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मंगल पर बस्ती का सपना

यह संभव है कि पहले कभी मंगल का वातावरण पानी या तरल पदार्थ को ग्रह की जमीन पर मौजूद रखने में सक्षम था। लेकिन मंगल पर पानी की झील मिलने से अब यह संभावना बढ़ गई है कि वहां जीवन के अनुकूल परिस्थितियां रही होंगी। यही कारण है कि भविष्य में इस ग्रह को रहने योग्य बनाने की कल्पनाएं की जाने लगी हैं। इसीलिए नासा मंगल ग्रह पर परमाणु बिजली घर लगाने की योजना पर काम कर रहा है।

space, marsसबसे अधिक परिष्कृत मोबाइल प्रयोगशाला मंगल पर भेजी गई। (फोटो: ट्विटर / @ NASAPersevere)

मंगल ग्रह पर जीवन की सभावनाएं तलाशने के लिए कई देश अलग-अलग प्रयासों में जुटे हैं। अब चीन का अंतरिक्ष यान भी लाल ग्रह पर जीवन की संभावना का पता लगाने के लिए उसके करीब पहुंच रहा है। संयुक्त अरब अमीरात का यान ‘होप’ मंगल की कक्षा में दाखिल हो चुका है और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का रोवर भी लाल ग्रह पर उतर गया है। अभी तक अमेरिका ही एकमात्र ऐसा देश है जिसने मंगल पर सफलतापूर्वक अंतरिक्ष यान उतारा है और उसने यह कमाल आठ बार किया। नासा की दो रोबोट संचालित गाड़ियां (लैंडर) इनसाइट और क्यूरियोसिटी वहां काम कर रही हैं। छह अन्य अंतरिक्ष यान मंगल की कक्षा से लाल ग्रह की तस्वीरें ले रहे हैं, जिनमें अमेरिका से तीन, यूरोपीय देशों से दो और भारत से एक है। ऐसा लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब इंसान मंगल ग्रह पर आशियाना बनाने की दिशा में कदम बढ़ाएगा।

मंगल हमारे सौरमंडल में सूर्य से चौथा ग्रह है। पृथ्वी से इसकी आभा रक्तिम दिखती है, जिस वजह से इसे लाल ग्रह के नाम से भी जाना जाता है। पृथ्वी की तरह मंगल भी एक स्थलीय धरातल वाला ग्रह है। इसका वातावरण विरल है। इसकी सतह देखने पर चंद्रमा के गर्त और पृथ्वी के ज्वालामुखियों, घाटियों, रेगिस्तान और ध्रुवीय बर्फीली चोटियों की याद दिलाती है। हमारे सौरमंडल का सबसे अधिक ऊंचा पर्वत, ओलंपस मोंस मंगल पर ही स्थित है। उस पर धूल के बवंडर उठते रहते हैं और वहां अमेरिकी महाद्वीप के बराबर चौड़ी एक शानदार घाटी भी देखी गई है। अपनी भौगोलिक विशेषताओं के अलावा मंगल का घूर्णन काल और मौसमी चक्र लगभग पृथ्वी के समान है।
नासा के पर्सिवियरेंस रोवर ने मंगल ग्रह की सतह पर चलना यानी खोज करने का काम शुरू कर दिया है। रोवर बहुत दूर नहीं गया है। इसने अब तक कुल इक्कीस फीट का सफर किया है। लेकिन नासा की वरिष्ठ वैज्ञानिक केटी स्टैक मॉर्गन इसे एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताती हैं। पर्सिवियरेंस रोवर को अब भी बहुत-सी तकनीकी जांचों से गुजरना पड़ रहा है। लेकिन जैसे ही इसके रबड़ के पहिए घूमने शुरू होंगें तब हम खुद को इसके जरिए मंगल ग्रह का खोजकर्ता मान सकते हैं।

अब से पहले नासा जो भी रोवर भेजे हैं, उनकी तुलना में पर्सिवियरेंस में सबसे मजबूत पहिये लगे हैं। नासा की ओर से मंगल ग्रह पर उतारा गया ये दूसरा एक टन वजनी वाहन है। इतना ही नहीं, पर्सिवियरेंस मंगल की सतह पर उतारा गया अब तक का सबसे तेज रोवर भी है। इसलिए उम्मीद है कि वह मंगल ग्रह की सतह की कई तस्वीरें लेगा, ताकि वैज्ञानिक आसपास के इलाके और पर्यावरण आदि को बेहतर ढंग से समझ सकें। इस रोवर ने कुछ दूरी तय की, जिसके बाद इसने एक सौ पचास डिग्री का मोड़ लिया और वापस अपनी जगह पर लौट आया।

पर्सिवियरेंस रोवर मंगल ग्रह की सतह पर 19 फरवरी को उतरा था। मंगल तक पहुंचने के लिए सात महीने पहले धरती से गए इस यान ने तकरीबन आधा अरब किलोमीटर की दूरी तय की। यह रोवर एक पुरानी सूख चुकी झील की जमीन की जांच करने के साथ-साथ अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर सूक्ष्म जीवन से जुड़े चिह्नों की जांच करेगा और उन्हें पृथ्वी पर भेजेगा। रोवर करीब दो वर्ष के कालखंड में मंगल ग्रह की सतह पर तकरीबन पंद्रह किलोमीटर चलेगा। पर्सिवियरेंस अपने साथ एक छोटे-सा हेलिकॉप्टर भी गया है। रोवर इस हेलिकॉप्टर को उड़ाने का प्रयास करेगा जो किसी अन्य ग्रह पर इस तरह की पहली उड़ान होगी।

इससे पहले मंगल पर क्यूरियोसिटी रोवर ने विशाल भूमिगत झील का पता लगाया था। इससे वहां अधिक पानी होने और जीवन की मौजूदगी की संभावना दिखने लगी। अमेरिकी जर्नल- साइंस में प्रकाशित एक शोध में खोजकर्ताओं ने दावा किया कि मार्सियन हिम खंड के नीचे अवस्थित झील बीस किलोमीटर चौड़ी है। यह मंगल ग्रह पर मिली अब तक सबसे बड़ी झील है। पहले के शोध में मंगल के धरातल पर तरल जल के संभावित चिह्न मिले थे, लेकिन ये जल के पाए जाने का पहला ऐसा प्रमाण है, जो वर्तमान में मौजूद है। आस्ट्रेलिया के स्विनबर्न विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर एलन डफी ने इसे शानदार उपलब्धि करार देते हुए कहा कि इससे जीवन के अनुकूल परिस्थितियों की संभावनाएं खुलती हैं।

क्यूरियोसिटी रोवर ने जिन झीलों के तल का पता लगाया था, उनसे पता चलता है कि अतीत में मंगल की सतह पर पानी मौजूद रहा होगा। हालांकि क्षीण वायुमंडल की वजह से मंगल की जलवायु पहले के मुकाबले ठंडी हुई है। इससे यहां मौजूद जल बर्फ में बदल गया। ये नई खोज मार्सिस की मदद से संभव हो सकी है।‘मार्सिस मार्स एक्सप्रेस आर्बिटर’ पर मौजूद एक राडार है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले इटैलियन नेशनल इंस्टीट्यूट आफ एस्ट्रोफिजिक्स के प्रोफेसर रोबर्टो ओरोसई ने कहा कि ‘ये संभवत: एक बहुत बडी झील हो सकती है।’ हालांकि मार्सिस ये पता नहीं लगा सका कि तरल जल की गहराई कितनी है। लेकिन शोध दल का अनुमान है कि ये कम से कम एक मीटर हो सकती है। प्रोफेसर ओरोसई के अनुसार जो कुछ मिला है वह जल ही है। ये एक झील की तरह है, वैसा नहीं जैसा कि पिघली हुई बर्फ चट्टान और बर्फ के बीच भरी होती है।

नासा ने घोषणा की थी कि मंगल पर 2012 में उतरे क्यूरियोसिटी को चट्टानों में तीन अरब साल पुराने कार्बनिक अणु मिले हैं। यह इस बात का संकेत है कि कभी इस ग्रह पर जीवन रहा होगा। नासा के सौर प्रणाली अन्वेषण विभाग के निदेशक पॉल महाफी ने कहा कि यह एक रोमांचक खोज है। हालांकि फिर भी इससे इस बात की पुष्टि नहीं होती कि अणुओं का जन्म कैसे हुआ। इस तथ्य के बावजूद कि यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि ये अणु कैसे निर्मित हुए थे, इस प्रकार के कण मंगल ग्रह पर काल्पनिक सूक्ष्म जैविकी के खाद्य स्रोत हो सकते हैं। मैरीलैंड स्थित नासा के गोर्डाड स्पेस सेंटर की जेनिफर एगनब्रोड का कहना है कि मंगल ग्रह पर पाए गए कार्बनिक अणु जीवन के विशिष्ट प्रमाण प्रदान नहीं करते हैं, क्योंकि वे ‘गैर जैविक’ चीजों के हो सकते हैं। हालांकि किसी भी मामले में अणु मंगल ग्रह पर जीवन की निरंतर खोज में वैज्ञानिकों को महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान कर सकते हैं, क्योंकि हम जिस जीवन के बारे में जानते हैं, वह कार्बनिक अणुओं पर आधारित है।

यह संभव है कि पहले कभी मंगल का वातावरण पानी या तरल पदार्थ को ग्रह की जमीन पर मौजूद रखने में सक्षम था। लेकिन मंगल पर पानी की झील मिलने से अब यह संभावना बढ़ गई है कि वहां जीवन के अनुकूल परिस्थितियां रही होंगी। यही कारण है कि भविष्य में इस ग्रह को रहने योग्य बनाने की कल्पनाएं की जाने लगी हैं। इसीलिए नासा मंगल ग्रह पर परमाणु बिजली घर लगाने की योजना पर काम कर रहा है। किलो पावर परियोजना के तहत उसने ऐसे रिएक्टर विकसित किए हैं, जो वहां बिजली पैदा कर इंसानों को बसने में मदद करेंगे। मंगल पर वायुमंडल नहीं है।

धरती की तुलना में वहां केवल एक तिहाई सूरज की रोशनी पड़ती है। इसलिए वहां सौर ऊर्जा से बिजली बनाना संभव नहीं है। मंगल पर तापमान बेहद कम (-81 डिग्री सेंटीग्रेड) है। वहां रहने के लिए हवा, पानी, ईधन की जरूरत है। ये जरूरतें बिजली के जरिए ही पूरी की जा सकती हैं। इसके लिए परमाणु ऊर्जा ही एकमात्र विकल्प है। वैज्ञानिकों के अनुसार मंगल पर आठ लोगों की बस्ती को चालीस किलोवाट बिजली की जरूरत होगी। इसके लिए दस किलोवाट के चार रिएक्टर चाहिए। यदि ये रिएक्टर परीक्षणों में खरे उतरते हैं तो मंगल पर बस्ती बसाने की कोशिशों की दिशा में यह बड़ा कदम होगा।

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