बाल विवाह का दंश

बाल विवाह जैसी कुरीति ऐसा कुचक्र है जो बालिकाओं का पूरा जीवन लील जाता है। यही वजह है कि दुनिया के हर शिक्षित और सभ्य समाज में बाल विवाह को एक बड़ी चुनौती देखा जा रहा है। यह किसी परिवार या किसी बालिका के लिए व्यक्तिगत दंश तो है ही, समग्र समाज की उन्नति में भी बाधक है।

तकनीकी विकास और जीवन के हर क्षेत्र में तरक्की के इस दौर में भी कई सामाजिक कुरीतियां समाज के लिए दंश बनी हुई हैं। इन कुरीतियों के चलते बालिकाएं न सिर्फ सहज सुरक्षित जीवन जीने के हक से महरूम हैं, बल्कि उनका जीवन ही छिन जा रहा है। दुनिया भर में मानव जीवन के लिए घुटन और हर तरह के दबाव का घेरा साबित होने वाली तमाम कुप्रथाएं खासतौर से लड़कियों के लिए आज भी बड़ी समस्या के रूप में विद्यमान हैं।

कुप्रथाओं इस फेहरिस्त में बाल विवाह भी है। यह कुरीति बालिकाओं से भावी जीवन के स्वप्न ही छीन लेती है और पढ़ने, आगे बढ़ने तथा अपना स्वतंत्र अस्तित्व गढ़ने की उम्मीदों पर बचपन में ही पानी फिर जाता है। साथ ही यह कुप्रथा बेटियों के स्वास्थ्य के लिए भी अनगिनत जोखिम पैदा करती है।

कुछ समय पहले आई ‘सेव द चिल्ड्रन’ की रिपोर्ट में बाल विवाह जैसी कुप्रथा पर गंभीर चिंता जताई गई है। ‘ग्लोबल गलर्हुड रिपोर्ट 2021- संकट में लड़कियों के अधिकार’ नाम से आई इस वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार बाल विवाह के कारण दुनियाभर में हर दिन साठ से अधिक लड़कियों की मौत होती है। दक्षिण एशिया में हर साल बाल विवाह के कारण एक दिन में छह लड़कियों और साल भर में दो हजार लड़कियों की मौत होती है।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि बाल विवाह के कारण कम उम्र में ही गर्भ धारण और बच्चे को जन्म देने की वजह से हर साल तकरीबन बाईस हजार से ज्यादा लड़कियों की मौत हो रही है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि रिपोर्ट में 2030 तक एक करोड़ बालिकाओं की शादी होने की आशंका जताई गई है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि इस कुप्रथा का खतरा कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है।

खुशहाल और बेफिक्र बचपन हर बच्चे का हक है। इसके लिए जरूरी है कि दुनिया का हर समाज नई पीढ़ी को शिक्षा, सहजता और सम्मानजनक जिंदगी देने की जिम्मेदारी ले और बच्चों का बचपन सहेजने, बेहतरी भरे हालात को उनके हिस्से करने की जागरूकता और सजगता हर अभिभावक अपना दायित्व समझे। पर अफसोस की बात यह कि ऐसा होता नहीं है।

देखने में आता है कि बच्चों का जीवन सहेजने के मामले में हर पक्ष ही असफल है। हालांकि इसके कारण भी साझे हैं। एक ताने-बाने के समान आपस में गुंथे हुए हैं। ऐसी कुरीतियों के मामले में प्रशासनिक लचरता से लेकर सामाजिक भेदभाव और आर्थिक पिछड़ेपन जैसे कई पहलू मिल कर स्थितियां और बिगाड़ देते हैं।

दुखद है कि भारत में बाल विवाह की जड़ें काफी गहरी हैं। यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक बाल विवाह के मामले में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर है। इस सूची में बांग्लादेश पहले स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र की ही एक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की हर तीसरी बालिका वधू भारत में है। यूनिसेफ की रिपोर्ट ‘चाइल्ड मैरिज-प्रोग्रेस एंड प्रोस्पेक्ट’ के मुताबिक भारत बाल विवाह के मामले में दुनिया के शीर्ष दस देशों में शामिल है। बाल विवाह की रोकथाम के लिए जनमानस में वातावरण बनाने की अनगिनत सरकारी कवायदों के बावजूद हमारे यहां यह कुप्रथा कम होने का नाम नहीं ले रही है।

बाल विवाह की कुप्रथा अशिक्षा और पुरातन सोच के अलावा सामाजिक-आर्थिक हालात की भी देन है। किसी के पास देने के लिए दहेज नहीं है, तो किसी की सामाजिक हैसियत इतनी कम है कि बेटी को उसे दबंगों की बुरी नजर से बचाने के लिए उसे कम उम्र में ब्याह देना ही उन्हें एकमात्र तरीका लगता है। कोई बेटे का ब्याह कम उम्र में इसलिए करना चाहता है क्योंकि कुछ साल बाद दुल्हन नहीं मिलेगी।

तभी तो जागरूकता की कमी एक कारण हो सकता है, पर इससे जुड़े कई दूसरे कारण भी हैं जिनके चलते कानून आते-जाते रहते हैं, लेकिन यह कुप्रथा जड़ें जमाए हुए है। हकीकत तो यह है कि आज बाल विवाह के साथ छोटे बच्चों की तस्करी और बेमेल शादियों जैसी घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि यह सिर्फ जन-जागरूकता का विषय नहीं है। आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा से जुड़े कई पहलू इस कुप्रथा को पोषित करते हैं। यही वजह है कि आज डिजिटल होती दुनिया के दौर में भी यह कुरीति कायम है।

हालांकि दावा तो यह किया जाता रहा है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत में शिक्षा को लेकर आई जागरूकता के कारण बाल विवाह के बारे में लोगों ने अब सोचना तो शुरू किया है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में हालात पहले जैसे ही हैं। बीते दो साल में कोरोना महामारी ने आर्थिक असमानता, सामाजिक असुरक्षा और जीवन से जुड़ी बुनियादी जरूरतों के लिए जो तकलीफदेह हालात पैदा कर दिए हैं, उनमें कम उम्र में शादी के मामले फिर बढ़ गए हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि पिछले पच्चीस वर्षों में दुनियाभर में करीब आठ करोड़ बाल विवाहों को रोका गया है, लेकिन कोरोना महामारी से उपजी असमानता ने हालात और बिगाड़ दिए हैं और इनकी वजह से बाल विवाह के आंकड़ों में इजाफा देखने को मिल सकता है।

चाइल्डलाइन इंडिया की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में भी महामारी और देशव्यापी पूर्णबंदी ग्रामीण क्षेत्रों में बाल विवाह के नए कारक साबित हुए हैं। समझना मुश्किल नहीं कि ऐसे हालात में कई परिवार बेटियों की जिम्मेदारी के मुक्त होने की सोचने लगते हैं। उन्हें बेटियों के जल्द से जल्द हाथ पीले कर देना ही हर तरह की असुरक्षा से बचने का समाधान लगता है।

गंभीर तथ्य यह है कि कम उम्र में बालिकाओं की शादी हर तरह से उनके शोषण की वजह बनती है। वैवाहिक जीवन में कम उम्र की लड़कियां यौन हिंसा का शिकार होती हैं। कम उम्र में गभर्धारण और बार-बार मां बनना उनकी सेहत को नुकसान पहुंचाता है। कई बार तो प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के चलते उनकी मौत भी हो जाती है। ऐसी शादियां बच्चों में कुपोषण और शिशु मृत्युदर की अहम वजह भी हैं। साथ ही बाल विवाह के कारण शिक्षा से दूर हो जाना बालिकाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता में बड़ी बाधा बनता है।

छोटी आयु में घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सिमटी उनकी जिंदगी उन्हें अपने अधिकार जानने और सजग नागरिक बनने से भी रोकती है। ऐसे में वे हर तरह के दुर्व्यवहार को झेलने को विवश हो जाती हैं।

देखा जाए तो बाल विवाह जैसी कुरीति ऐसा कुचक्र है जो बालिकाओं का पूरा जीवन लील जाता है। यही वजह है कि दुनिया के हर शिक्षित और सभ्य समाज में बाल विवाह की कुरीति को एक बड़ी चुनौती देखा जा रहा है। यह किसी परिवार या किसी बालिका के लिए व्यक्तिगत दंश तो है ही, समग्र समाज की उन्नति में भी बाधक है। किसी भी देश की आधी आबादी और नई पीढ़ी की बिगड़ती सेहत और सुरक्षा के लिए बड़ी चिंता का विषय है।

इसलिए समाज को समग्र रूप से बाल विवाह जैसी कुरीति को मिटाने और इस कुप्रथा के कायम रहने के पीछे छिपे कारणों से पार पाने के समाधान सुझाने वाले पहलुओं पर विचार करना होगा। यह समझना जरूरी है कि सामाजिक मान्यता और स्वीकार्यता के बिना कोई कानून काम नहीं कर सकता। जब तक बेटियों के लिए सामाजिक सुरक्षा और सम्मान की परिस्थितियां नहीं बनेंगी, ऐसी कुरीतियां फलती फूलती रहेंगी।

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