भूटान पर चीन का नया पैंतरा

चीन-भूटान सीमा विवाद को लेकर पिछले कुछ समय से चीन की बौखलाहट बढ़ी है। 1998 की संधि के तहत चीन के कबूल किया था कि वह विवादास्पद क्षेत्र में सड़क निर्माण या किसी भी तरह की दखलंदाजी नहीं करेगा। जून 2017 में उसने उस संधि को तोड़ दिया और सड़कें बनाना शुरू कर दिया।

Jansatta Editorial Page
भूटान के मुख्य चीन सीमा सैन्य अड्डे के पास दमथांग क्षेत्र। (Express Photo by Praveen Swami/Files)

सतीश कुमार

हाल में संपन्न भूटान-चीन सीमा वार्ता कोई अजूबा या नई पहेली नहीं है। पिछले साढ़े तीन दशक से चीन भूटान के साथ निरंतर इस कोशिश में लगा है कि सीमा विवाद का हल उसके नक्शे कदम पर हो जाए। दरअसल चीन की इस आतुरता का कारण है। पिछले साल यानी 2020 के मध्य में जब भारत-चीन सीमा संघर्ष चरम पर पहुंच गया था और युद्ध की आंशका गहराने लगी थी, उसी दौरान चीन ने भूटान के साकतेंग इलाके को चीनी क्षेत्र बता कर नया विवाद छेड़ दिया था।

चीन ने डोकलाम के नजदीक गांव बसाना भी शुरू कर दिया था। जबकि डोकलाम की तरफ चीन का कभी कोई रिहायशी इलाका पहले था ही नहीं। भारत अरुणाचल प्रदेश के तवांग से साकतेंग तक सड़कों का जाल बिछा रहा है। इससे तवांग और गुवाहाटी की दूरी करीब डेढ़ सौ किलोमीटर कम हो जाएगी। फिर डोकलाम में भारतीय सेना तीन तरफ से चीन को चुनौती देने में भी सक्षम होगी। इसी से परेशान होकर चीन ने भूटान के साथ सीमा विवाद हल करने का पैंतरा चला है।

भूटान-चीन वार्ता का सीधा संबंध सिक्किम से जुड़ा है। सिक्किम क्षेत्र के संवेदनशील ठिकानों पर भारतीय सेना पहले से तैनात है। कोई नया परिवर्तन नहीं हुआ है। डोकलाम का हिस्सा अत्यंत संवेदनशील इलाका है। यह तिब्बत और चुंबी घाटी का एक हिस्सा है। पिछले सात दशकों से चीन इतिहास की गलत दलीलों के साथ इस घाटी के क्षेत्रों को अपना हिस्सा बताता रहा है। दरअसल यह भूभाग भूटान का इलाका है जिस पर चीन समय-समय पर दावा करता रहता है।

भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी देश से जोड़ने वाला अहम सिलीगुड़ी गलियारा इस घाटी से नीचे महज पचास किलोमीटर की दूरी पर है। भारत के सामरिक हितों के साथ आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से भी यह इलाका बेहद संवेदनशील है। दरअसल यह घाटी तिब्बत, भूटान और भारत की सीमाओं पर स्थित है। भारत और चीन के बीच का नाथू-ला दर्रा और जेलन दर्रा यहां खुलता है। इस संकरी घाटी में सैन्य गतिविधियां बहुत मुश्किल हैं। इसे चिकेन नेक भी कहा जाता है। डोकलाम सिक्किम के नजदीक का वह क्षेत्र है जिसे चीन ने डोंगलांग नाम दिया है। भूटान और चीन के बीच विवाद इस क्षेत्र को लेकर ही है।

यह दो टूक सच है कि भारत-भूटान संबंधों का अपना विशिष्ट महत्त्व है। 1947 से 2007 तक दोनों देश पचास वर्षीय मैत्री संधि से बंधे हुए थे। इसके बाद भी पुरानी व्यवस्था को बनाए रखा गया। भूटान में रक्षा और विदेश नीति की प्रक्रिया भारतीय मदद से तय की जाती है। मालूम हो कि चीन और भूटान के बीच किसी भी प्रकार के कूटनीतिक संबंध नहीं हैं। कूटनीतिक संबंध बनाने के लिए चीन भूटान पर लगातार दबाव बनाए हुए है। लेकिन अभी तक इसमें उसे कामयाबी नहीं मिली है।

गौरतलब है कि भूटान से संबंधों को लेकर भारत की नीति पहले ही से स्पष्ट है। भारत सरकार ने चीन के डेंग श्याओपिंग की तरह विचारों की नीति को दरकिनार करते हुए महज राष्ट्रीय हित को सामने रखा है। इसके अंतर्गत भारत ने न केवल हिमालय के तटवर्तीय देशों में अपनी सुरक्षा को चाक-चौबंद किया, बल्कि चीन से आर्थिक संबंधों को भी नई ऊंचाई पर ले जाने की शुरुआत की। सत्तर-अस्सी के दशक में चीन में डेंग ने विदेश नीति को विचारों से मुक्त कर राष्ट्रीय हित में ला दिया था। यही रुख भारत ने अपनाया है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने हिमालयी देशों मसलन भूटान और नेपाल में एक नई शुरुआत के साथ विदेश नीति को नया आयाम दिया है।

भारत को लेकर चीन की पूरी सामरिक रणनीति का केंद्र तिब्बत बना हुआ है। माओत्से तुंग ने कहा था कि चीन के लिए तिब्बत दंत शृंखला के रूप में काम करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए चीन अपनी विदेश और सुरक्षा नीति बनाता रहा है। चीन-भूटान सीमा विवाद को लेकर पिछले कुछ समय से चीन की बौखलाहट बढ़ी है।

1998 की संधि के तहत चीन के कबूल किया था कि वह विवादास्पद क्षेत्र में सड़क निर्माण या किसी भी तरह की दखलंदाजी नहीं करेगा। जून 2017 में उसने उस संधि को तोड़ दिया और सड़कें बनाना शुरू कर दिया। भारतीय सैनिक चीन की ऐसी हरकतों पर नजर रखने के लिए सिक्किम के उन क्षेत्रों में तैनात है जहां पर भूटान, सिक्किम और तिब्बत का साझा क्षेत्र पड़ता है।

भारत के साथ सीमा विवाद को लेकर चीन की रणनीति में बुनियादी बदलाव देखने को मिल रहा है। चीन बड़ी ही कुटिलता के साथ सीमा विवादों को अपने सामरिक विस्तार के हथियार के रूप में इस्तेमाल करता रहा है। सीमा विवाद का हल खोजने के लिए भारत और चीन के बीच 1986 से कोशिशें चल रही हैं।

चीन जम्मू-कश्मीर को विवादास्पद क्षेत्र कहता है, तो उसका कारण सिर्फ पाकिस्तान को खुश करना नहीं है, बल्कि चीन इस क्षेत्र में अपनी पैठ बना कर भारतीय सुरक्षा को हर तरह से कमजोर करने की कोशिश में है। उल्लेखनीय है कि अक्साई चीन में सड़क निर्माण के कारण ही चीन ने 1960-62 के बीच सीमा विवाद को विस्फोटक बनाया था।

इसी मार्ग से लोपनोर में परमाणु हथियारों के परीक्षण स्थल तक उसकी पहुंच बनती है। दरअसल यहीं से पाक-अधिकृत कश्मीर के रास्ते चीन ग्वादर बंदरगाह तक पहुंच सकता है। इतना ही नहीं, चीन की नजर हिंद महासागर पर भी है। वह दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में अपनी नौ सैन्य शक्ति का विस्तार कर रहा है।

इसके अलावा हिमालय की तराई में बसे देशों के बीच सड़क और रेल संपर्कों का निर्माण चीन की चाल है। चीन के काश्गर और पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को जोड़ने वाले काराकोरम हाईवे की लंबाई तेरह सौ किलोमीटर है। इस राजमार्ग को ‘फ्रेंडशिप हाईवे’ नाम दिया गया है। लेकिन इससे स्थिति कभी भी 1962 से भी बदतर होने का खतरा तो बना हुआ है ही।

मालूम हो कि सितंबर 1962 में चीन की सेना ने आक्रमण किया था और भारत की सेना पीछे हट गई थी। चीनी सेना पूर्वी सीमा के भीतर तक आ गई थी। पश्चिमी सीमा पर चीन ने तकरीबन तेरह भारतीय सैन्य ठिकानों पर कब्जा कर लिया था। इसलिए आज का विवाद भी 1962 की यादों से जुड़ा है।

पूर्वी और पश्चिमी सीमा पर नए सिरे से विवाद को जन्म देकर चीन ने भारत को फिर चुनौती देने की कोशिश की है। चीन बार-बार इस तरह के विवादित बयान तो देता ही आया है कि अरुणाचल प्रदेश तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा है। जाहिर है उसकी नीति और दिलचस्पी विवादों के समाधान से ज्यादा उन्हें और उलझाने की है।

लंबे समय से चीन इस कोशिश में लगा है कि सौदेबाजी के तहत भूटान के साथ सीमा समझौता कर लिया जाए। वह भूटान को उत्तरी-मध्य हिस्से का विवादास्पद क्षेत्र जकारलूंग और पसालूंग देकर उसके बदले में डोकलाम लेना चाहता है। चीन डोकलाम को इसलिए लेना चाहता है कि यह इलाका तिब्बत को भूटान से जोड़ता है।

उसके लिए इसका महत्त्व इसलिए भी है कि यहां से पचास किलोमीटर दूर ही चुंगी वैली है जो भारत के ऊपर पूर्वी राज्यों को जोड़ती है। इसलिए चीन 1996 से भूटान के साथ इस सौदेबाजी में लगा है। उसकी चाल भूटान को कब्जे में लेकर भारत पर दबाव बनाने की है। भारत और भूटान की विशेष मैत्री संधि आज भी जिंदा है। लेकिन चीन-भूटान वार्ता को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

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