हेल्थ प्रोफाइल 2019 के अनुसार भारत में केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित तकरीबन छब्बीस हजार सरकारी अस्पताल हैं। सरकारी अस्पतालों में पंजीकृत नर्सों और दाइयों की संख्या लगभग साढ़े बीस लाख और मरीजों के लिए बिस्तरों की संख्या सात लाख तेरह हजार के करीब है। जबकि देश की आबादी एक सौ पैंतीस करोड़ के लगभग है। ऐसे में प्रत्येक एक लाख की आबादी पर मात्र दो अस्पताल हैं। प्रति छह सौ दस व्यक्तियों पर मात्र एक नर्स है। प्रति दस हजार लोगों के लिए मुश्किल से छह बिस्तरों का औसत है। स्पष्ट है कि आबादी को देखते हुए भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र की स्थिति बेहद कमजोर है। इसीलिए कोरोना जैसी महामारी से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को न केवल बड़े स्तर पर रणनीति बनानी होगी, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भारी निवेश भी करना होगा।

यह कोई छिपी बात नहीं है कि सरकारी अस्पतालों में जरूरी दवाओं और चिकित्सकों की भारी कमी है। इसी कारण स्वास्थ्यकर्मियों पर काम का दबाव रहता है। फिर चिकित्सा जांच के लिए आवश्यक उपकरण या तो उपलब्ध ही नहीं है और यदि उपलब्ध भी हैं तो तकनीकी खराबी के कारण बेकार पड़े रहते हैं। ऐसे में लोग निजी अस्पतालों की ओर भागने को मजबूर होते हैं। आर्थिक रूप से संपन्न तबके के लोग तो निजी अस्पतालों का खर्च वहन कर लेते हैं, पर मध्यम वर्ग और गरीब तबके के लोग संकट में फंस जाते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक निजी अस्पतालों के भारी-भरकम बिल भरने की वजह से भारत में हर साल करीब छह करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं। यह वह तबका है जिसे मजबूरी में जान बचाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ता है। इस समस्या का बड़ा कारण किफायती और उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं तक लोगों की पहुंच नहीं हो पाना है। आबादी का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य बीमा के दायरे में नहीं है। देश के स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में लगातार उदारीकरण के बावजूद कुल आबादी के पांचवें हिस्से से भी कम आबादी स्वास्थ्य बीमा के दायरे में है। ऐसे में विश्व बैंक की उस रिपोर्ट पर विचार करने की जरूरत है जिसमें कहा गया है कि नब्बे फीसद बीमारियों की पहचान की जा सकती है और इन्हें ठीक भी किया जा सकता है।

किसी भी देश का विकास योग्य और स्वस्थ मानव संसाधन पर निर्भर करता है। शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं जिससे मानव संसाधन को बेहतर बनाया जा सकता है। नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन का कहना है कि उदारीकरण के लिए चाहे जितने भी क्षेत्र खोल दें, शिक्षा और स्वास्थ्य दो ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें हर हाल में सरकारी क्षेत्र में ही होने चाहिए। कनाडा, डेनमार्क, स्वीडन, नॉर्वे, जर्मनी, ब्रिटेन, जापान और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में दुनिया की सबसे अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान की जा रहीं हैं। पर, भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में बिना अधिक पैसे खर्च किए बेहतर स्वाथ्य सेवाएं नहीं मिल पाना संभव नहीं है।

इसमें संदेह नहीं कि भारत की मौजूदा स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली अनेक प्रकार की विसंगतियों से भरी है। यह विडंबना तब है जब भारत में इन समस्याओं से निपटने के लिए सभी जरूरी कार्यक्रम और नीतियां मौजूद हैं। जाहिर है, समस्या इन पर ईमानदारी से अमल की है। हांलाकि राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की घोषणा और क्रियान्वयन से यह उम्मीद जगी थी कि अस्वस्थ भारत की तस्वीर बदल जाएगी, परंतु ऐसा हो नहीं पाया। ब्लूमबर्ग की ग्लोबल हेल्थ इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और गुणवत्ता के वैश्विक पायदान में भारत एक सौ उनसठ देशों की कतार में एक सौ बीसवें नंबर पर आता है। इस मामले में भारत से छोटे और कमजोर देश कहीं अधिक बेहतर माने जाते हैं। इस सूचकांक में श्रीलंका छियासठवें, बांग्लादेश इनक्यानवेवें और नेपाल एक सौ दसवें नंबर पर आता है। हम सिर्फ अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान से बेहतर हैं, जो एक सौ चौबीसवें स्थान पर है।

भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। लेकिन यह हैरानी की बात है कि हम अपनी कुल जीडीपी का दो फीसद भी स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च नहीं करते। सवा अरब से ज्यादा आबादी वाले देश के लिए यह रकम ऊंट के मुंह में जीरे के सामान है। स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च का वैश्विक स्तर छह फीसद माना गया है। लेकिन, नई स्वास्थ्य नीति 2017 के अनुसार भारत ने 2025 तक स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च जीडीपी का ढाई फीसद करने का लक्ष्य रखा है। छह फीसद का आंकड़ा कब भारत हासिल करेगा, यह कोई नहीं जानता। जाहिर है, स्वास्थ्य का मुद्दा भारत के राजनीतिक एजेंडे के प्राथमिक बिंदुओं में कभी नहीं रहा।

आज भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की जो स्थिति है, उसे देखते हुए इसे दुरुस्त बनाने के लिए व्यापकस्तर की कार्ययोजना बनाए जाने की सख्त जरूरत है। आर्थिक प्रगति के साथ-साथ सामाजिक प्रगति भी उतनी ही आवश्यक है। यदि हम चीन और भारत के आर्थिक विकास की तुलना करें, तो चीन के आर्थिक विकास का बहुत बड़ा कारण उसका स्वास्थ्य एवं शिक्षा में निवेश करना रहा है। भारत को भी अपने नागरिकों को विश्व की स्पर्धा में आगे लाने के लिए उन्हें स्वास्थ्य-उपहार देना होगा। चीन को भी अपनी स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर करने में एक दशक से ज्यादा का समय लग गया था। नीतियां बनाने से ज्यादा बड़ी चुनौती उन्हें अमल में लाने की होती है। भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण बनाने के लिए सबसे बड़ी और पहली जरूरत इस क्षेत्र में भारी निवेश की है। केंद्र और राज्य सरकारों को अपना स्वास्थ्य बजट बढ़ाना होगा, ताकि लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सके।

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