चीन-ताइवान का गहराता संकट

ताइवान भले छोटा देश हो, लेकिन वहां लोकतंत्र काफी मजबूत हो चुका है। इससे चीन विरोधी मानसिकता मजबूत हुई है। ताइवानी जनता को यह मालूम है कि चीन ने एक बार ताइवान को अगर अपने कब्जे में लिया तो ताइवानी लोकतंत्र की दलीय व्यवस्था खत्म हो जाएगी, जिसे ताइवानी जनता ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है।

संजीव पांडेय

इन दिनों ताइवान और चीन के बीच तनाव चरम पर है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन में ताइवान के विलय को जरूरी बताया है। हालांकि इस बार उन्होंने ताइवान को लेकर विलय का प्रस्ताव शांतिपूर्वक रखा है। जिनपिंग के बयान का जवाब ताइवान की राष्ट्रपति ने भी दिया और साफ कहा कि चीन में ताइवान के विलय की संभावना बिल्कुल नहीं है। हालांकि ताइवानी जनता चीनी मूल की ही है, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाली ताइवानी जनता किसी भी कीमत पर चीनी कम्युनिस्ट शासन को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। पर शी जिनपिंग की सेना ताइवान की सीमा में लगातार घुसपैठ कर रही है। बीते कुछ महीनों में कई बार चीनी वायु सेना ने ताइवान के हवाई क्षेत्र में घुसपैठ की है। ताइवान को लेकर चीन के तेवर आक्रमक हैं। इससे एशियाई क्षेत्र में तनाव और बढ़ने का खतरा और गहराता जा रहा है।

ताइवान को लेकर चीन लंबे से ऐसा आक्रामक रवैया दिखाता आया है। हालांकि चीन के खिलाफ इस वक्त अमेरिका के नेतृत्व में आस्ट्रेलिया, जापान और भारत का जो चौगुटा (क्वाड) सक्रिय हुआ है, उसे चीन की मोर्चेबंदी के रूप में देखा जा रहा है। अमेरिका ने चीन की आक्रामक नीतियों के खतरे को भांपते हुए आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की मदद से एक और नई सैन्य संधि आकुस भी कर ली है। लेकिन इन दोनों बड़े कदमों के बाद भी चीन की आक्रमकता में कोई कमी नहीं आना बता रहा है कि चीन लंबी रणनीति के तहत ताइवान पर काम कर रहा है। इसीलिए अमेरिका ताइवान को हर तरह से सहयोग दे रहा है।

ताइवान के पास चीन की टक्कर की सेना नहीं है। इसलिए उसकी मदद करने लिए एकमात्र सहारा अमेरिका ही है। ताइवान और अमेरिका पचास के दशक में कोरिया युद्ध के दौरान नजदीक आए थे। हालांकि 1980 के दशक में चीन से रिश्ते सुधरने के बाद अमेरिका ने अपनी ताइवान नीति में आंशिक बदलाव किए थे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में अमेरिका और चीन के बीच संबधों में फिर खटास आ गई। इसलिए अब अमेरिका फिर से खुल कर ताइवान के साथ खड़ा नजर आ रहा है।

चीन-ताइवान विवाद को समझने के लिए एक बार इतिहास पर नजर डालने की जरूरत है। चीन ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ताइवान पर दावा ठोकता रहा है। चीन का कहना है कि 239 ईस्वी से ताइवान चीन का हिस्सा रहा है। चीन के राजा ने 239 ईस्वी में ताइवान के इलाके में सेना भेजी थी। हालांकि कुछ सालों के लिए ताइवान पर डच और जापानियों का भी कब्जा रहा। 1624 ईस्वी से लेकर 1661 ईस्वी तक यह इलाका डचों के कब्जे में था। इसके बाद यहां चीनी राजवंश का शासन हो गया। 1895 में चीन-जापान युद्ध के दौरान जापान ने चीन से इस इलाके को छीन लिया था। पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ताइवान फिर से चीन का हिस्सा बन गया।

इसी दौरान चीन में गृह युद्ध शुरू हो गया था और च्यांगकाई शेक के खिलाफ माओत्से तुंग की कम्युनिस्ट सेना ने जंग छेड़ दी थी। माओ की सेना के सामने च्यांगकाई शेक की हार हो गई और उन्होंने ताइवान में जाकर अपनी सरकार बनाई।

ताइवानी नागरिक दरअसल चीनी मूल के ही हैं। लेकिन बहुसंख्यक ताइवानी चीन के कम्युनिस्ट शासन के अधीन नहीं जाना चाहते। हांगकांग में चीन के रवैये को देख कर तो अब ताइवानी जनता भी चीन की ‘एक देश दो व्यवस्था’ के खिलाफ हो गई है। हालांकि ताइवानी लोग आस्ट्रोनेशिएन जनजाति से संबंध रखते हैं जो आधुनिक दक्षिण चीन से जाकर ताइवान में बसे थे। लेकिन यहां की जनता अब लोकतंत्र की समर्थक और चीनी आधिपत्य के खिलाफ है। चीन ‘एक राष्ट्र दो व्यवस्था’ के तहत ही ताइवान का विलय करना चाहता है। ऐसा ही उसने हांगकांग में किया था।

हांगकांग को लेकर ब्रिटेन और चीन के बीच हुए समझौते के तहत हांगकांग को पचास साल तक अपनी पुरानी व्यवस्था के हिसाब से शासन करने का अधिकार मिला था। लेकिन चीन ने इस वादे को तोड़ दिया। चीन ने हांगकांग के शासन की पुरानी व्यवस्था को लगभग समाप्त कर दिया है। वहां स्वतंत्र न्यायपालिका बची नहीं है और लोकतंत्र समर्थकों को दंडित किया जा रहा है। अभिव्यक्ति के अधिकार को खत्म करने के लिए चीन ने अपना राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू कर दिया। लोगों के मौलिक अधिकार छीन लिए गए।

कहने को ताइवान भले छोटा देश हो, लेकिन वहां लोकतंत्र काफी मजबूत हो चुका है। इससे चीन विरोधी मानसिकता मजबूत हुई है। ताइवानी जनता को यह मालूम है कि चीन ने एक बार ताइवान को अगर अपने कब्जे में लिया तो ताइवानी लोकतंत्र की दलीय व्यवस्था खत्म हो जाएगी, जिसे ताइवानी जनता ने लंबे संघर्ष के बाद हासिल किया है। इसी से चीन परेशान है और ताइवान के खिलाफ बल प्रयोग उसे अंतिम विकल्प के तौर दिखता है।

हालांकि ताइवानी लोकतंत्र के भीतर के विरोधाभास को भी समझना जरूरी है। ताइवानी लोकतंत्र में सक्रिय दल चीन से रिश्तों को लेकर वैचारिक तौर पर बंटे हुए हैं। वैसे तो ताइवानी में बहुदलीय व्यवस्था है, लेकिन मुख्यरूप से दो ही दल ताइवान की राजनीति में प्रभावशाली हैं। चीन से संबंधों के मुद्दे पर डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी और कुओमिनतांग चाइनीज नेशनलिस्ट पार्टी के बीच वैचारिक मतभेद हैं।

डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी बहुदलीय लोकतंत्र की भारी समर्थक है और चीन से स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने के लिए लड़ाई लड़ रही है। जबकि जबकि कुओमिनतांग चाइनीज नेशनलिस्ट पार्टी चीन-ताइवान संबंधों को मधुर करने की वकालत करती रही है। इस समय सत्ता डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी के हाथ में है। इस पार्टी की साई इंग वेन ताइवान की राष्ट्रपति हैं। वे 2020 में दुबारा राष्ट्रपति चुनी गईं। वे चीन की विस्तारवादी नीतियों की मुखर विरोधी रही हैं। उन्होंने चीन में ताइवान के विलय को लेकर इस साल मार्च में जनमत संग्रह करवाया था, जिसमें ताइवानी नागरिकों ने स्वतंत्र ताइवान के पक्ष में वोट किया था।

चीन और ताइवान के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद कुछ दिलचस्प आकंड़े गौर करने लायक हैं। भारत और चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक संबंधों की तर्ज पर ताइवान और चीन के बीच व्यापारिक संबंध अच्छे हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद दशकों से है, पर दोनों मुल्कों के बीच व्यापार कम नहीं हुआ है, बल्कि लगातार बढ़ा ही है। भारत में चीन का निवेश आया है।

चीन ने व्यापार संतुलन भी अपने पक्ष में रखा है। चीनी कूटनीति की यह बड़ी सफलता है कि तनाव के बीच भी चीन व्यापारिक संबंधों को खराब नहीं करता। इसी तरह अगर ताइवान और चीन के बीच व्यापारिक संबंधों पर गौर करें तो पता चलता है कि इस समय ताइवान ने चीन में खासा निवेश कर रखा है। लगभग दस लाख ताइवानी चीन में रहते हैं। चीन में इस समय ताइवानी निवेश साठ अरब डालर पार कर चुका है।

चीन और ताइवान के बीच उपजा तात्कालिक तनाव दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया की भू-राजनीति के मद्देनजर काफी अहम है। चीन की आक्रामक नीतियों से उसके ज्यादातर पड़ोसी देश प्रभावित हो रहे हैं। दक्षिण चीन सागर में दूसरे मुल्कों की समुद्री सीमा में घुसपैठ कर रहा है। ताइवान के वायु क्षेत्र से लेकर भारत की सीमा में लगातार अतिक्रमण की घटनाएं तनाव पैदा कर ही रही हैं। ऐसे में क्वाड और आकुस जैसे संगठन और रणनीतियों से अमेरिका सहित दूसरे देश चीन के विस्तारवाद कदमों पर कितनी लगाम लगा पाते हैं, यह समय ही बताएगा।

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