ताज़ा खबर
 

दांव पर यरूशलम

मध्यपूर्व में इजराइल की बढ़ती सामरिक ताकत अरब राष्ट्रवाद को चुनौती देती रही है। इस्लामिक नेतृत्व को लेकर अरब राष्ट्रों की आपसी प्रतिद्वंद्विता ने भी इजराइल को ताकत दी है। इजराइल को रणनीतिक रूप से घेरने वाले देश आंतरिक अशांति और राजसत्ता की अपनी मजबूरियों से जूझ रहे हैं।

गाजा शहर के बाहरी इलाके में रात भर इजरायल के भारी मिसाइल हमलों के बाद शुक्रवार, 14 मई, 2021 को फिलिस्तीनी अपने घरों से भागने लगे। (एपी फोटो / खलील हमरा)

ब्रह्मदीप अलूने
मशहूर जर्मन सैन्य विशेषज्ञ क्लाजविट्ज ने कहा था कि राज्य अपनी नीतियों को लागू करने के लिए युद्ध का सहारा लेते हैं। मध्यपूर्व में इजराइल और फिलस्तीन की नीतियां बेहद साफ हैं। इजराइल का अस्तित्व यहूदियों के लिए जीवन-मरण का प्रश्न है, वहीं फिलस्तीनियों और अरब के नजरिए से इजराइल का खत्म होना जरूरी है। दुनिया के बेहद अशांत माने जाने वाले मध्यपूर्व के इजराइल और फिलस्तीन के कई इलाके इस समय दोनों ओर से भयानक हमलों का सामना कर रहे हैं। इससे मध्यपूर्व में हिंसा और तेज होने की आशंका गहरा गई है। इस विवाद को दो प्रमुख सभ्यताओं के संघर्ष के रूप में भी प्रचारित किया जाता रहा है और इसीलिए पूरी दुनिया में इसका असर होता है।

पूर्वी भूमध्य सागर के आखिरी छोर पर स्थित इजराइल उत्तर में लेबनान, उत्तर-पूर्व में सीरिया, पूर्व में जॉर्डन और पश्चिम में मिस्र से घिरा है। वर्ष 1967 में जब जॉर्डन, सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुसलिम देशों ने एक साथ इजराइल पर हमला किया था तो उसने पलटवार करते ही मात्र छह दिनों में इन सभी देशों को धूल चटा दी थी। उस घाव से अरब देश अब भी नहीं उबर पाएं हैं। यह युद्ध पांच जून से ग्यारह जून 1967 तक चला था। इसने मध्यपूर्व संघर्ष का स्वरूप बदल डाला। इतिहास में इस घटना को ‘सिक्स वार डे’ के नाम से जाना जाता है। इजराइल ने मिस्र को गाजा से, सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट व पूर्वी यरूशलम से खदेड़ दिया था। इस युद्ध में करीब पांच लाख फिलस्तीनी बेघर हो गए थे। जीते गए इलाके अब इजराइल के कब्जे में हैं। खाड़ी देशों के लगातार दबावों के बावजूद इजराइल इन इलाकों को छोड़ने को तैयार नहीं है। वह पूर्वी यरूशलम के इलाके सहित पूरे यरूशलम शहर को अपनी राजधानी मानता है। जबकि फिलस्तीनी पूर्वी यरूशलम को भविष्य के एक आजाद मुल्क की राजधानी के तौर पर देखते हैं। इन इलाकों में यहूदी बस्तियां बसा कर इजराइल अपनी स्थिति को मजबूत करता जा रहा है, जबकि फिलस्तीनी अपने घरों को किसी भी हालात में छोड़ने को तैयार नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में यथास्थितिवाद का सिद्धांत शक्ति संतुलन के साथ शांति की स्थापना को भी सुनिश्चित करता है। लेकिन यथास्थितिवाद को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है और यह किसी भी समय शक्ति संघर्ष का कारण बन जाती है। इजराइल और फिलस्तीन को लेकर दुनिया के कई देश यथास्थितिवाद को पसंद करते हैं, जबकि मध्यपूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती। यरूशलम न केवल राजनीतिक और सामरिक दृष्टि से बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्त्वपूर्ण है। यहां मुसलमानों की पवित्र अल-अक्सा मस्जिद है, जिसे यहूदी टेंपल माउंट कहते हैं। वर्ष 2016 में यूनेस्को ने कहा था कि यरूशलम में मौजूद ऐतिहासिक अल-अक्सा मस्जिद पर यहूदियों का कोई दावा नहीं है। यूनेस्को की इस बात को मानने से इजराइल ने इनकार कर दिया था। अल-अक्सा मस्जिद में बड़ी संख्या में मुसलमान आना चाहते हैं, लेकिन इजराइल बलपूर्वक इन्हें रोकता रहा है। इस बार भी ऐसा ही हुआ। ईद पर बड़ी संख्या में मुस्लिम अल-अक्सा मस्जिद में नमाज पढ़ना चाहते थे। लेकिन इजराइल ने उन्हें रोक दिया और वहां से खदेड़ दिया।

मध्यपूर्व में इजराइल की बढ़ती सामरिक ताकत अरब राष्ट्रवाद को चुनौती देती रही है। इस्लामिक नेतृत्व को लेकर अरब राष्ट्रों की आपसी प्रतिद्वंद्विता ने भी इजराइल को ताकत दी है। इजराइल को रणनीतिक रूप से घेरने वाले देश आंतरिक अशांति और राजसत्ता की अपनी मजबूरियों से जूझ रहे हैं। इजराइल के उत्तर में लेबनान और पूर्व में सीरिया है। ये दोनों देश गृहयुद्ध से प्रभावित हैं। जबकि उसके दूसरे पड़ोसी जॉर्डन और मिस्र 1967 के इजराइल-अरब युद्ध के बाद यहूदी राष्ट्र के साथ राजनयिक संबंध स्थापित कर खामोश हैं। इन सबके बीच इजराइल को मध्य पूर्व से खत्म कर अरब राष्ट्रवाद की अगुवाई के स्वप्न ने ही इस्लामिक दुनिया को दो भागों में बांट दिया है। इजराइल-फिलस्तीन विवाद की परछाई में शिया बाहुल्य ईरान ने लेबनान के आतंकवादी संगठन हिजबुल्ला को भारी मात्रा में हथियार और गोला बारूद देकर इजराइल पर हमला करने के लिए लगातार प्रोत्साहित किया, वहीं सुन्नी बाहुल्य सऊदी अरब ने हमास को हथियार देकर इजराइल को निशाना बनाने की कोशिश की। लेकिन इस्लामिक दुनिया में बादशाहत कायम रखने के लिए ईरान और सऊदी अरब इजराइल को निशाना बनाते-बनाते आपसी हितों के लिए कालांतर में एक दूसरे के ही प्रतिद्वंद्वी बन गए।

इस्लामिक देशों के संगठन (ओआइसी) के कई सदस्य देशों के साथ इजराइल के बेहतर संबंध हैं। शिया-सुन्नी विवाद का साया भी ओआइसी पर पड़ता रहा है। तुर्की और सऊदी अरब के बीच इस समय इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व करने की होड़ मची है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन इजराइल की आलोचना तो कर रहे हैं, लेकिन वे इजराइल की राजनीतिक, सामरिक और आर्थिक शक्ति को भलीभांति जानते हैं। एर्दोआन की नीतियां अमेरिका के निशाने पर हैं और उन्हें अपनी स्थिति मजबूत रखने के लिए अमेरिका से बेहतर रिश्तों की जरूरत है। इसमें उनका बड़ा मददगार इजराइल हो सकता है। दरअसल तुर्की के लिए कुर्द बड़ी समस्या हैं। कुर्द मध्यपूर्व का चौथे सबसे बड़ा जातीय समूह है। इनकी संख्या करीब साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा है। वर्तमान में मध्यपूर्व का यह बेहद प्रभावशाली समुदाय है जो नस्ल, भाषा और संस्कृति के आधार पर विभिन्न देशों में एक दूसरे का सहयोग कर रहे हैं।

कुर्दों का अभी कोई एक देश नहीं है। ये तुर्की में अपनी स्वायत्तता के लिए लड़ रहे हैं, तो सीरिया और इराक में अपनी अहम भूमिका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ये इस्लामिक स्टेट (आइएस) का भी प्रतिरोध करते रहे हैं। दक्षिणी-पूर्वी तुर्की, उत्तरी-पूर्वी सीरिया, उत्तरी इराक, उत्तर-पूर्वी ईरान और दक्षिण-पश्चिमी आर्मेनिया तक कुर्द फैले हुए हैं। इनको लेकर अमेरिका का रुख भी की उदार ही रहा है। जाहिर है, एर्दोआन ऐसी किसी भी हिमाकत से बचेंगे जिससे अमेरिका और इजराइल नाराज हो जाएं और कुर्द समस्या तुर्की की एकता और अखंडता के लिए बड़ी चुनौती पेश करने लगे।

यूरोप के कई देश भी मध्यपूर्व में अशांति बने रहना हितकर समझते हैं। उन्हें लगता है कि यदि इस इलाके में शांति स्थापित हो जाएगी तो अरब राष्ट्रवाद मजबूत होकर यूरोप को चुनौती दे सकता है। और यदि यूरोप को मध्यपूर्व से तेल मिलना बंद हो गया तो उसके अधिकांश उद्योग धंधे बंद हो जाएंगे और इस प्रकार दुनिया के सबसे बड़े विकसित यूरोप महाद्वीप की औद्योगिक और सामरिक क्षमता बर्बाद हो जाएगी। यही कारण है कि पश्चिमी देश मध्यपूर्व पर अपना नियंत्रण बनाए रखना चाहते हैं और वे मध्य-पूर्व में एक ठिकाने के रूप में इजराइल को सबसे सुरक्षित देश मानते हैं।

मध्यपूर्व में बड़ी प्रतिद्वंदिता ईरान और सऊदी अरब की रही है। ईरान को रोकने के लिए सऊदी अरब इजराइल को बेहतर विकल्प मानता है और इन दोनों देशों के बीच गोपनीय भागीदारी भी सामने आई है। सऊदी अरब अपने पारंपरिक और सामरिक मित्र अमेरिका की मध्यपूर्व की नीतियों का एकतरफा विरोध नहीं कर सकता। अत: सऊदी अरब का इजराइल विरोध शब्दों से आगे जाए, इसकी कोई संभावना नहीं है। इसके साथ ही सऊदी अरब कोई ऐसा कदम उठाने से भी बचना चाहेगा जिससे उसके कड़े प्रतिद्वंद्वी ईरान को किसी भी प्रकार से मजबूती मिल सके।

बहरहाल, इजराइल और फिलस्तीन के विवाद में जटिल संतुलन का सिद्धांत हावी है, जिसमें राष्ट्र या राष्ट्र समूह एक दूसरे को संतुलित करते हैं और फिर संतुलनों के भीतर संतुलन होता है। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र में वैश्विक प्रयासों की बदौलत आधे-अधूरे समझौतों पर आधारित शांति एक बार स्थापित हो जाएगी। इस विवाद से विश्व के कई ताकतवर देशों के व्यापक आर्थिक और सामरिक हित जुड़े हैं। इसलिए फिलस्तीन के नए राष्ट्र का सपना पूरा होने की संभावना दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आती है।

Next Stories
1 कृषि निर्यात की चुनौतियां
2 सुपर कंप्यूटरों पर जंग
3 जहरीला होता भूजल
ये पढ़ा क्या?
X