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ई-कचरे से खतरे में बचपन

भारत में बड़े पैमाने पर अमेरिका और अन्य विकसित देशों से ई-कचरा अवैध तरीके से आयात किया जाता है और इसे कबाड़ के रूप में देश के अलग-अलग इलाकों में खपा दिया जाता है। इस आयातित कचरे के अवैध कारोबार का मुख्य कारण भारत में कम लागत पर इसका निपटान है, क्योंकि विकसित देशों में सख्त कानूनी प्रावधानों और महंगे श्रम के कारण विनिर्माताओं को इसके निपटान पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है।

Jansatta Editorial Storyसमाज में इलेक्ट्रानिक-कचरा जीवन के लिए खतरा बनता जा रहा है। (फाइल फोटो- इंडियन एक्सप्रेस)

अजय खेमरिया
राष्ट्रीय बाल अधिकार एवं संरक्षण आयोग ने ई-कचरे के असंगठित निपटान से अभिशप्त होते बचपन की तरफ सरकार का ध्यान खींचा है। आयोग ने दिल्ली और उत्तर प्रदेश पर केंद्रित अपने एक अध्ययन के आधार पर चेताया है कि अगर समय रहते इस खतरनाक पक्ष पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में लाखों बच्चे कैंसर या ऐसे ही अन्य खतरनाक रोगों की जद में होंगे। चिंतनीय बात यह है कि ऐसे बच्चों में नब्बे फीसद से अधिक बच्चे गरीबी रेखा से ताल्लुक रखने वाले परिवारों से होंगे। मोबाइल, लैपटॉप, कंप्यूटर, प्रिंटर, फ्रिज, टीवी, माइक्रोवेव, एलईडी, एलसीडी, एअरकंडीशनर आदि को उपयोग के बाद फेंके जाने से जो कचरा एकत्रित होता है उसमें इक्कीस प्रकार के आइटी, बिजली और इलेक्ट्रॉनिक सामान को ई-कचरा प्रबंधन कानून 2016 (ई वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स 2016) के तहत अधिसूचित किया गया है। इस कानून के तहत इस ई-कचरे के वैज्ञानिक निपटान की जबावदेही उत्पाद्र कंपनियों की है। अमेरिका, चीन, कोरिया, जापान, रूस आदि विकसित देशों में कंपनियों को ई निपटान संयंत्र भी स्थापित करने होते हैं। लेकिन भारत में स्पष्ट कानून होने के बाबजूद स्थानीय एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा ई-कचरे के निपटान की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं बन पाई है।

पर्यावरणीय नुकसान के इतर राष्ट्रीय बाल सरंक्षण आयोग ने जिस अहम पक्ष पर सरकार को चेताया है, वह लाखों गरीब परिवारों के स्वास्थ्य एवं आर्थिक भविष्य से भी जुड़ा है। दिल्ली के मुस्तफाबाद और उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में किए गए अध्ययन में पता चला कि बड़ी संख्या में यहां अवैध रूप से ई-कचरा संग्रहण केंद्र बने हुए हैं जहां आठ से चौदह वर्ष की आयु के बच्चों से लैड (सीसा), लिथियम, कैडमियम जैसे खतरनाक रासायनिक तत्वों और पदार्थों से युक्त ई-कचरे को न केवल इक्ट्ठा कराया जा रहा है, बल्कि उन्हें इस कचरे के पुनर्चक्रण की अमानक प्रक्रिया में भी झोंक दिया गया है। आयोग के मुताबिक इस वक्त देश के अलग-अलग हिस्सों में करीब साढ़े चार लाख बच्चे इस खतरनाक काम में लगे हैं। आयोग ने सरकार को जेजे एक्ट 2015 (जुवैनाइल जस्टिस एक्ट) और बाल श्रम उन्मूलन कानून, 1986 को आधार बना कर सख्त कार्रवाई सहित नौ महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की हैं, ताकि इन बच्चों को इस त्रासदपूर्ण स्थिति से बचा कर उत्पाद्र कंपनियों की जबाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) में पेश एक रपट में बताया गया है कि दिल्ली और इसके आसपास पांच हजार से ज्यादा से अधिक अवैध इकाइयां चल रही हैं जिनमें ई-कचरे का पुनर्चक्रण किया जा रहा है। दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के लोनी में भी बड़ी संख्या में ई-कचरा संग्रहण और निपटान केंद्र खुले में चल रहे है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश में हर साल दस लाख टन से अधिक ई-कचरा पैदा होता है और इसमें से मात्र तीन से दस फीसद कचरा ही वैज्ञानिक तरीके से संग्रहित और पुनर्चक्रित हो पाता है। इस ई-कचरे में तांबा, लिथियम, पारा, निकल, सेलेनियम, आर्सेनिक और बेरियम सहित अनेक जहरीले तत्व शामिल होते हैं। बाल आयोग ने अपने सर्वे में बताया है कि कैसे आठ से चौदह साल की आयु वाले बच्चों को कैसे ई-कचरे के निपटान में लगाया गया है। इस काम के बदले उन्हें दो सौ से तीन सौ रुपए प्रतिदिन दिहाड़ी दी जाती है। ऐसे संग्रहण केंद्र देश के कई शहरों में चल रहे हैं।

नए ई-कचरा पुनर्चक्रण कानून 2016 के तहत एक हजार छह सौ तीस विनिर्माण कंपनियों को ईपीआर (एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रेस्पांसबिलिटी आथराइजेशन) प्रदान किया गया है। इन कंपनियों की कुल क्षमता सात लाख टन ई-कचरा पुनर्चक्रण की है। आसान शब्दों में कहें तो एक हजार छह सौ तीस कंपनियों को कानूनन सात लाख टन ई-कचरे को सालाना खुद संग्रहित कर मानक तरीके से निपटाना है। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि इस जवाबदेही को कंपनियां पूरा नहीं कर रही हैं। देश में महज तीन से दस फीसद ई-कचरा ही देश कानून के अनुरूप निपटाया जा रहा है, शेष खतरनाक कचरा कबाड़ कारोबारियों के हवाले है। ‘उत्तर प्रदेश बनाम शैलेश सिंह’ मामले में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में पेश अपने एक जबाब में जो तथ्य दिए हैं, वे काफी चिंताजनक हैं। इसके मुताबिक साल 2018 में पैंतीस हजार चार सौ बाईस टन ई-कचरा संग्रहण के मुकाबले मात्र पच्चीस हजार तीन सौ पच्चीस टन और 2019 में निर्धारित एक लाख चौवन हजार दो सौ बयालीस टन के मुकाबले महज अठहत्तर हजार टन ई-कचरा संग्रहित हुआ, यानी लक्ष्य से काफी कम।

ई-कचरा प्रबंधन कानून 2016 के अनुसार केंद्रीय एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को पुनर्चक्रण केंद्रों की नियमित जांच का अधिकार है। लेकिन देश भर में इन मान्यता प्राप्त केंद्रों की नियमित जांच तक नहीं हो रही। इसका नतीजा यह हो रहा है कि देश भर में पर्यावरणीय प्रदूषण का खेल बेखौफ हो कर खेला जा रहा है। इसका अनुमान पर्यावरण मंत्रालय के एक सर्वे से लगाया जा सकता है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मई 2018 में ग्यारह पंजीकृत केंद्रों और एक गैर-नियंत्रित पुनर्चक्रण केंद्र की जांच की। ये केंद्र कानपुर, ठाणे, वापी, कोलकाता, बंगलूरु और अलवर में स्थित थे। मंत्रालय में अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन पुनर्चक्रण केंद्रों में किसी मानक प्रक्रिया का पालन नहीं हो रहा है। जैसे- ई-कचरे का भंडारण, रखरखाव और प्रसंस्करण के गैर-पर्यावरणीय तरीके अपनाना और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दिशा-निर्देशों का पालन न करना प्रमुख था।

ई-कचरे पर 2015 में गठित एक संसदीय समिति ने अपने अध्ययन में इस बात का खुलासा किया था कि एक कंप्यूटर या लैपटॉप में लगभग 3.8 पौंड सीसा, फास्फोरस, कैडमियम, मरकरी जैसे घातक तत्त्व होते हैं। अगर इन्हें जलाया जाए तो ये सीधे वातावरण में घुल जाते हैं। जब इन उपकरणों को हाथों से तोड़ कर अलग किया जाता है और पुनर्चक्रण की प्रक्रिया अपनाई जाती है तो इस काम मे लगे बच्चों, खासकर चौदह वर्ष से कम वर्ग में कैंसर और अस्थमा जैसे खतरनाक रोगों की संभावना सौ फीसद तक बढ़ जाती है। कुछ केंद्रों खासकर कानपुर, वापी, ठाणे, सिलवासा में तो ई-कचरे से तांबा, सीसा, चांदी और सोना जैसी कीमती धातुओं को निकालने का काम कराया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में अपने एक फैसले में ई-कचरे के असंगठित कारोबार को प्रतिबंधित किया है। इसके बावजूद भारत में बड़े पैमाने पर अमेरिका और अन्य विकसित देशों से ई-कचरा अवैध तरीके से आयात किया जाता है और इसे कबाड़ के रूप में देश के अलग-अलग इलाकों में खपा दिया जाता है।

इस आयातित कचरे के अवैध कारोबार का मुख्य कारण भारत में कम लागत पर इसका निपटान है, क्योंकि विकसित देशों में सख्त कानूनी प्रावधानों और महंगे श्रम के कारण विनिर्माताओं को इसके निपटान पर बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। इसलिए विदेशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियां खुद इस अवैध कारोबार को अपना मुनाफा कमाने के लिए सरंक्षण देती है। भारत में 2016 से कानून कमोबेश अमेरिका और अन्य विकसित देशों की तर्ज पर ही बनाए और लागू किए गए हैं और 2018 में सरकार ने बाकायदा ई-कचरे की नवीन श्रेणियां बना कर इस कानून को और सख्त बनाया है, लेकिन क्रियान्वयन के स्तर पर आज भी बड़े स्तर पर लापरवाही देखने को मिल रही है। अरबों की कमाई वाले इस कारोबार को राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण भी हासिल है। इसीलिए सरकारें कानून बनाने में जितनी ततपरता दिखाती हैं, उतनी उनके अमल को लेकर नहीं।

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